आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआर्यभटीये २३ मूलांश के घन को घटाओ और अन्तरफल पर पास वाले दूसरे अंश को ारो और इसे "भाज्य" समझो । पुनः लब्ध मूलांश के वर्ग के तिगुने को "जांच भाजक" समझो। भाज्य पिछले दो अङ्कों को छोड़कर उस में "जांच भाजक" का भाग देने से मूल दूसरा अङ्क मिल जावेगा । मूल में जो दो अङ्क ( या कई अङ्क ) अभी मिले हैं, उन को ३ से गुणा ते और गुणन फल को नये मूलाङ्क के ( जो जांच भाजक द्वारा निश्चय हु- ा है ) बांई ओर रक्खो, फिर इस राशि को नये मूलाङ्क से गुणा करो और एन फल को "जांच भाजक" के नीचे दो अंक दाहिनी ओर रक्खो और न को जोड़ो, अब यही योगफल असल भाजक होगा । "असल भाजक" को उस के शेष अंक से गुणा करो और गुणन फल को भाज्य में से घटाओ। फिर अन्तरफल पर पास वाले दूसरे अंश को उतारो इस प्रकार जब तक सब अंश उतार लिये न जांय, तब तक ऊपर लिखी हुई रीति के अनुसार कार्य करोः- उदाहरण—४२८७५ का घनमूल निकालो । ३ जांचभाजक ३×३=२७ ४२८७५ (३५ ३ ९५×५=४७५ ३×२७ असलभाजक ————— ————— ३१७५ १५८७५ ३१७५×५=१५८७५ ————— ३५ इष्ट घनमूल हुआ । ॥ ३ ॥ त्रिभुजस्य फलशरीरं समदलकोटीभुजार्धसंवर्गः ॥ त्रिभुजस्य क्षेत्रस्य या समदलकोटी । लम्ब इत्यर्थः । त्रिभुजस्याधोगतो जो भूमिरित्युच्यते ऊर्ध्वकोणाद्भूम्यन्तं लम्बसूत्रं स लम्ब इत्युच्यते । ल- म्बस्योभयपार्श्वगते ये त्रिभुजदले त्रिकोणरूपे तयोरयं लम्ब एक एव कोटि- र्वति । तस्मात्समदलकोटीत्युच्यते । तस्याः कोट्या भुजा तत्पार्श्वगतो भू- म्यर्द्धस्स्यात् । अतो भुजयोरर्धं भूम्यर्धं भवति । भूम्यर्थलम्बयोस्सवर्गस्त्रिभु- जक्षेत्रफलं भवति ॥ घनस्य त्रिभुजस्य फलमुत्तरार्धेनाह ।