आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
आर्य्यभटीये- ९५ भा०:-चन्द्रग्रहण के प्रारम्भ (स्पर्श) और मोक्ष में चन्द्रमा धूम्र वर्ण होता है। खण्ड ग्रहण में अर्थात् बिम्ब के आधा भाग ग्रसित होने पर कृष्ण वर्ण होता, सर्वग्रास में कपिलवर्ण होता, सर्वग्रहण में भी तमोमध्य प्रवेश करने पर कृष्ण एवं ताम्बे का सारंग होता है ॥ ४६ ॥ सूर्येन्दुपरिधियोगे ऽर्काष्टमभागो भवत्यनादेश्यः । • भानोर्भासुरभावात् स्वच्छतनुत्वाच्च शशिपरिधेः ॥४७॥ सूर्येन्द्वोः परिधियोगे स्पर्शादावर्कबिम्बस्याष्टमभागो ग्रस्तोऽप्यनादेश्यः । द्रष्टुमशक्य इत्यर्थः । तत्र हेतुमाह भानोरिति । सूर्यस्यातिभासुरत्वात् जलम- यस्य शशिनः परिधेरत्यच्छत्वाच्च । आसन्नार्करश्मिभिश्चशशिपरिधेरच्छत्वं सम्भ- वति । अष्टमभागाधि के ग्रस्ते तेनाष्टमांशेन सह ग्रस्तभाग उपलभ्यते ॥ एवं स्वशास्त्रप्रतिपादितग्रहगत्यादेर्दृक्संवादात् स्फुटत्वमाह । भा०:-सूर्य्यग्रहण में-सूर्य्य और चंन्द्रमा की परिधि योग में सूर्य्य के अष्टमभाग ग्रस्त सूर्य्य का नहीं दीख पड़ता । इस का कारण यह है कि सूर्य्य के अत्यन्त प्रकाश और जलमय चन्द्रमा की परिधि की स्वच्छता होने से । क्योंकि सूर्य के किरण निकट होने से चन्द्रमा की परिधि की स्वच्छता का सम्भव होता है इसी कारण अष्टम भाग से अधिक ग्रस्त भाग की उपलब्धि होती है ॥४७॥ ' क्षितिरवियोगाद्दिनकृद्रवीन्दुयोगात्प्रसाधितश्चेन्दुः। शशिताराग्रहयोगात्तथैव ताराग्रहास्सर्वे ॥४८॥ इह तन्त्र उदितोऽर्को भूरवियोगात् प्रसाधितः । स्फुट इति कल्पितः । यथा पूर्वापरसूत्राग्रे रखेरुदयास्तमयाच्च गोलान्तर्गतोऽर्क इति कल्प्यते । दक्षिणे त्तरगतिनिवृत्त्यायनगतिश्चेति च पूर्वापरसूत्रगतशङ्क्वूच्छ्रायया दक्षिणोत्तरगतश- ङ्क्वूच्छ्रायया च तात्कालार्कस्साध्यते । एवं बहुभिः प्रकारैः परीक्ष्यात्रोदितोऽर्क- स्स्फुट इति कल्पितः । इत्यर्थः एवं प्रकाशिकायामुदितम् । एतैः प्रकारभेदैस्सा- धनार्क एव सिध्येत् नतु दृगानीतः । अयनचलनञ्च प्रतिकाsubscription भिन्नं युक्त्या तत्परिज्ञानञ्च गणिताकदेव भवति* ॥ शास्त्रस्य मूलमाह । भा०:-पूर्वापर रेखा के आगे सूर्य्य का उदय होने से गोलान्तर्गत सूर्य्य की ऐसी कल्पना कियी जाती है। और दक्षिण उत्तर के गति निवृत्ति
- अंतः परं कतिचित्खण्डितवाक्याख्यानि पुस्तकद्वये दृश्यन्ते । तद्यथा । अतः केचिदेवमाहुः । कृत्तिकादितारकाणां शास्त्रोदितैः - - - वांशैश्च तासामु- दयलग्नं मध्यलग्नमस्तलग्नञ्च सस्यग्ज्ञात्वा पुनरर्कस्यार्द्धास्तमये घटिकायन्त्रं · संस्थाप्य तेन कृत्तिकादीनां - - द्येन कालेन विशे-
९६ गीतिकापादः ॥ द्वारा “ अयन ” होता है। पूर्वापर शङ्कुछाया में एवं दक्षिणोत्तर शङ्कुछाया द्वारा तात्कालिक सूर्य्य सिद्ध होता है। एवं बहुत प्रकार से परीक्षा किया हुआ स्फुट सूर्य्य होता है ॥ ४८ ॥ सदसज्ज्ञानसमुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन । सञ्ज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नंस्वमतिनावा ॥ ४९ ॥ सदसज्ज्ञानरत्नवतो ज्योतिषशास्त्रारव्यसमुद्रात् स्वमतिनावा स्वमत्याख्यां नावमारूढेन मया तन्मध्यं प्रविश्य तत्र निमग्नं सञ्ज्ञानाख्यमुत्तमरत्नं देवता- यास्स्वयंभुवः प्रसादेन सम्यगुद्धृतम् । स्वयंभुवोद्दिष्टार्थप्रकाशनमेव मया कृत- मित्यर्थः । संक्षिप्तत्वञ्चात्र सिध्यति ॥ अथोपसंहरति । भा०:–ज्योतिष् शास्त्र रूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार होकर समुद्र में निमग्न हो ब्रह्मा की कृपा से सद्ज्ञानरूप रत्न को मैं ने (आ- र्य्यभट) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया ॥४९॥ आर्य्यभटीयं नाम्ना पूर्वं स्वायम्भुवं सदा सद्यत् । सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रतिकञ्चुकं यो ऽस्य* ॥ ५० ॥ पूर्वमादिकाले यज्ज्योतिश्शास्त्रं वेदात्समुद्धृत्य ग्रन्थेन लोके प्रकाशित- मासीत् सदा सर्वदा सद्भूतं तदेव मया नाम्नाऽार्य्यभटीयमिति तन्त्रं प्रकाशितम् । अस्य शास्त्रस्य यः प्रतिकञ्चुकं कुरुते । दोषोत्पादनेन तिरस्करणमित्यर्थः । तस्य सुकृतायुषोः प्रणाशस्स्यात् ॥ परमादीश्वराख्येन कृतेयं भटदीपिका । प्रदीप्यतां सदा ज्योतिषशास्त्रज्ञानां हृदालये ॥ इति भटदीपिकायां गोलपादः । इत्यार्यभटीयं समाप्तम् । भा०:–आदि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक में प्रचार किया गया–उसी ज्योतिः शास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिष् शास्त्र को, मैं ने (आर्य्यभट) आर्य्यभटीय तन्त्र ” नाम से प्रकाशित किया है। इस शास्त्र में जो कोई व्यक्ति मिथ्यादोष दिखला कर इस का तिरस्कार करेगा–उस के सुकृत, पुण्य वा यश और आयु का नाश होगा ॥ ५० ॥ आर्य्य भटीय ज्योतिषशास्त्र पूरा हुआ । *प्रतिकञ्चुको योऽस्य । इति पठनीयम् । दीपिकाव्याख्याया व्याकरणविरुद्धत्वात् ।
गौतमीय न्यायशास्त्र सभाष्यानुवाद—मूल्य ३॥) वेद, उपवेद और वेद के छः अङ्गों के रक्षार्थ-हमारे ऋषियों ने-छः उपाङ्ग स्वरूप-छः दर्शन शास्त्र रचे हैं। इन दर्शनों में (अपने २ तरीके पर) वेदोक्त सत्य सनातन धर्म को युक्ति तथा प्रमाणों से बड़े २ नास्तिकों के आक्षेपों का. उत्तर देकर-हमारे वेदोक्त धर्म की रक्षा कियो गयी है। इन छः दर्शनों में से सब से अधिक हमारे गौतम ऋषि ने चार्वाक, बौद्ध, आर्हत, जैन आदि मतों का अकाट्य उत्तर दिया है। इस दर्शन में एक बड़ी विल- क्षणता है कि इस का ठीक २ समझ लेने पर, शास्त्रार्थ वा बहस की रीति खूब मालूम हो जाती है और चाहे कैसा भी प्रबल नास्तिक क्यों न हो इस शास्त्र के जानने वाले के सामने नहीं ठहर सकता। इस न्यायविद्या को "तर्क," मन्तिक़ या Logic कहते हैं। गौतम मुनि कृत ५३० सूत्रों पर वात्स्या- यन मुनिकृत संस्कृत भाष्य का-अत्युस सरलभाषानुवाद, स्थान २ पर उपयुक्त टिप्पणी दियो गयी है। और यह प्रति १३ शुद्ध प्रतियों से मिला कर अत्यन्त शुद्ध छापी गयी है। इस में एक और विशेषता है कि इस की भूमिका में आस्तिक और नास्तिक दर्शनों पर युक्ति और प्रमाणों द्वारा विचार लिखा गया है और-छः दर्शनों का परस्पर विरोधाभास-के भ्रम को दूर किया गया है। अर्थात् छः दर्शन का-मुख्य'एक वेदोक्त सत्यधर्म की रक्षा करना-उद्देश्य है यह बात युक्ति, प्रमाण से सिद्ध कियो गयी है। सामवेदीय-गोभिलगृह्यसूत्र सटीक सानुवाद २॥) वेद के शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, और ज्योतिष इन छः अङ्गों में से-"कल्प" नामक अङ्ग वेद के हस्त स्वरूप हैं। अर्थात् वेद का जो प्रधान उद्देश्य-श्रेयस्कर कर्मकाण्ड की प्रवृत्तिकराने में-है उसी का प्रतिपादक गृह्यसूत्र है। चारों वेदों की भिन्न २ शाखा होने से.प्रत्येक शाखाओं के भिन्न २ गृह्यसूत्र हैं। यह गोभिल गृह्यसूत्र-सामवेद की कौथुमी शाखा का-गोभिल- मुनिप्रणीत-स्मार्तकर्म की पद्धति स्वरूप है। इस ग्रन्थ में प्रथम सूत्र है। प्रत्येक सूत्र पर संस्कृतटीका, आवश्यकीय स्थानों में टिप्पणी और गर्भाधानादि संस्कारों में जिन वेद मन्त्रों के पढ़ने की आवश्यकता पड़ती है, वे पूरे २ मन्त्र संस्कृत टीका में रखे गये हैं। और भूमिका में वेद, शाखा, सूत्र, गोत्र, प्रवर, आदि पर अत्यन्त उपयोगी विचार किया गया है। सुन्दर चिकने कागज पर नये टाइप में, अत्यन्त शुद्ध छपा है। सूर्यसिद्धान्त भाषाटीका और बृहद्भूमिका सहित मू० २) यह ग्रन्थ-सिद्धान्त ज्योतिष के उपलब्ध ग्रन्थों में सब प्राचीन सर्व मान्य है। भारतवर्ष में ज्योतिष के अनुसार पञ्चाङ्ग आदि बनने तथा गणित आदि सिद्धान्त ज्योतिष के विषय सम्बन्धी विवाद होने पर-इसी
ग्रन्थ का प्रामाण्य माना जाता है। आज तक इस अमूल्य ज्योतिष के ऊपर ऐसा अपूर्व विचार नहीं किया गया था इस की भूमिका के १५० पृष्ठों में प्रायः संस्कृत ज्योतिष, अङ्गरेजी आदि ज्योतिष, वेद, ब्राह्मणादि पुस्तकों से भारतवर्षीय ज्योतिषशास्त्र का गौरव सिद्ध किया गया है। केवल इस एक ही पुस्तक के पढ़ने से बिना गुरु प्रायः ज्योतिष के विषयों का ज्ञाता हो सकता है। पिङ्गलसूत्र सटीक सानुवाद। मूल्य १॥) वेदार्थ समझने के लिये-छन्दोग्रन्थ की भी आवश्यकता है। स्थान २ में छन्दो विशेष का विधान है, इसी कारण गायत्री उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती, इन सात छन्दों का वर्णन तथा मगण, यगण आदि छन्द सम्बन्धी वैदिक तथा लौकिक छन्दों का वर्णन है। बिना छन्द ज्ञान के वेद पढ़ना दोष लिखा है तथा बिना छन्द ज्ञान के मन्त्रों का अर्थ भी ठीक २ समझ में नहीं आ सकता क्योंकि बिना षडङ्ग के वेद का तात्पर्य समझना आहोपुरुषिकामात्र है। यद्यपि श्रुतबोध, वृत्त रत्नाकर आदि भी छन्दोग्रन्थ हैं परन्तु-उन में वैदिक छन्दों का कुछ भी वर्णन नहीं है अतएव हम ने बड़े परिश्रम से-वेद के छः अङ्गों में से पिङ्गलकृत छन्दसूत्र पर हलायुधकृत वृत्ति सहित का अति उपयोगी सरल भाषानुवाद किया है। उत्तम चिकने कागज पर अत्यन्त शुद्ध छपा है। नीचे लिखे पुस्तक शीघ्र छपेंगे। १-सिद्धान्तशिरोमणि—पं भास्कराचार्य कृत ज्योतिष का ग्र. (गोलाध्याय) संस्कृत टीका और भाषानुवाद एवं उपयुक्त-चित्र सहित मू०२) २-सचित्र भारतवर्षीय प्राचीन भूगोल। नाम ही से समझ जाइये-वाल्मीकीय तथा महाभारत आदि के समय के देशों की स्थिति का-चित्र, रावण, वालि, तथा भगवान् रामचन्द्र जी के राज्य के भिन्न २ रंग दे कर नकशा छापा जावेगा २॥) ३-सर्वदर्शनसंग्रह-माधवाचार्यकृत—जिस में १६ दर्शन और जिस में आस्तिक नास्तिक, दर्शनों का सिद्धान्त लिखा है। संस्कृत और भाषानुवाद सहित और भूमिका में सब दर्शनों पर गूढ़ विचार तथा-अङ्गरेजी में भी प्रत्येक दर्शन का खुलासा लिखा गया है मूल्ये—२॥) इस में नीचे लिखे दर्शन हैं; इन का अलग २ दाम इस प्रकार होगा। १ चार्वाक =), बौद्ध =), आर्हत ।), रामानुज ।), पूर्णप्रज्ञ =), पाशुपत =), शैव दर्शन =), प्रत्यभिज्ञान =), रसेश्वर =), न्याय =), वैशेषिक =), मीमांसा =) पाणिनीय =), सांख्य =), पातञ्जल ।) और शाङ्करदर्शन ०॥) है। पता-उदयनारायणसिंह—'शास्त्रप्रकाश' कार्यालय मधुरापुर, विशुनपुर, मुजफ्फरपुर। Recd. on 23.4.75 LIBRARY D. D. No. 6803