भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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४४ गीतिकापादः ॥ प्रथमस्य रूपकमानम् १०० । गुलिकाख्यगोमानम् ६ । द्वितीयस्य रूपकभा- नम् ६० । गुलिकाख्यगोमानम् ८ । अत्र रूपकान्तरम् ४० । एतद्गुलिकान्तरेण २ । अनेन भक्तम् २० । एतद्विंशतिसंख्यमेकैकगोमूल्यम् । अत्रैकैकस्य विंशत्यधिकं श- तद्वयं रूपकं भवति ॥ ग्रहान्तराद्ग्रहयोगकालानयनमाह । भा०:—गौ आदि द्रव्य का नाम “गुलिका” और स्वर्ण आदि द्रव्य के पण आदि का नाम “रूपक” है दो रूपक संज्ञक द्रव्यों में जो विशेष हो उस में न्यून को घटाकर शेष से भाग देवे, भागफल एक २ गौ का मूल्य होगा । जहां दोनों पुरुषों को अपने २ गौ के मूल्य का योग तुल्य हो वहां यह नियम होगा । उदाहरण जैसे—एक पुरुष के पास १००) रुपये एवं ६ गौ और दूसरे पुरुष के पास ६०) रुपये एवं ८ गौ, तो प्रत्येक गौ का मूल्य क्या होगा ? रुपये १००-६० रु०=४० रु० । और ८ गौ में से ६ गौ० घटाया तो शेष २ रहे । ४० ÷ २ =२० रु० प्रति गौ का मूल्य बीस बीस रुप हुआ । और प्रत्येक पुरुष को १००+ १२०=२२० रुपये, १६०+६०=२२० रुपये हुये ॥ ३० ॥ भक्ते विलोमविवरे गतियोगेनानुलोमविवरे द्वे । गत्यन्तरेण लब्धौ द्वियोगकालावतीतैष्यौ ॥ ३१ ॥ विलोमयोर्वक्रयोर्ग्रहयोर्विवरे स्फुटान्तरे द्वे लिप्तीकृते तयोर्गतियोगेन वक्रस्पष्टगत्योर्योगेन लिप्तीकृतेन भक्ते कार्ये । अनुलोमयोर्वक्रियोर्द्वयोर्वक्रि- णोर्द्वयोर्वा विवरे द्वे गत्यन्तरेण वक्रगत्योर्वा स्पष्टगत्योर्वान्तरेण भक्ते कार्ये । द्वे इतिवचनमन्तरस्य द्वैविध्यात् । शीघ्रगतिहीनो मन्दगतिरन्तरं भवति । मन्द- गतिहीनश्शीघ्रगतिर्वान्तरं भवति । इति द्वैविध्यम् । तत्र हरणे लब्धौ द्वौ द्वि- योगकालौ । द्वयोर्ग्रहयोर्योगकालौ दिनात्मकौ । अतीतैष्यौ भवतः । शीघ्रगति- रग्रतो गच्छति चेदतीतस्स कालः । मन्दगतिरग्रतो गच्छति चेदेष्यस्स कालः । विलोमे तु ऊर्ध्वगतो वक्री चेदेष्यः । अन्यथातीतः ॥ अथ कुट्टाकारगणितप्रदर्श- नार्थमार्याद्वयमाह । भा०:—जिन दो ग्रहों का “योग” जानना हो, उनमें से यदि शीघ्रगा- मी ग्रहकी अपेक्षा अधिक हो तो “योग” गत हुआ (इष्ट काल से पहिले) और मन्दगामी ग्रह शीघ्रगामीग्रह की अपेक्षा अधिक हो तो “योग” भावी (इष्ट काल से पीछे) जानना । यह नियम दो पूर्वगामी ग्रहों के लिये 'है और वक्र गामी ग्रहों का तो उसके उलटा होता है । अर्थात् वक्री (टेढ़ा चलने वाला) मन्दगामी ग्रह की अपेक्षा वक्रीशीघ्रगामीग्रह अधिक हो तो

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