अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० भाषार्थसहिता ॥
छत्रंचोपानहंचैव गन्धमाल्यादिवर्जयेत् ।
नृत्यगीतमथालापं मैथुनंचविवर्जयेत् ॥८॥
हस्त्यश्वारोहणंचैव सन्त्यजेत्संयतेन्द्रियः ।
सन्ध्योपास्तिंप्रकुर्वीत ब्रह्मचारीव्रतेस्थितः ॥९॥
अभिवाद्यगुरोःपादौ संध्याकर्मावसानतः ।
तथायोगंप्रकुर्वीत मातापित्रोश्चभक्तितः ॥१०॥
एतेषुत्रिषुनष्टेषु नष्टाःस्युःसर्वदेवताः ।
एतेषांशासनेतिष्ठेद् ब्रह्मचारीविमत्सरः ॥११॥
अधीत्यचगुरोर्वेदान् वेदौवावेदमथवा ।
गुरवेदक्षिणांदद्यात्संयमीग्राममावसेत् ॥१२॥
यस्यैतानिसुगुप्तानि जिह्वोपस्थोदरंकरः ।
संन्याससमयंकृत्वा ब्राह्मणोब्रह्मचर्य्यया ॥१३॥
तस्मिन्नेवनयेत्कालमाचार्य्येयावदायुषम् ।
तदभावेचतत्पुत्रे तच्छिष्येवाथवाकुले ॥१४॥
छाता जूता गंध (इतर फुलेलआदि) माला नाचना गाना बहुत बोलना मैथुन इनको सर्वथा त्याग देवे हाथी घोड़े पर न चढ़े और इन्द्रियों को वशमें करके नियम में स्थित ब्रह्मचारी संध्योपासन किया करे॥८॥
संध्या कर्म को समाप्त कर गुरु के चरणों को अभिवादन करके भक्ति से माता और पिता की भी सेवा करे ॥१०॥
जो ब्रह्मचारी गुरुआदि तीनों की सेवा शुश्रूषा को सर्वथा भुला देतो उस पर सब देवता नष्ट (अप्रसन्न) होजाते हैं इससे ईर्ष्या को छोड़कर ब्रह्मचारी इनकी शिक्षा (उपदेश में) स्थित रहे ॥११॥
गुरुसे सब (४ वेद) अथवा दो वेद अथवा एक वेद को पढ़कर जितेंद्व्रिय ब्रह्मचारी गुरुको दक्षिणा दे के समावर्त्तन करके ग्राममें बसे॥१२॥
जिह्वा-उपस्थ इन्द्रिय-उदर(पेट)-हाथ-जिसके ये भलेप्रकार वश में होगये हैं। वह ब्राह्मण ब्रह्मचर्य्य से ही संन्यास लेने का समय नियत कर लेवे ॥१३॥
और वह नैष्ठिकब्रह्मचारी रहनापसन्दकरेतोउसी आचार्य्य के यहां मरणा पर्य्यन्त विरक्त होकर गुरुसेवा करे यदि आचार्य का स्वर्गवास होजाय तो गुरु शिष्यके समीप, गुरु के कुलमें तपकरता हुआ जन्म को बितावे ॥ १४ ॥