भारतकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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५८ गीतिकापादः ॥ व्याख्याया सिद्धान्तदीपिकाख्यायां विस्तरेण प्रदर्शितम् । तस्मादिहास्मा- भिरनादृतम् । भा०:—कुट्टाकार गणित (इनडिटरमिनेट इकेशन) दो प्रकार का होता है एक को “निरग्र कुट्टाकार” एवं दूसरे को “साग्र कुट्टाकार” कहते हैं । किसी गुणकार से गुणा कर, भाजक द्वारा भाग देने पर जो शेष रहता, उस शेष एवं भाज्य, भाजक द्वारा “ उक्त शेषप्रदगुण कारराशि ” के लाने के लिये जो कर्म किया जाता उसे “ निरग्र कुट्टाकार ” कहते हैं । इस प्रकार लाया हुआ वह गुण कार, यदि “ पूर्व गुणकार ” से भिन्न हो तो उस.में “ स्वहार ” देने से “ पूर्व गुणकार ” सिद्ध होता है। जहां एक ही राशि से दो भाज्य गुणित हों एवं दो भाजक से भाग देने पर जो शेष रहता, वहां उन से एवं भाज्य, भाजक से उन २ के दोनों “ छेद ” एवं दोनों “ गुणकार ” निरग्रविधि ” से लाने पर यदि दोनों ॰गुण कार भिन्न हों तो उन से एवं उन के दोनों हारकों से “ पूर्वगुणकार ” लाने के लिये जो कर्म शेष रहता उस का नाम “ साग्र कुट्टाकार” है। और दोनों शेषों से जो दो गुणकार लाये गये, उन में से जो अधिक होता उसे “अधिकाग्र ” एवं जो न्यून होता उसे “ऊनाग्र ” कहते हैं ॥ ३२ । ३३ ॥ इति पारमेश्वरिकायां भटदीपिकायां गणितपादो द्वितीयः ॥ : 𑁍 : अथ कालक्रियापादः प्रदर्श्यते । तत्र कालविभागमाह । वर्षं द्वादश मासास्त्रिंशद्दिवसो भवेत्स मासस्तु । षष्टिर्नाड्यो दिवसष्षष्टिस्तु विनाडिका नाडी ॥ १ ॥ एकं वर्षं द्वादश मासां• भवन्ति । त्रिंशद्दिवसा यस्मिन् स त्रिंशद्दिवसः मासस्त्रिंशद्दिवसस्स्यात् । एको मासस्त्रिंशद्दिवसा भवतीत्यर्थः । एको दिवसष्ष ष्टिर्नाड्यो भवति । एका नाडी षष्टिर्विनाडिका भवति । सौरसावनचान्द्रादि संज्ञितेषु वर्षेषु तत्तद्वर्षकालाद्द्वादशांशस्तत्तन्मासकालः । एवं स्वमानवशात्तत्त द्दिननाड्यादिकाला वेद्याः । कालभेदा नवविधा उक्ताः । “ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यञ्च गौरवम् ॥ सौरञ्च सावनं चान्द्रमार्कं मानानि वै नव ॥ ” इति—नक्षत्रमण्डलभ्रमणकालतुल्यस्य नाक्षत्रस्यदिनस्यावयवभूताया वि- नाडिकायाः कालमार्यार्धेन प्रदर्श्यति ।