भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 134 में से

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आर्यभटीये- ४९ भा०—एक वर्ष में १२ महीने होते हैं, एक मास में ३० दिन, एक दिन में ० नाड़ी, एक नाड़ी में ६० विनाडी होती हैं। सौर, सावन, चान्द्र, आदि सं क वर्षों में उस २ वर्ष के बारह २ महीना आदि उक्त प्रकार जानना। का- लमान ९ प्रकार का होता है:–जैसा ( कि सूर्य सिद्धान्त में लिखा है )–१ ब्रा- ह्म,२पित्र्य, ३ दिव्य, ४ प्राजापत्य, ५ बार्हस्पत्य, ६ सौर, ७ सावन, ८ चान्द्र, और ९ नाक्षत्र, ये नव प्रकार के कालमान हैं ॥ १ ॥ • गुर्वक्षराणि षष्टिर्विनाडिकार्क्षी षडेव वा प्राणाः । यावता कालेन षष्टिगुर्वक्षराण्युच्चरति मध्यस्थया वृत्त्या पुरुषः । तावा- न्काल आर्क्षी विनाडिका । ऋक्षसंबन्धिनी विनाडिका । ऋक्षाणामाधारभूत- मण्डलं यावता कालेन परिभ्रमति । स काल आर्क्षी दिवसः। तस्य षष्ठ्यंश आ- र्क्षी नाडिका । तस्याष्षष्ट्यंश आर्क्षी विनाडिका सेयमित्यर्थः । षडेव वा प्राणाः यावता कालेन पुरुषष्षडुच्छ्वासान् .करोति। तावान्कालश्चार्क्षी विनाडिका स्यात्। द्वावपि कालौ तुल्यावित्यर्थः ॥ कालविभाग एवं प्रदर्शितः । क्षेत्रविभागश्च तथा ज्ञेयइत्युत्तरार्धेनाहः । भा०:—जितने समय में ६० गुरु ( दीर्घ ) अक्षर का उच्चारण पुरुष मध्यम वृत्त से करता उतने काल को नाक्षत्रिक विनाडिका कहते हैं। एक रात्रि में मा- ध्यान्हिक रेखा पर कोई स्थिर तारा दीख पड़े–उस समय से उसके दूसरे रात्रि को उसी रेखा पर उक्त तारा दीख पड़े, उतने समय को नाक्षत्रिक अहोरात्र कहते हैं। इस के ६० वें अंश को नाक्षत्रनाडिका कहते हैं। नाडिका के ६० वें भाग को विनाड़िका कहते हैं। जितने काले में पुरुष ६ः श्वास करता उतने काल को नाक्षत्रिक विनाडिका कहते हैं। अर्थात ६० गुरु अक्षर के प- रिमाण एवं ६ श्वास के परिमाण से—जो काल होता वह परस्पर तुल्य होता है । एवं कालविभागः क्षेत्रविभागस्तथा भगणात् ॥ २ ॥ वर्षोत्कालविभाग एवमुक्तः । भंणशात्क्षेत्रविभागोऽपि तथा ज्ञेयः । एत- दुक्तं भवति । द्वादशांश एको राशिर्भवति । राशेस्त्रिंशांश एको भागः । भागस्य षष्ठ्यंश एका लिप्ता । लिप्तायाष्षष्ट्यंश एका विलिप्ता । विलिप्तायाष्ष- ष्ट्यंश एका तत्परा । इति भगणादयः क्षेत्रात्मकाः । वर्षादयः कालात्मकः ॥ राशिश्चक्रे चरतोर्द्वयोर्ग्रहयोश्चतुर्युगे योगसंख्याज्ञानमार्यार्धेनाह । ७

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