अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२ भाषाधर्मसंहिता ॥
एतच्चान्यच्चभगवन् ब्रूहिनःपरमोगुरुः ॥ ६ ॥ हारीतस्तानुवाचाथ तैरैवंचोदितोमुनिः । शृण्वन्तुमुनयःसर्वे धर्म्मान्वक्ष्यामि शाश्वतान् ॥७॥ वर्णानामाश्रमाणांच योगशास्त्रंचसत्तमाः । सन्धार्थमुच्यतेमर्त्यो जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ८ ॥ पुरादेवोजगत्स्रष्टा परमात्माजलोपरि । सुष्वापभोगिपर्य्यंके शयनेतुश्रियासह ॥ ९ ॥ तस्यसुप्तस्यनाभौतु महत्पद्ममभूत्किल । पद्ममध्येऽभवद्ब्रह्मा वेदवेदांगभूषणः ॥ १० ॥ सचोक्तोदेवदेवेन जगत्सृजपुनःपुनः ।
वाला योगशास्त्र है उस को और हे भगवन् अन्य उत्तम उपदेश को संक्षेप से कहो क्यों कि तुम हमारे परम गुरु हो ॥ ६ ॥ उन मुनियों के इस प्रकार प्रेरणा करने पर हारीत मुनि उन से बोले कि हे सम्पूर्ण मुनियो ! सुनो मैं सनातन धर्मों को कहता हूं ॥ ७ ॥ वर्ण तथा आश्रमों के धर्म और योगशास्त्र को भली प्रकार जान कर मनुष्य संसार के बन्धन से छूट जाता है ॥ ८ ॥ पूर्व प्रलय समय में जगत् के रचने वाले देव परमात्मा जलों के ऊपर शेष शय्या पर लक्ष्मी सहित सोये ॥९ ॥ सोते हुये उन की नाभि से महान् (बड़ा) कमल हुआ उस पद्म के बीच वेद और वेदांगों के भूषण ब्रह्मा जी प्रकट हुए ॥१०॥ उन को देवों के देव परब्रह्म ने वारंवार यह कहा कि तुम जगत् को रचो।
वि० (९ । १०) आकाश मण्डल में निराधार रहने वाला जल यहां लेना उचित है उसी जल पर नौका स्थानीय वा आधार भूत जो सामान था वही शय्या है प्रलय के समय भगवान् लक्ष्मी वा स्त्री शक्ति रूप प्रकृति को अपन में लीन कर विश्राम करते हैं । जब संसार रचने का समय आता है तब स्वयमेव भगवान् के नाभि नाम मध्य भाग में कमलाकार अण्ड पैदा होता उसी के बीच ब्रह्मा जी होते हैं जो आगे सब सृष्टि को बनाते हैं ।