भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥

संमुच्य संसारसमस्तबंधनात्सयातिविष्णोरमृतात्मनः पदं
इति हारीतेधर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच कथितंधर्मलक्षणम् ।
येनस्वर्गापवर्गौच प्राप्नुवंतिद्विजातयः ॥ १ ॥
योगशास्त्रंप्रवक्षामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्
यस्यचश्रवणाद्यान्ति मोक्षंचैवमुमुक्षवः ॥ २ ॥
योगाभ्यासबलेनैव नश्येयुःपातकानितु ।
तस्माद्योगपरोभूत्वा ध्यायेन्नित्यक्रियापरः ॥ ३ ॥
प्राणायामेनवचनंप्रत्याहारेणचेन्द्रियम् ।
धारणाभिर्वशेकृत्वा पूर्वंदुर्धर्षणंमनः ॥ ४ ॥
एकाकारमनामंदबुधैरुपमलाचयम् ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरंध्यायेज्जगदाधारमुच्यते ॥ ५ ॥
आत्मनोबहिरन्तस्थं शुद्धचामीकरप्रभम् ।
रहस्येकान्तमासीनो ध्यायेदामरणान्तिकम् ॥६॥


बंधनों को तोड़ कर अमृत रूपी विष्णु के पद को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ६ अध्याय भाषा समाप्त ॥

वर्ण और आश्रम के धर्मों का स्वरूप कहा द्विज लोग जिस धर्म से स्वर्ग वा मोक्ष को पाते हैं ॥ १ ॥ अब संक्षेप से योग शास्त्र का उत्तम सार कहते हैं कि जिस के सुनने से मोक्ष चाहने वाले मुक्त होते हैं ॥ २ ॥ योगाभ्यास के बल से ही पाप नष्ट होते हैं इस से योग में तत्पर होकर उत्तम आचरण से नित्य ध्यान करे ॥ ३ ॥ प्रथम प्राणायाम से वाणी को प्रत्याहार (विषयों से इन्द्रियों को हटाने) द्वारा उपस्थेन्द्रिय को धारणा (किसी खास वस्तु में मन को बांधने) से वश करने अयोग्य मन को वश में करके ॥ ४ ॥ एकाग्र चित्त होकर देवताओं को भी अगम्य (प्राप्ति के अयोग्य) और सूक्ष्म जो जगत् का आश्रय भगवान् तिस का ध्यान करे ॥ ५ ॥ जो ब्रह्म अपने स्वरूप से बाहर और भीतर स्थित है और शुद्ध सोने के समान जिस की कांति है ऐसे ब्रह्म का मरण पर्यन्त एकान्त में एकाग्र बैठ कर ध्यान करे ॥ ६ ॥