अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
हारीतस्मृतिः ॥ ११
नविवाहो न संन्यासो नैष्ठिकस्य विधीयते । इमं यो विधिमास्थाय त्यजेद्देहमतन्द्रितः । नेह भूयोऽपिजायेत ब्रह्मचारी दृढव्रतः ॥१५॥ यो ब्रह्मचारी विधिना समाहितश्चरेत्पृथिव्यां गुरुसेवने रतः । संप्राप्य विद्यामतिदुर्लभां शिवां फलञ्च तस्या सुलभं तु विन्दति ॥१६॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ गृहीतवेदाध्ययनः श्रुतशास्त्रार्थतत्ववित् । असमानर्षिगोत्रां हि कन्यामभ्रातृकां शुभाम् ॥ १॥ सर्वावयवसम्पूर्णां सुवृत्तामुद्वहेन्नरः । ब्राह्मेण विधिना कुर्यात्प्रशस्तेन द्विजोत्तमः ॥ २ ॥ तथाऽन्ये बहवः प्रोक्ता विवाहा वर्णधर्मतः । उपासनं च विधिवदाहृत्य द्विजपुंगवः ॥ ३ ॥ सायंप्रातश्च जुहुयात् सर्वकालमनन्द्रितः ।
इस नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये विवाह और संन्यास नहीं कहे हैं। जो आलस्य को छोड़कर इस विधि से देह को त्याग दे ॥१५॥ वह दृढ़व्रत ब्रह्मचारी इस भूलोक में फिर पैदा नहीं होता—विधि और सावधानी से गुरु की सेवा में लवलीन जो ब्रह्मचारी पृथ्वी पर विचरता है ॥१६॥ वह अत्यन्त दुर्लभ और कल्याण रूप विद्या को पाकर उसके सुलभ फल (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥१७॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ३ अध्याय भाषासमाप्ता ॥
वेद को जो पढ़ चुका है, और वेदशास्त्र के तात्पर्य को ठीक २ जानता है ऐसा ब्रह्मचारी समावर्त्तन संस्कार करके जिसके प्रवर और गोत्र अपने से भिन्न हों और कोई भाई जिस का हो ऐसी ॥१॥ देह के सब अंग जिस के पूरे २ हों और सुंदर जिसका आचरण हो ऐसी कन्या से विवाह करे। और ब्राह्म या आठ विवाहों में उत्तम ब्राह्मविवाह विधि से विवाह करै ॥ २ ॥ ब्राह्म से भिन्न विवाह अन्य क्षत्रियादि वर्णों के लिये कहे हैं ॥ ३ ॥ आलस को छोड़ सायं प्रातःकाल नित्य २ होम करे और नित्य दन्तधावन करके स्नान
१२ भाषार्थसहिता ॥
स्नानंकार्यंततो नित्यं दन्तधावनपूर्वकम् ॥ ४ ॥
उषःकाले समुत्थाय कृतशौचोयथाविधि ।
मुखेपर्युषिते नित्यं भवत्यप्रयतो नरः ॥ ५ ॥
तस्माच्छुष्कमथार्द्रंवा भक्षयेद्दन्तकाष्ठकम् ।
करंजंखादिरंवापि कदंबंकुरवंतथा ॥ ६ ॥
सप्तपर्णंपृश्निपर्णी जंबूनिंबंतथैवच ।
अपामार्गंचबिल्वंचाकं चोदुम्बरमेवच ॥ ७ ॥
एतेप्रशस्ताःकथिता दंतधावनकर्म्मणि ।
दंतकाष्ठस्यभक्षश्च समासेनप्रकीर्तितः ॥ ८ ॥
सर्वैकंटकिनःपुण्याः क्षीरिणश्चयशस्विनः ।
अष्टांगुलेनमानेन दन्तकाष्ठमिहोच्यते ॥ ९ ॥
प्रादेशमात्रमथवा तेनदन्तान्विशोधयेत् ।
प्रतिपत्पर्वषष्ठीषु नवम्यांचैवसप्तमीः ॥ १० ॥
दन्तानांकाष्ठसंयोगो दहत्यासप्तमंकुलम् ॥
करे ॥ ४ ॥ अरुणोदय में उठके विधिपूर्वक शुद्धि मुखादिकी करे क्योंकि मुख के पर्युषित (बासी) होने से मनुष्य का मन मलिन अपवित्र होता है॥५॥ उन मे सूखी वा गीली दातौन अवश्य करे वह दातौन करंज, खैर, कदंब, मौलसिरी की हो ॥ ६ ॥ सप्तपर्ण, पृश्निपर्णी, जामन नीम औंधा बेल, आक गूलर-॥ ७ ॥ इतने वृक्ष दातौन के लिये उत्तम कहे हैं और दातौन करने का विचार भी संक्षेप से कह दिया है ॥ ८ ॥ कांटे वाले सब वृक्ष पवित्र और दूध वाले सब वृक्ष यश के हेतु हैं। आठ अंगुल लंबी दातौन होनी चाहिये अथवा प्रादेशमात्र ( बित्ताभर ) लम्बी हो उन से दांतों को शुद्ध करे । हेमहर्षि लोगो ! पड़वा, पर्व (अमावस आदि) छठ और नवमी तिथि को ॥ १० ॥ दातौन करने से सात पीढ़ी तक के पुरुषों को दग्ध करता है।
हारीतस्मृतिः ॥ १३
अभावे दन्तकाष्ठानां प्रतिषिद्धदिनेषु च ॥ ११ ॥
अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखशुद्धिं समाचरेत् ।
स्नात्वा मन्त्रवदाचम्य पुनराचमनं चरेत् ॥ १२ ॥
मन्त्रवत्प्रोक्ष्य चात्मानं प्रक्षिपेदुदकाञ्जलिम् ।
आदित्येन सह प्रातर्मन्देहानां म राक्षसाः ॥ १३ ॥
युध्यन्ति वरदानेन ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ।
उदकाञ्जलिनिक्षेपा गायत्र्या चाभिमन्त्रिताः ॥ १४ ॥
निघ्नन्ति राक्षसान् सर्वान्मन्देहाख्यान् द्विजैरीताः ।
ततः प्रयाति सविता ब्राह्मणैरभिरक्षितः ॥ १५ ॥
मारीच्याद्यैर्महाभागैः सनकाद्यैश्च योगिभिः ।
तस्मान्न लङ्घयेत् सन्ध्यां सायं प्रातः समाहितः ॥ १६ ॥
उल्लङ्घयति यो मोहात् स याति नरकं ध्रुवम् ।
सायं मन्त्रवदाचम्य प्रोक्ष्य सूर्यस्य चाञ्जलिम् ॥ १७ ॥
दातून के न मिलने पर तथा प्रतिपदादि निषिद्ध दिनों में ॥ ११ ॥
पानी के बारह कुल्ले करके तथा मज्जन द्वारा मुख की शुद्धि करे। मन्त्रों से आचमन करके स्नान करे और स्नान के पीछे फिर आचमन करे ॥ १२ ॥
(आपोहिष्ठादि०) मन्त्रों से देह पर मार्जन करके सूर्य को जल की अंजली देवे। सूर्यनारायण के संग प्रातःकाल में मंदेह नाम वाले राक्षस ॥ १३ ॥ अव्यक्त ब्रह्म से प्रकट हुये ब्रह्मा जी के वरदान से युद्ध करते हैं। गायत्री मन्त्र पढ़ कर सूर्यनारायण के सम्मुख द्विजों से फेंकी जल की अंजली ॥ १४ ॥ उन सब मंदेह नामक राक्षसों को नष्ट करती हैं। इस कारण ब्राह्मणों से ॥ १५ ॥ तथा बड़े भाग्यशाली मरीचि आदि ऋषियों से तथा सनकादिक योगियों से भी रक्षित हुये सूर्यनारायण आकाश में निर्विघ्न गमन करते हैं। इस से सावधान हुआ द्विज सायं प्रातःकाल की संध्या का उल्लंघन त्याग न करे ॥ १६ ॥ जो पुरुष अज्ञान से संध्या को छोड़ता है वह निश्चय कर नरक में जाता है। सायंकाल को मन्त्रों से आचमन और शरीर पर मार्जन कर के सूर्य को अंजली ॥ १७ ॥
| १४ | भाषार्थसंहिता ॥ |
|---|
दत्वाप्रदक्षिणं कुर्याज्जलंसंस्पृष्टाविशुद्ध्यति ।
पूर्वां संध्यां सनक्षत्रा-मुपासीतयथाविधि ॥ १८ ॥
गायत्रीमभ्यसेत्तावद् यावदादित्यदर्शनम् ।
उपास्य पश्चिमां संध्यां सादित्यांचयथाविधि ॥ १९ ॥
गायत्रीमभ्यसेत्तावद्यावत्ताराणिपश्यति ।
ततश्चावसथंप्राप्य कृत्वाहौमंरवंयंबुधः ॥ २० ॥
सञ्चिन्तयपोषव्यवर्गस्य भरणार्थंविचक्षणः ।
ततःशिष्यहितार्थाय स्वाध्यायंकिञ्चिदाचरेत् ॥२१॥
ईश्वरंचैवकार्यार्थ मभिगच्छेद्विजोत्तमः ।
कुशपुष्पेन्धनादीनि गत्वादूरंसमाहरेत् ॥२२॥
ततोमाध्यान्हिकंकुर्याच्छुचौदेशेमनोरमे ।
विधिंतस्यप्रवक्ष्यामि समासात्पापनाशनम् ॥२३॥
स्नात्वायॆनविधानेन मुच्यतेसर्वकिल्विषात् ।
देकर प्रदक्षिणा करै फिर जल का स्पर्श कर के शुद्ध होता है। प्रातःकाल की सन्ध्या का उस समय विधि से आरम्भ करे जब आकाश में नक्षत्र दीखते हों ॥१८॥ फिर सूर्य का दर्शन होने समय तक खड़े हो के गायत्री का जपकरै। सायं-काल की संध्या को सूर्य के अस्त से पूर्व ही विधि से आरम्भ करके ॥१९॥ तारा गण दीखने समय तक बैठ के गायत्री का जप करे—फिर गृह्याग्नि के पास जाकर शास्त्रोक्त विधि से ज्ञानवान् द्विज स्वयं होम करै ॥ २० ॥ विचारशील पुरुष पुत्र भृत्य आदि के खान पान के अर्थ चिन्ता करके फिर शिष्य के हित के लिये कुछ वेद पाठ करे ॥२१॥ और ब्राह्मण संसारी कार्य के लिये ईश्वर नाम राजा के यहां जाय । तथा दूर जाकर कुशा, फल, इन्धन समिधा आदि को लाया करे ॥ २२ ॥ फिर शुद्ध एकान्त देश में जाकर मध्याह्न दोपहर का सन्ध्यादि कर्म करे । उसके पाप नाशक विधान को संक्षेप से कहिं गे ॥ २३ ॥ जिस विधि से स्नान करके सब पापों से छूटता है-स्नान के लिये
हारीतस्मृतिः ॥ १५
स्नानार्थं मृदमानीय शुद्धाक्षततिलैःसह ॥२४॥
सुमनाश्चततोगच्छेन्नदींशुद्धजलाधिकाम् ।
नद्यान्तुविद्यमानायां नस्नायादन्यवारिणि ॥२५॥
नस्नायादल्पतोयेषु विद्यमानेबहूदके ।
सरिद्वरंनदीस्नानं प्रतिस्रोतस्थितश्चरेत् ॥२६॥
तडागादिषुतोयेषु स्नायाच्चतदभावतः ।
शुचिंदेशंसमभ्युक्ष्य स्थापयेत्सकलांबरम् ॥२७॥
मृत्तोयेनस्वकंदेहं लिम्पेत्प्रक्षालययत्नतः ।
स्नानादिकंचसंप्राप्य कुर्यादाचमनंबुधः ॥२८॥
सोऽन्तर्जलं प्रविश्याथ वाग्यतो नियमेनहि ।
हरिं संस्मृत्यमनसामज्जयेच्चोरुमज्जले ॥२९॥
ततस्तोरंसमासाद्य आचम्यापःसमन्त्रतः ।
प्रोक्षयेद्दारुणैर्मन्त्रैः पावमानीभिरेवच ॥३०॥
कुशाग्रकृततोयेन प्रोक्ष्यात्मानंप्रयत्नतः ।
शुद्ध अक्षत और तिलों सहित मट्टी को लाकर ॥२४॥ उदार चित्त होके शुद्ध अधिक, जल वाली नदी पर जावे। नदी के होते अन्य जल में स्नान न करे ॥२५॥ और अधिक जल वाले जलाशय के होते अल्प जल वाले में स्नान न करे। उत्तम नदी में स्रोत (प्रवाह) के सम्मुख खड़ा होकर स्नान करे ॥२६॥ और नदी के अभाव में तालाब आदि के जल में पूर्व वा उत्तराभिमुख खड़ा होके स्नान करे शुद्ध स्थान को जल से छिड़क कर सब वस्त्र रख दे ॥२७॥ पहिले शरीर पर जल छोड़ के सब देह में मुख से लेकर जल में घोर के मट्टी लगावे फिर स्नान करके आचमन करे। २८ ॥ फिर वह पुरुष जल के भीतर घुस के मौन होकर नियम से हरि भगवान् का स्मरण करके जंघा तक जल में गोता लगावे ॥२९॥ फिर किनारे पर आकर मन्त्रों पूर्वक जल का आचमन करके वरुण देवता के मन्त्रों तथा पावमानी सूक्त से शरीर का मार्जन कुश ले के करे ॥३०॥ कुश के अग्र भाग के जल से यत्न से देह का मार्जन करके (स्योना
१६ | भाषार्थसहिता ॥
स्योनापृथिवीतिमृद्गात्रे इदंविष्णुरितिद्विजाः ॥ ३१ ॥
ततोनारायणंदेवं संस्मरेत्प्रतिमज्जनम् ।
निमज्ज्यांतर्जलेसम्यक् क्रियतेचाघमर्षणम् ॥ ३२ ॥
स्नात्वाक्षततिलैस्तद्वद्देवर्षिपितृभिःसह ।
तर्पयित्वाजलंतरमान्निष्पीड्यचसमाहितः ॥ ३३ ॥
जलतीरंसमासाद्य तत्रशुक्लेनवाससी ।
परिधायोत्तरीयं च कुर्यात्केशान्नधूनयेत् ॥ ३४ ॥
नरक्तमुल्वणंवासो ननीलंचप्रशस्यते ।
मलाक्तंगंधहीनंच वर्जयेदंबरंबुधः ॥ ३५ ॥
ततःप्रक्षालयेत्पादौ मृत्तोयेनविचक्षणः ।
दक्षिणंतुकुरंकृत्वा गोकर्णाकृतिवत्पुनः ॥ ३६ ॥
त्रिःपिबेदीक्षितंतोयमास्यं द्विःपरिमार्जयेत् ।
पादौशिरस्ततोऽभ्युक्ष्य त्रिभिरास्यमुपस्पृशेत् ॥३७॥
अंगुष्ठानामिकाभ्यांच चक्षुषीसमुपस्पृशेत् ।
तथैवपंचभिर्मूर्ध्नि स्पृशेदेवंसमाहितः ॥ ३८ ॥
पृथिवी० ) इस मंत्र से अथवा (इदंविष्णु ०) इस मंत्र से देह में गट्टी लगावे ॥३१॥ हर एक गोता लगाने में नारायण देव कास्मरण करे और जल के भीतरगो-ता लगाये हुए अघमर्षण मंत्र ( ऋतंचसत्यंचा० ) को जपै ॥ ३२ ॥ स्नान करके और वस्त्र को निचोड़ कर ॥३३॥ जल के किनारे पर आके सफेद वस्त्र (धोती) को पहन कर अंगोछा कन्धे पर डाल के केशों को न कंपावे ॥ ३४ ॥ अधिक लाल, नील वस्त्र श्रेष्ठ नहीं कहा है तथा मैले और गंधहीन वस्त्र को वर्जेद ३५ फिर विचारशील पुरुष मट्टी और जल से पग धोके दहिने हाथ को गौके कान के समान करके ॥३६॥ देखे हुए जल से तीन बार आचमन करे फिर दोबार मुख का मार्जन करे फिर पग और शिर पर जल का मार्जन कर बीच की तीन अंगुलियों से मुख का स्पर्श करे ॥ ३७ ॥ अंगूठा और अनामिका से दोनों नेत्रों का स्पर्श करे इसी प्रकार सावधान होकर पांचों अंगुलियों से मस्तक का स्पर्श करे ॥ ३८ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ १७
अनेनविधिनाचम्य ब्राह्मणःशुद्धमानसः । कुर्वीतदर्भपाणिस्तूदङ्मुखःप्राङ्मुखोऽपिवा ॥३६॥ प्राणायामत्रयंधीमान्यथान्यायमतंद्रितः । जपयज्ञंततःकुर्याद् गायत्रींवेदमातरम् ॥ ४० ॥ त्रिविधोजपयज्ञःस्यात्तस्यतत्वंनिबोधत । वाचिकश्चउपांशुश्च मानसश्चत्रिधाकृतिः ॥ ४१ ॥ त्रयाणामपियज्ञानां श्रेष्ठःस्यादुत्तरोत्तरः । यदुच्चनीचोच्चरितैः शब्दैःस्पष्टपदाक्षरैः ॥४२॥ मंत्रमुच्चारयन्वाचा जपयज्ञस्तु वाचिकः । शनैरुच्चारयन्मंत्रं किंचिदोष्ठौप्रचालयेत् ॥४३॥ किंचिच्छ्रवणयोग्यःस्यात् सउपांशुर्जपःस्मृतः । धियांपदाक्षरश्रेण्या अवर्णमपदाक्षरम् ॥४४॥ शब्दार्थचिन्तनाभ्यांतु तदुक्तं मानसंस्मृतम् ।
शुद्ध मन वाला ब्राह्मण इस विधि से आचमन करके कुशा हाथ में लेकर उत्तर वा पूर्व को मुख करके ॥३९॥ आलस्य को छोड़ के विधि पूर्वक तीन प्राणायाम करे फिर वेद माता गायत्री का जपयज्ञ करे ॥४०॥ तीन प्रकार का जपयज्ञ होता है उस के स्वरूप को तुम सुनो ! वाणी से साफ २ बोले उपांशु-धीमी वाणी से बोले और मन से ये तीन उस के भेद हैं ॥४१॥ इन तीनों यज्ञों में पिछला २ श्रेष्ठ है। जो उदात्त अनुदात्त स्वरित स्वरों सहित स्पष्ट पद और अक्षरों सहित ॥४२॥ वाणी से मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए जप किया जाता है वह वाचिक जप यज्ञ कहाता है और कुछ २ होठों को चला कर अति समीप के मनुष्य को सुनने योग्य धीरे २ मंत्र का उच्चारण कर के ॥४३॥ जो जप किया जाय उसे उपांशु जप कहते हैं—और जिस में वर्ण (पदों के अक्षर) प्रतीत न हों केवल बुद्धि से ही पदों के अक्षरों के सिलसिले से ॥४४॥ शब्द अर्थ का विचार जिस में हो उस जप यज्ञ को मानस कहते हैं। जप यज्ञ से स्तुति किया
३
१८ भाषार्थसहिता ॥
जपेनदेवतानित्यं स्तूयमानाप्रसीदति ॥४५॥
प्रसन्ने विपुलान्गोत्रान्प्राप्नुवन्तिमनोषिणः ।
राक्षसाःश्वपिशाचाश्च महासर्पाश्चभीषणाः ॥४६॥
जपितान्नोपसर्पन्ति दूरादेवप्रयांतित ।
छंदऋष्यादिविज्ञाय जपेन्मन्त्रमतंद्रितः ॥४७॥
जपेदहरहर्ज्ञात्वा गायत्रींमनसाद्वीजः ।
सहस्रपरमांदेवीं शतमध्यांदशावराम् ॥४८॥
गायत्रींयोजपेन्नित्यं सनपापेनलिप्यते ॥
अथपुष्पांजलिंकृत्वा भानवेचोर्ध्वबाहुकः ॥४९॥
उदुत्यंचजपेत्सूक्तं तच्चक्षुरितिचापरम्
प्रदक्षिणमुपावृत्य नमस्कुर्याद्दिवाकरम् ॥५०॥
ततस्तीर्थेनदेवाद्दीनद्भिः संतर्पयेद् द्विजः॥
स्नानवस्त्रं तुनिष्पीड्य पुनराचमनंचरेत् ॥५१॥
तद्वद्भक्तजनस्येह स्नानंदानंप्रकीर्तितम् ॥
हुआ देवता प्रसन्न होता है ॥ ४५ ॥ देवता के प्रसन्न होने पर बुद्धिमान् मनुष्य बहुत से वंश की वृद्धि को प्राप्त होते हैं । राक्षस, पिशाच, और भयानक बड़े २ सर्प ॥ ४६ ॥ जप करने से समीप नहीं आते किन्तु वे दूर से ही भाग जाते हैं । मन्त्रों के छंद और ऋषि आदि को जान कर आलस्य को त्याग के मंत्र को जपे ॥४७॥ ब्राह्मण छंद आदि को जानकर प्रति दिन मन से गायत्री को जपे १००० हजार गायत्रीका जप श्रेष्ठ है १०० का जपमध्यम और दश का जप अधम है ॥४८॥ जो नित्य गायत्री को जपता है वह पापसे लिप्त नहीं होता । फिर ऊपर को भुजा उठाकर अर्थात पुष्पों सहित अर्घ्य देके सूर्य की ओर हाथ जोड़ के ॥४९॥ (उदुत्यं०) और (तच्चक्षुः०) इन सूक्तों को जपे फिर प्रदक्षिणा करके सूर्य को नमस्कार करे ॥ ५० ॥ फिर ब्राह्मण तीर्थ के जल से देव आदि का तर्पण करे । पीछे स्नान के वस्त्र (धोती) को निचोड़ कर आचमन करे ॥ ५१ ॥ इसी प्रकार यहां भक्त जन का स्नान और दान कहा।
हारीतस्मृतिः ॥ १९
दर्भासीनोदर्भपाणि-र्ब्रह्मयज्ञविधानतः ॥ ५२॥ प्राङ्मुखोब्रह्मयज्ञं तु कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः ॥ ततोर्घ्यंभानवेद्यात्तिलपुष्पाक्षतान्वितम् ॥ ५३ ॥ उत्थायमूर्द्धपर्य्यतं हंसःशुचिषदित्यृचा । ततोदेवंनमस्कृत्य गृहंगच्छेत्ततःपुनः ॥ ५४ ॥ विधिनापुरुषसूक्तस्य गत्वाविष्णुंसमर्चयेत् । वैश्वदेवंततःकुर्याद्वलिकर्मविधानतः ॥ ५५ ॥ गोदोहमात्रसाकांक्षेदातिथिंप्रतिवैगृही । अदृष्टपूर्वमज्ञातमतिथिंप्राप्तमर्चयेत् ॥ ५६ ॥ स्वागतासनदानेन प्रत्युत्थानेनचांबुना । स्वागतेनाग्नयस्तुष्टा भवन्तिगृहमेधिनः ॥ ५७ ॥ आसनेनतुदत्तेन प्रीतोभवतिदेवराट् । पादशौचेनपितरः प्रीतिमायान्तिदुर्लभाम् ॥ ५८ ॥ अन्नदानेनयुक्तेन तृप्यतेहिप्रजापतिः ।
कुशाओं पर बैठ कर और कुशाओं को हाथ में लेकर ॥५२॥ और पूर्वाभिमुख हो के श्रद्धा से ब्रह्म यज्ञ करे फिर तिल पुष्प तथा अक्षतों से युक्त अर्घ्य सूर्यनारायण को देवे॥५३॥अंजुली में भरे अर्घ्य जल को मस्तक पर्यन्त उठाकर (हंसःशुचिषत्०-) इत्यादि ऋचा से सूर्य के सम्मुख छोड़े तदन्तर सूर्यदेव को नमस्कार करके घरको जावे ॥५४॥ घर जाकर विधि से पुरुष सूक्त (सहस्रशीर्षा०) से विष्णु का पूजन करे पश्चात् गृह्यसूक्तोक्त विधान से देवयज्ञादि चारो महायज्ञ करे ॥५५॥ जितने समय में गौ दुही जाय उतने समय तक गृहस्थी अतिथि की प्रतीक्षा करे । जिस को प्रथम नहीं देखा हो ऐसे अज्ञात (बेजाने) आये अतिथि को पूजे ॥ ५६ ॥ स्वागत करना-आसन देना-देख कर उठना-जल देना-इस प्रकार अतिथि का आदर करने से गृहस्थी के आवसथ्य गार्हपत्यादि अग्नि प्रसन्न होते हैं ॥ ५७ ॥ आसन देने से इन्द्रदेव प्रसन्न होते चरणों के धोने से दुर्लभ प्रीति को पितर प्राप्त होते ॥ ५८ ॥ और श्रेष्ठ अन्न के देने से ब्रह्मा प्र-
२७ भाषार्थसहिता ॥
तस्मादतिथयेकार्यं पूजनंगृहमेधिना ॥ ५९ ॥
भक्त्याचशक्तितोनित्यं पूजयेद्विष्णुमन्वहम् ।
भिक्षांचभिक्षवेद्यात्परिव्राड्ब्रह्मचारिणे ॥ ६० ॥
अकल्पितान्नादुद्धृत्य सव्यंजनसमन्विताम् ।
अकृतेवैश्वदेवेपि भिक्षौचगृहमागते ॥ ६१ ॥
उद्धृत्यवैश्वदेवार्थं भिक्षांदत्वाविसर्जयेत् ।
वैश्वदेवाकृतान्दोषांश्छक्तोभिक्षुर्व्यपोहितुम् ॥ ६२ ॥
नहिभिक्षुकृतान्दोषान्वैश्वदेवोव्यपोहति ।
तस्मात्प्राप्तायतयतये भिक्षांदद्यात्समाहितः ॥ ६३ ॥
विष्णोरेवयतिश्छाया इतिनिश्चित्यभावयेत् ।
सुवासिनींकुमारींच भोजयित्वानरानपि ॥ ६४ ॥
बालवृद्धांस्ततःशेषं स्वयंभुञ्जीतवागृही ।
प्राङ्मुखोदङ्मुखोवापि मौनीचमितभाषणः ॥६५॥
सन्न होते हैं इस से सद्गृहस्थों को अतिथि का पूजन अवश्य करना चाहिये ॥ ५९ ॥ भक्ति और अपनी शक्ति से नित्य विष्णु भगवान् का पूजन करे अनन्तर संन्यासी ब्रह्मचारी भिक्षु को भिक्षा देवे ॥ ६० ॥ वैश्वदेव के लिये अन्न निकालने से पहिले ही यदि कोई अभ्यागत संन्यासी घर पर आजाय तो वैश्वदेव किये बिना भी वैश्वदेव के लिये पृथक् पात्र में अन्न निकाल कर अतिथि को शाक भाजी सहित भिक्षा देके विसर्जन करे क्यों कि वैश्वदेव न करने से जो दोष लगता उस को अतिथि दूर करने को समर्थ है ॥ ६१ । ६२ ॥ परन्तु अतिथि को भिक्षान देने से जो अपराध गृहस्थ को लगता है उसे वैश्वदेव दूर नहीं कर सकता है । इस से प्राप्त हुये अतिथि को सावधानी से भिक्षा देवे ॥ ६३ ॥ विष्णु का रूप ही संन्यासी है निश्चय से ऐसी भावना करे। सुवासिन ( सुहागिन ) और कुमारी और अन्य आये पुरुष आदि को भोजन कराकर ॥ ६४ ॥ तथा घर के बालक वृद्धों को जिमा कर फिर बाकी बचे अन्न को पूर्व वा उत्तर को मुख कर मौन हो वा परिमित बोलता हुआ गृहस्थ पुरुष इस प्रकार भोजन करे कि ॥ ६५ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २१
अन्नमादौनमस्कृत्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
एवंप्राणाहुतिंकुर्यान्मन्त्रेणचपृथक्पृथक् ॥६६॥
ततःस्वादुकरान्नं च भुञ्जीतसुसमाहितः ।
आचम्यदेवतामिष्टां संस्मरन्तूदरंस्पृशेत् ॥६७॥
इतिहासपुराणाभ्यां किंचित्कालनयेद्बुधः ।
ततःसंध्यामुपासीत बहिर्गत्वाविधानतः ॥६८॥
कृतहोमस्तुभुञ्जीत रात्रौचातिथिभोजनम् ।
सायंप्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम् ॥६९॥
नांतराभोजनंकुर्यादग्निहोत्रसमोविधि ।
शिष्यानध्यापयेच्चापि अनध्यायेविसर्जयेत् ॥७०॥
स्मृत्युक्तानखिलांश्चापि पुराणोक्तानपिद्विजः ।
महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपिषष्ठ्यं सु ॥७१॥
प्रसन्न चित्त से प्रथम अन्न को नमस्कार करके प्राणाहुति ( प्राणा-
यस्वाहा ) इत्यादि मन्त्र पढ़ २ छोटे २ पांच ग्रास पृथक् २ मुख में
देवे ॥ ६६ ॥ फिर भले प्रकार सावधान हुआ अन्न का स्वाद ले २ कर भो-
जन करै पश्चात् आचमन करके इष्ट देवता का स्मरण करता हुआ उदर का
स्पर्श करै ॥ ६७ ॥ इस के अनन्तर कुछेक समय इतिहास (भारतादि) और
पुराणों के कहने सुनने में बितावे फिर ग्राम से बाहर जाकर विधि से संध्य
वंदन करै ॥ ६८ ॥ सन्ध्या का होम कर कोई अभ्यागत मिले तो उसे भोजन
कराके रात्रि को स्वयं भोजन करै सायं प्रातःकाल भोजन करना द्विजातियों
को वेद में कहा है ॥६९॥ बीच में (दिन में दुबारा) भोजन न करे क्यों कि अ-
ग्निहोत्र के पश्चात् प्राणाग्निहोत्र भोजन का विधान भी दो ही वार है।
शिष्यों को वेदादि पढ़ावे और अनध्याय में पढ़ाने की छुट्टी कर देवे ॥ ७० ॥
जो सब अनध्याय धर्मशास्त्र और पुराणों में कहे हैं कि महानवमी (कार्तिक
शुदी) द्वादशी, भरणी नक्षत्र, पर्व, (अमावस पौर्णमासी आदि) ॥ ७१ ॥
२२ भाषार्थसहिता ॥
तथाक्षयतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्विजः ।
माघमासेतुसप्तम्यां रथ्याख्यायांतुवर्जयेत् ॥७२॥
अध्यापनंसमभ्यस्यस्नानकालेचवर्जयेत् ।
नीयमानंशवंदृष्ट्वा महीस्थंवाद्बिजोत्तमाः ॥७३॥
नपठेद्रुदितंश्रुत्वा संध्यायांतुद्विजोत्तमाः ।
दानानिचप्रदेयानि गृहस्थेनद्विजोत्तमाः ॥७४॥
हिरण्यदानंगोदानं पृथिवीदानमेवच ।
एवंधर्मोगृहस्थस्य सारभूतउदाहृतः ॥ ७५ ॥
यएवं श्रद्धयाकुर्यात्सयातिब्रह्मणःपदम् ।
ज्ञानोत्कर्षश्चतस्यस्यान्नारसिंहप्रसादतः ॥ ७६ ॥
तस्मान्मुक्तिमवाप्नोति ब्राह्मणोद्विजसत्तमाः ।
एवंहिविप्राःकथितोमयावः समासतःशाश्वतधर्मराशिः॥७७॥
गृहीगृहस्थस्यसतोहिधर्मं कुर्वन्प्रयत्नाद्धरिमेतियुक्तम् ॥७८॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अक्षय तृतीया (वैशाख शुदी ३) इन में भी ब्राह्मण शिष्यों को न पढ़ावे माघ महीने की रथ सप्तमी को भी वर्जदे ॥ ७२ ॥ उबटना करने के और स्नान के समय न पढ़ावे हे ऋषियो ! लेजाते हुए वा पृथ्वी पर पड़े मुर्दा को देख कर ॥ ७३ ॥ अथवा रोने को सुन कर और संध्या के समय वेद वेदाङ्गों को न पढ़े और हे ब्राह्मणो निम्न लिखित दान गृहस्थ को देने चाहिये कि ॥७४॥ सुवर्ण गौ, पृथ्वी ये उत्तम दान हैं यह गृहस्थ का सारभूत धर्म कहा है ॥ ७५ ॥ जो श्रद्धा से इन धर्मको करता है वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है और नरसिंह भगवान् की कृपा से उसको ज्ञानकी अधिकता होती है ॥७६॥ हेऋषि ब्राह्मणो ! इस ज्ञानसे ब्राह्मण मुक्तिको प्राप्त होता है हेब्राह्मणो! इस प्रकार हमने सनातन धर्मका समूह तुमसे कहा ॥७७॥ गृहस्थी सद् गृहस्थ के धर्म को यत्न से करता हुआ विष्णु को अवश्य प्राप्त होता है ॥७८ ॥
इतिहारीते धर्मशास्त्रे ४ अध्याय भाषा समाप्ता ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २३
अतःपरं प्रवक्ष्यामि वानप्रस्थस्यसत्तमाः ।
धर्माश्रमं महाभागाः कथ्यमानं निबोधत ॥ १ ॥
गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन्दृष्ट्वा पलितमात्मनः ।
भार्यांपुत्रेषु निःक्षिप्य सहवाप्रविशेद्दनम् ॥ २ ॥
नखरोमाणिचतथा सितगात्रत्वगादिच ।
धारयन्जुहुयादग्निं वनस्थोविधिमाश्रितः ॥ ३ ॥
धान्यैश्चवनसंभूतैर्नीवाराद्यैरनिन्दितैः ।
शाकमूलफलैर्वापि कुर्यान्नित्यंप्रयत्नतः ॥४॥
त्रिकालस्नानयुक्तस्तु कुर्यात्तीव्रंतपस्तदा ।
पक्षांतेवासमश्नीयान्मासान्तेवास्वपक्वभुक् ॥ ५ ॥
तथाचतुर्थकालेतु भुञ्जीयादष्टमेऽथवा ।
षष्ठेचकालेऽप्यथवा वायुभक्षोऽथवाभवेत् ॥६॥
घर्मेपंचाग्निमध्यस्थस्तथावर्षेनिराश्रयः ।
हेमन्तेचजलेस्थित्वा नयेत्कालं तपश्चरन् ॥७॥
इससे आगे वानप्रस्थ के धर्म कहते हैं-हे श्रेष्ठो हे महाभाग्यशालीलोगो हमारे कहे वानप्रस्थ आश्रम के धर्म को तुम सुनो ॥ १ ॥ गृहस्थी पुरुष पुत्र पौत्र आदिको और अपनी वृद्ध अवस्था को देखकर स्त्री को पुत्रोंके आधीन करके या संग लेकर वन में चला जावे ॥ २ ॥ नख केश और सफेद गात्र वाले वृक्ष की त्वचा का वस्त्र धारण करता हुआ वन में ठहर कर शास्त्रोक्त विधि से अग्निहोत्र करै ॥३॥ वन में पैदा हुए शुद्ध नीवारादि अन्नसे वा शाक मूल फलों से यत्न के साथ अपना निर्वाह और सायंप्रातः होम करै ॥४॥ उस समय वनमें सायंप्रातः मध्याह्न में त्रिकाल स्नान करता हुआ तीव्र तप करै । पक्षके अंतमें वा महिने के अन्त में एकदिन स्वयं पकाया भोजन करे ॥५॥ चौथे काल (पहर) में अथवा आठवें प्रहर में अथवा छठे प्रहर में प्रतिदिन एकबार भोजन करै अथवा अन्न जल छोड़के केवल वायु का ही भक्षण करै ॥ ६ ॥ घाम ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य में वर्षा ऋतु में निराश्रय (खुलीभूमि) में और शीतकालमें जलके मध्य में बैठकर तप करता हुआ कालको बितावे ॥ ७ ॥
२४ भाषार्थसंहिता ॥
एवंचकुर्वतायेन कृतबुद्धिर्यथाक्रमम् अग्निंस्वात्मनिकृत्वातु प्रब्रजेदुत्तरांदिशम्॥८॥ आदेहपातंवनगो मौनमास्थायतपसः॥ स्मरन्नतींद्रियंब्रह्म ब्रह्मलोकेमहीयते ॥९॥ तपोहि यः सेवतिवन्यवासःसमाधियुक्तःप्रयतांतरत्मा। विमुक्तपापोविमलःप्रशांतः सयातिदिव्यं पुरुषंपुराणम् इति हारीते धर्मशास्त्रे पंचमोऽध्यायः॥५॥ अतःपरंप्रवक्ष्यामि चतुर्थाश्रममुत्तमम् । श्रद्धयातमनुष्ठाय तप्तन्मुच्येतबन्धनात् ॥१॥ एवंवनाश्रमेनिष्ठन्द्यातयंश्चैवकिल्विषम् ॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छे त्संन्यासविधिनाद्विजः ॥२॥ दत्वापितृभ्योदेवेभ्यो मानुषेभ्यश्चयत्नतः। दत्वाश्राद्धंघंपितृभ्यश्च मानुषेभ्यस्तथात्मनः ॥३॥
क्रम २ से इस प्रकार करते हुए जिसने बुद्धि को स्थिर किया है वह तपस्वी अग्नि को अपने आत्मा में मन्त्रपूर्वक समारोप करके संन्यासी होकर ॥ ८ ॥ मौन धारण किये देह के पतनपर्यन्त वनमें जिसको कोई इन्द्रियों से नहीं देख जान सकता ऐसे ब्रह्म को स्मरण करता हुआ उत्तर दिशा को चला जावे इस प्रकार शरीर त्याग देने से ब्रह्मलोक में आदर पाता है ॥९॥ जो वानप्रस्थ मन को वश में कर समाधि लगाके तप करता है-पापों से रहित, निर्मल और शांति रूप वह वानप्रस्थ सनातन दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है ॥ १० ॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे ५ अध्याय भाषासमाप्ता ॥ अब आगे उत्तम चौथे आश्रम (संन्यास) को कहते हैं उस संन्यास के धर्म को श्रद्धा से सेवन करके टिकता हुआ पुरुष बन्धन से छूटजाता है ॥१॥ इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम में ठहरता और पापको दूर करता हुआ ब्राह्मण संन्यास की विधि से चौथे आश्रम में जाय संन्यासी हो जावे ॥२॥ पितर देवता मनुष्य इन के निमित्त दान दे के और दिव्य पितर मनुष्य पितर और अपने लिये जीवित ही श्राद्ध करके ॥ ३ ॥
६
हारीतस्मृतिः ॥ २५
इष्टिंवैश्वानरींकृत्वा प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपिवा । अग्निंस्वात्मनिसंरोप्य मन्त्रवित्प्रव्रजेत्पुमः॥४॥ ततःप्रभृतिपुत्रादौ स्नेहालापादिवर्जयेत् । बन्धूनामभयं दद्यात्सर्वभूताभयं तथा ॥ ५ ॥ त्रिदण्डं वैष्णवं सम्यक् संततं समपर्वकम् ॥ वेष्टितं कृष्णगोवाल रज्जु मचतुरंगुलम् ॥ ६ ॥ शौचार्थमासनार्थंच मुनिभिःसमुदाहृतम् । कौपीनाच्छादनंवासः कंथांशीतनिवारिणीम् ॥७॥ पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम् । एतानितस्यलिंगानि यतेःप्रोक्तानि सर्वदा ॥ ७ ॥ संगृह्यकृतसंन्यासो गत्वातीर्थमनुत्तमम् । स्नात्वाचम्यचविधिवद्वस्त्रपूतेनवारिणा ॥ ८ ॥ तर्पयित्वा तु देवांश्च मंत्रवद्भास्करंनमेत् ।
श्रौतविधि के अनुसार वैश्वानरी इष्टि करके पूर्व वा उत्तर को मुख कर मन्त्र पूर्वक गार्हपत्यादि अग्नियों को अपने शरीर में समारोप कर के [अग्नियों के समारोप की रीति यह है कि अग्निकुण्ड पर पेट करके (अयन्ते योनिर्ऋ त्वियो०) मन्त्र पढ़ के गृहहस्थ्य अग्नि अपने में आगये मान लेवे] संन्यासी होजावे ॥ ४ ॥ तब से लेकर पुत्रादि में प्रीति और वार्त्तालापादि व्यवहार को त्याग देवे और अपने भाई बंधों और सब प्राणियों को अभय दान देवे ॥ ५ ॥ ऐसा बांस का त्रिदण्ड ग्रहण करे जिस में चार अंगुल कपड़ा और काली गौ के बालों की रस्सी लगी हो जिस की ग्रंथि सम हों ॥६॥ शुद्धि के अर्थ और बिछाने के लिये मुनियों के कहे हुए कौपीन शीत को दूर करने वाली कंथा (गुदड़ी) और पादुका (खड़ाऊं) इन को ग्रहण करे इस से अधिक का संग्रह न करे । ये संन्यासी के सदैव काल के चिन्ह कहे हैं ॥७॥ संन्यासी हुआ इन कौपीनादि को ग्रहण कर उत्तम तीर्थ में जाके वस्त्र से छाने जल से विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ॥ ८ ॥ मन्त्रों से देवताओं का तर्पण करके परमात्मरूप सूर्यदेव को नम-
४
२६ भाषाधर्मसंहिता ॥
आत्मानंप्राङ्मुखोमौनौ प्राणायामत्रयंचरेत् ॥ ९ ॥
गायत्रींचयथाशक्ति जप्त्वाध्यायेत्परंपदम् ।
स्थित्यर्थमात्मनोनित्यं भिक्षाटनमथाचरेत् ॥ १० ॥
सायंकालेतुविप्राणां गृहाण्यभ्यवपद्यतु ।
सम्यग्याचेच्चकवलं दक्षिणेनकरेणवै ॥ ११ ॥
पात्रंवामकरेस्थाप्य दक्षिणेनतुशोधयेत् ।
यावत्तान्नेनतृप्तिःस्या-त्तावद्वैक्षंसमाचरेत् ॥ १२ ॥
ततोनिवृत्यतत्पात्रं संस्थाप्यान्यत्रसंयमी ।
चतुर्भिरंगुलैश्छाद्य ग्रासमात्रंसमाहितः ॥ १३ ॥
सर्वव्यंजनसंयुक्तं पृथक्पात्रे नियोजयेत् ।
सूर्यादिभूतदेवेभ्यो दत्त्वासंप्रोक्ष्यवारिणा ॥ १४ ॥
भुञ्जीतपात्रपुटके पात्रेवावाग्यतोयतिः ।
वटकाश्वत्थपर्णेषु कुंभीतैन्दुकपात्रके ॥ १५ ॥
कोविदारकदंबेषु नभुञ्जीतकदाचन ।
स्कार करे । पूर्वाभिमुख और मौन होकर तीन प्राणायाम करे ॥ ९ ॥ यथा-शक्ति गायत्री जप कर परंपद ( ब्रह्म ) का ध्यान करे देह की स्थिति के लिये नित्य भिक्षा मांगे ॥ १० ॥ सायंकाल के समय ब्राह्मणों के घरों में जाकर दहिने हाथ से भले प्रकार कवल (ग्रास) मांगे ॥११॥ बायें हाथमें पात्र को रख कर उसे दहिने हाथ से पोंछे फिर उसमें मागी हुई भिक्षा रोटी आदि घरे जितने अन्न से तृप्ति हो उतनी ही भिक्षा नित्य मांगे कौवे कुत्ते आदिके लिये अधिक न मांगे॥१२॥ फिर संयमी पुरुष ग्राम से लौट कर उस पात्र को दूसरी जगह रखकर और सावधानी से सब व्यंजनों सहित एक ग्रास अन्न लेके सूर्यादि भूत देवताओं के लिये किसी दोना पत्ता में पृथक् धर के चार अंगुलों से ढांप कर देवता को समर्पण करे फिर शेष अन्न को जल से छिड़क के ॥ १३ ॥ ॥ १४ ॥ पत्तों के दोने में अथवा पात्र से मौन होकर संन्यासी भोजन करे बड़, पीपल, कटहल, तेंदु ॥१५॥ कचनार कदंब-इनके पत्तों में वा इन से बने दोना पत्तलों
हारीतस्मृतिः ॥
२७
मलाक्ताःसर्वउच्यंते यतयः कांस्यभोजिनः ॥ १६ ॥
कांस्यभांडेषुयत्पाको गृहस्थस्यतथैवच ।
कांस्येभोजयतःसर्व्वं किल्विषंप्राप्नुयात्तयोः ॥ १७ ॥
भुक्त्वापात्रंयतिर्नित्यं क्षालयेन्मंत्रपूर्वकम् ।
नदुष्यतेचतत्पात्रं यज्ञेषुचमसाइव ॥ १८ ॥
अथाचम्यनिदिध्यास्य उपतिष्ठेतभास्करम् ।
जपध्यानेतिहासैश्च दिनशेषंनयेद्बुधः ॥ १९ ॥
कृतसंध्यस्ततोरात्रीं नयेद्देवगृहादिषु ।
हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायेदात्मानमव्ययम् ॥ २० ॥
यदिधमंरतिःशांतः सर्वभूतसमोवशी ।
प्राप्नोतिपरमंस्थानं यत्प्राप्यननिवर्तते ॥ २१ ॥
त्रिदंडभूत्वाहिपृथक्समाचरेच्छनैःशनैर्यस्तु बहिर्मुखाक्षः।
में कभी भी भोजन न करे-और कांसे के पात्र में भोजन करने वाले संन्यासी मलिन कहे हैं ॥१६॥ कांसे के पात्रमें पकाने वाले और जिमाने वाले गृहस्थी को जो पाप है उन दोनों के पाप को कांसे के पात्रमें भोजन करने वाला संन्यासी प्राप्त होता है ॥१७॥ संन्यासी जिस पात्र में भोजन करे उस को मंत्रों से धोडा ले। यज्ञों में सोम पीने के चमसों के तुल्य संन्यासी का वह पात्र दूषित (अशुद्ध) नहीं होता ॥ १८ ॥ इस के अनन्तर आचमन और ध्यान कर के सूर्य्य देव की स्तुति करे और शेष दिन को जप ध्यान तथा उत्तम इतिहासों के कहने सुनने में बितावे॥ १९॥ फिर संध्या करके इसी प्रकार घर आदि में रात्रि को बितावे-अपने कमल रूपी हृदय में अविनाशी आत्मा का ध्यान करे ॥ २० ॥ जो संन्यासी धर्म में तत्पर, शांत, सब भूतों में सम, वशी ( इन्द्रिय जिस के वश में हों ऐसा ) हो तो वह उस उत्तम स्थान को प्राप्त होता है जहां जा- कर फिर नहीं लौटते ॥ २१ ॥ जो त्रिदण्डी हो सब से पृथक विचरे और धीरे २ जिस के इन्द्रिय संसार के विषयों से विरक्त हुए हों वह संसार के सब
२८
भाषार्थसहिता ॥
संमुच्य संसारसमस्तबंधनात्सयातिविष्णोरमृतात्मनः पदं
इति हारीतेधर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच कथितंधर्मलक्षणम् ।
येनस्वर्गापवर्गौच प्राप्नुवंतिद्विजातयः ॥ १ ॥
योगशास्त्रंप्रवक्षामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्
यस्यचश्रवणाद्यान्ति मोक्षंचैवमुमुक्षवः ॥ २ ॥
योगाभ्यासबलेनैव नश्येयुःपातकानितु ।
तस्माद्योगपरोभूत्वा ध्यायेन्नित्यक्रियापरः ॥ ३ ॥
प्राणायामेनवचनंप्रत्याहारेणचेन्द्रियम् ।
धारणाभिर्वशेकृत्वा पूर्वंदुर्धर्षणंमनः ॥ ४ ॥
एकाकारमनामंदबुधैरुपमलाचयम् ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरंध्यायेज्जगदाधारमुच्यते ॥ ५ ॥
आत्मनोबहिरन्तस्थं शुद्धचामीकरप्रभम् ।
रहस्येकान्तमासीनो ध्यायेदामरणान्तिकम् ॥६॥
बंधनों को तोड़ कर अमृत रूपी विष्णु के पद को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ६ अध्याय भाषा समाप्त ॥
वर्ण और आश्रम के धर्मों का स्वरूप कहा द्विज लोग जिस धर्म से स्वर्ग वा मोक्ष को पाते हैं ॥ १ ॥ अब संक्षेप से योग शास्त्र का उत्तम सार कहते हैं कि जिस के सुनने से मोक्ष चाहने वाले मुक्त होते हैं ॥ २ ॥ योगाभ्यास के बल से ही पाप नष्ट होते हैं इस से योग में तत्पर होकर उत्तम आचरण से नित्य ध्यान करे ॥ ३ ॥ प्रथम प्राणायाम से वाणी को प्रत्याहार (विषयों से इन्द्रियों को हटाने) द्वारा उपस्थेन्द्रिय को धारणा (किसी खास वस्तु में मन को बांधने) से वश करने अयोग्य मन को वश में करके ॥ ४ ॥ एकाग्र चित्त होकर देवताओं को भी अगम्य (प्राप्ति के अयोग्य) और सूक्ष्म जो जगत् का आश्रय भगवान् तिस का ध्यान करे ॥ ५ ॥ जो ब्रह्म अपने स्वरूप से बाहर और भीतर स्थित है और शुद्ध सोने के समान जिस की कांति है ऐसे ब्रह्म का मरण पर्यन्त एकान्त में एकाग्र बैठ कर ध्यान करे ॥ ६ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २६
यत्तत्सर्वप्राणिहृदयं सर्वेषांचहृदिस्थितम् ।
यच्चसर्वजनैर्ज्ञेयं सोऽहमस्मीतिचिंतयेत् ॥ ७ ॥
आत्मलाभसुखंयाव-त्तपोध्यानमुदीरितम् ।
श्रुतिस्मृत्यादिकंधमं तद्विरुद्धंनचाचरेत् ॥ ८ ॥
यथारथोऽश्वहीनस्तु यथाश्वोरथिहीनकः ।
एवंतपश्चविद्याच संयुतेभेषजंभवेत् ॥ ९ ॥
यथान्नंमधुसंयुक्तं मधुवान्नेनसंयुतम् ।
उभाभ्यामपिपक्षाभ्यां यथाखेपक्षिणांगतिः ॥ १० ॥
तथैवज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यतेब्रह्मशाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यांसंपन्नो ब्राह्मणोयोगतत्परः ॥ ११ ॥
देहद्वयंविहायाशु मुक्तोभवतिबंधनात् ।
नतथाक्षीणदेहस्य विनाशोविद्यते क्वचित् ॥ १२ ॥
मयातु कथितःसर्वो वर्णाश्रमविभागशः ।
जो सब प्राणियों का हृदय है और जो सब के हृदय में स्थित है और जो सब जनों के जानने योग्य है वही मैं हूं ऐसा चिंतन ( स्मरण ) करै ॥ ७ ॥
जब तक आत्मप्राप्ति का सुख न हो तब तक ध्यान करे यह शास्त्रकारों ने कहा है । आत्मलाभ का अविरोधी जो श्रुति और स्मृति का धर्म उस को करे किन्तु गृहस्थादि का धर्म न करे ॥ ८ ॥
जैसे घोड़े के विना रथ और सारथि के विना घोड़ा नहीं चल सकते और दोनों परस्पर सहायक हैं-इसी प्रकार तप नाम कर्मकाण्ड विद्या ( ज्ञान ) दोनों मिलकर संसार रोग की औषध हैं ॥ ९ ॥
जैसे मीठे से मिला अन्न तथा मीठा और जैसे दोनों ही पंखों से आकाश में पक्षियों की गति ( उड़ना ) होती है ॥ १० ॥
तैसे ही ज्ञान और तप से युक्त और योग में तत्पर ब्राह्मण ॥ ११ ॥
दोनों ( स्थूल—सूक्ष्म ) देहों को शीघ्र छोड़कर बन्धनों से छूट जाता है । इस प्रकार जिस का देह नष्ट होगया हो उस का कभी भी नाश ( कुगति ) नहीं होता ॥ १२ ॥
हे ऋषि मुनियो ! हमने वर्ण और आश्रम के भेद और संक्षेप
३० भाषार्थसहिता ॥
संक्षेपेणद्विजश्रेष्ठा धर्मस्तेषांसनातनः ॥ १३ ॥
श्रुत्वैवंमुनयोधर्मं स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्यतमृषिं जग्मुर्मुदिताःस्वंस्वमाश्रमम् ॥ १४ ॥
धर्मशास्त्रमिदंसर्वं हारीतमुखनिःसृतम् ।
अधीत्यकुरुतेधर्मं सयातिपरमांगतिम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मणस्यतुयत्कर्म कथितंबाहुजस्यच ।
ऊरुजस्यापियत्कर्म कथितंपादजस्यच ॥ १६ ॥
अन्यथावर्तमानस्तु सद्यःपततिजातितः ।
योयस्याभिहितोधर्मः सतुतस्यतथैवच ॥ १७ ॥
तस्मात्स्वधर्मंकुर्वीत द्विजोनित्यमनापदि ।
राजेन्द्रवर्णाश्चत्वारश्चत्वारश्चापिचाश्रमाः ॥१८॥
स्वधर्मं येनुतिष्ठंति तेयांतिपरमांगतिम् ।
स्वधर्मेणयथानृणां नारसिंहःप्रसीदति ॥१९॥
से उन का सनातन सब धर्म तुम से कहा ॥ १३ ॥ स्वर्ग और मोक्षरूपदाता धर्म को इस प्रकार सुन कर उन हारीत मुनि को नमस्कार करके प्रसन्न हुए सब मुनि अपने २ आश्रम को चलेगये ॥ १४ ॥ हारीत मुनि के मुख से निकले इस सब धर्मशास्त्र को पढ़कर जो धर्म करता है वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को जो कर्म इस में कहा है ॥ १६ ॥ उस के विरुद्ध जो बर्ताव करता है वह शीघ्र जाति से पतित होता है । जो जिस वर्ण का धर्म कहा है वह वैसा ही उस वर्ण का धर्म है उस में लौट पौट कुछ में की जाय तो वह उस का धर्म न होगा ॥ १७ ॥ आपत्काल को छोड़ कर प्रति दिन द्विज लोग अपने २ धर्म को करें राजा है मुख्य जिन में ऐसे-चार वर्ण और चार ही आश्रम हैं ॥ १८ ॥ अपने धर्म को जो करते हैं वे परम गति को प्राप्त होते हैं जैसे अपने धर्म से मनुष्यों पर नरसिंह भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १९ ॥