आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ गीतिकापादः ॥ चन्द्रमा का एक ही स्फुटकर्म्म होता है। और दो उच्च ( शीघ्रं मन्द ) वाले मङ्गल आदि के दो स्फुटकर्म्म होते हैं। उसमें उन के दो स्फुटकर्म्म करने पर भी कभी दृग्भेद सम्भव होता है। मन्द और शीघ्र के कक्षामण्डल भेद से एवं प्रतिमण्डल के भेद से सम्भव होता है। सो दृग्भेद के परित्याग (व्यु- दास) के लिये किया जाता है। मङ्गल, बृहस्पति, शनि, पहिले मध्य से मन्द फल लाकर उसको मध्यम करके और उस से शीघ्र लाकर उसका आधा उसी में करके उससे मन्दफल सब केवल मध्य में करके उससे शीघ्रफल सब उसी में आजाता है। वह स्फुटग्रह होता है। बुध और शुक्र का तो पहिले मध्यम से शीघ्र फल लाकर उसके आधे को मन्दोच्च में व्यस्त कर और उससे शीघ्र फल सब उसमें किया जाता है। वही स्फुट होता है ॥ २१ ॥ ऋणधनधनक्षयास्स्युर्मन्दोच्चाद्व्यत्ययेन शीघ्रोच्चात् । मन्दोच्चात् । मन्दोच्चहीनान्मध्यमादित्यर्थः । तस्मादुत्पन्ना जीवा पद- क्रमेण ऋणधनधनक्षयास्स्युः । व्यत्ययेन शीघ्रोच्चात् । मध्यमहीनाच्छीघ्रोच्चा- दुत्पन्ना जीवा व्यत्ययेन धनर्णार्णधनास्स्युरित्यर्थः । एतदुक्तं भवति । प्रथमपदे मन्दभुजायाः क्रमज्याफलमृणं भवति । द्वितीयपदे कोट्या उत्क्रमज्याफलम् । तृतीयपदगतसम्पूर्णभुजाफलसंस्कृते ऋणं भवति । शीघ्रे तु धनर्णव्यत्ययेन भवति । इति । मान्द्ये मेषादौ भुजाफलमृणं तुलादौ धनम्। शैघ्ये तूच्चान्मध्य- मस्य शोधन विधानान्मेषादौ धनं तुलादावृणमित्येवार्थः । भा०:—मध्यमहीन उत्पन्न जीवा पद क्रम से ऋण और धन मन्दोच्च से धन और ऋण होता है। मध्यम हीन शीघ्रोच्च से उत्पन्न जीवा विपरीत भाव से धन और ऋण, ऋण और धन होता है। इस का आशय यह है कि प्रथम पद में मन्दभुजा की क्रमज्याफल ऋण होता है। द्वितीय पद में कोटी द्वारा उत्क्रमज्या फल होता है। तृतीय पदगत सम्पूर्ण भुजफलसंस्कृत में ऋण होता है। शीघ्र में तो धन ऋण विपरीत भाव से होता है। मान्द्यकर्म में मेषादि में भुभाफल ऋण, तुलादि में धन होता है। शैघ्य में तो उच्च से मध्यम का शोधन विधान मेषादि में धन होता है, तुलादि में ऋण होता है ॥ शनिगुरुकुजेषु मन्दादर्धमृणधनं भवति पूर्वे ॥ २२ ॥ मन्दोच्चाच्छीघ्रोच्चादर्धमृणधनं ग्रहेषु मन्देषु ! मन्दोच्चात्स्फुटमध्याश्शीघ्रोच्चाच्च स्फुटा ज्ञेयाः ॥२३॥