अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ २६
यत्तत्सर्वप्राणिहृदयं सर्वेषांचहृदिस्थितम् ।
यच्चसर्वजनैर्ज्ञेयं सोऽहमस्मीतिचिंतयेत् ॥ ७ ॥
आत्मलाभसुखंयाव-त्तपोध्यानमुदीरितम् ।
श्रुतिस्मृत्यादिकंधमं तद्विरुद्धंनचाचरेत् ॥ ८ ॥
यथारथोऽश्वहीनस्तु यथाश्वोरथिहीनकः ।
एवंतपश्चविद्याच संयुतेभेषजंभवेत् ॥ ९ ॥
यथान्नंमधुसंयुक्तं मधुवान्नेनसंयुतम् ।
उभाभ्यामपिपक्षाभ्यां यथाखेपक्षिणांगतिः ॥ १० ॥
तथैवज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यतेब्रह्मशाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यांसंपन्नो ब्राह्मणोयोगतत्परः ॥ ११ ॥
देहद्वयंविहायाशु मुक्तोभवतिबंधनात् ।
नतथाक्षीणदेहस्य विनाशोविद्यते क्वचित् ॥ १२ ॥
मयातु कथितःसर्वो वर्णाश्रमविभागशः ।
जो सब प्राणियों का हृदय है और जो सब के हृदय में स्थित है और जो सब जनों के जानने योग्य है वही मैं हूं ऐसा चिंतन ( स्मरण ) करै ॥ ७ ॥
जब तक आत्मप्राप्ति का सुख न हो तब तक ध्यान करे यह शास्त्रकारों ने कहा है । आत्मलाभ का अविरोधी जो श्रुति और स्मृति का धर्म उस को करे किन्तु गृहस्थादि का धर्म न करे ॥ ८ ॥
जैसे घोड़े के विना रथ और सारथि के विना घोड़ा नहीं चल सकते और दोनों परस्पर सहायक हैं-इसी प्रकार तप नाम कर्मकाण्ड विद्या ( ज्ञान ) दोनों मिलकर संसार रोग की औषध हैं ॥ ९ ॥
जैसे मीठे से मिला अन्न तथा मीठा और जैसे दोनों ही पंखों से आकाश में पक्षियों की गति ( उड़ना ) होती है ॥ १० ॥
तैसे ही ज्ञान और तप से युक्त और योग में तत्पर ब्राह्मण ॥ ११ ॥
दोनों ( स्थूल—सूक्ष्म ) देहों को शीघ्र छोड़कर बन्धनों से छूट जाता है । इस प्रकार जिस का देह नष्ट होगया हो उस का कभी भी नाश ( कुगति ) नहीं होता ॥ १२ ॥
हे ऋषि मुनियो ! हमने वर्ण और आश्रम के भेद और संक्षेप