अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ ११
नविवाहो न संन्यासो नैष्ठिकस्य विधीयते । इमं यो विधिमास्थाय त्यजेद्देहमतन्द्रितः । नेह भूयोऽपिजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥१५॥ यो ब्रह्मचारी विधिना समाहितश्चरेत्पृथिव्यां गुरुसेवने रतः । संप्राप्य विद्यामतिदुर्लभां शिवां फलञ्च तस्या सुलभं तु विन्दति ॥१६॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतशास्त्रार्थतत्ववित् । असमानर्षिगोत्रां हि कन्यामभ्रातृकां शुभाम् ॥ १॥ सर्वावयवसम्पूर्णां सुवृत्तामुद्वहेन्नरः । ब्राह्मेण विधिना कुर्यात्प्रशस्तेन द्विजोत्तमः ॥ २ ॥ तथाऽन्ये बहवः प्रोक्ता विवाहा वर्णधर्मतः । उपासनं च विधिवदाहृत्य द्विजपुंगवः ॥ ३ ॥ सायंप्रातश्च जुहुयात् सर्वकालमनन्द्रितः ।
इस नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये विवाह और संन्यास नहीं कहे हैं। जो आलस्य को छोड़कर इस विधि से देह को त्याग दे ॥१५॥ वह दृढ़व्रत ब्रह्मचारी इस भूलोक में फिर पैदा नहीं होता—विधि और सावधानी से गुरु की सेवा में लवलीन जो ब्रह्मचारी पृथ्वी पर विचरता है ॥१६॥ वह अत्यन्त दुर्लभ और कल्याण रूप विद्या को पाकर उसके सुलभ फल (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥१७॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ३ अध्याय भाषासमाप्ता ॥
वेद को जो पढ़ चुका है, और वेदशास्त्र के तात्पर्य को ठीक २ जानता है ऐसा ब्रह्मचारी समावर्त्तन संस्कार करके जिसके प्रवर और गोत्र अपने से भिन्न हों और कोई भाई जिस का हो ऐसी ॥१॥ देह के सब अंग जिस के पूरे २ हों और सुंदर जिसका आचरण हो ऐसी कन्या से विवाह करे। और ब्राह्म या आठ विवाहों में उत्तम ब्राह्मविवाह विधि से विवाह करै ॥ २ ॥ ब्राह्म से भिन्न विवाह अन्य क्षत्रियादि वर्णों के लिये कहे हैं ॥ ३ ॥ आलस को छोड़ सायं प्रातःकाल नित्य २ होम करे और नित्य दन्तधावन करके स्नान