भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

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हारीतस्मृतिः ॥
२७

मलाक्ताःसर्वउच्यंते यतयः कांस्यभोजिनः ॥ १६ ॥
कांस्यभांडेषुयत्पाको गृहस्थस्यतथैवच ।
कांस्येभोजयतःसर्व्वं किल्विषंप्राप्नुयात्तयोः ॥ १७ ॥
भुक्त्वापात्रंयतिर्नित्यं क्षालयेन्मंत्रपूर्वकम् ।
नदुष्यतेचतत्पात्रं यज्ञेषुचमसाइव ॥ १८ ॥
अथाचम्यनिदिध्यास्य उपतिष्ठेतभास्करम् ।
जपध्यानेतिहासैश्च दिनशेषंनयेद्बुधः ॥ १९ ॥
कृतसंध्यस्ततोरात्रीं नयेद्देवगृहादिषु ।
हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायेदात्मानमव्ययम् ॥ २० ॥
यदिधमंरतिःशांतः सर्वभूतसमोवशी ।
प्राप्नोतिपरमंस्थानं यत्प्राप्यननिवर्तते ॥ २१ ॥
त्रिदंडभूत्वाहिपृथक्समाचरेच्छनैःशनैर्यस्तु बहिर्मुखाक्षः।


में कभी भी भोजन न करे-और कांसे के पात्र में भोजन करने वाले संन्यासी मलिन कहे हैं ॥१६॥ कांसे के पात्रमें पकाने वाले और जिमाने वाले गृहस्थी को जो पाप है उन दोनों के पाप को कांसे के पात्रमें भोजन करने वाला संन्यासी प्राप्त होता है ॥१७॥ संन्यासी जिस पात्र में भोजन करे उस को मंत्रों से धोडा ले। यज्ञों में सोम पीने के चमसों के तुल्य संन्यासी का वह पात्र दूषित (अशुद्ध) नहीं होता ॥ १८ ॥ इस के अनन्तर आचमन और ध्यान कर के सूर्य्य देव की स्तुति करे और शेष दिन को जप ध्यान तथा उत्तम इतिहासों के कहने सुनने में बितावे॥ १९॥ फिर संध्या करके इसी प्रकार घर आदि में रात्रि को बितावे-अपने कमल रूपी हृदय में अविनाशी आत्मा का ध्यान करे ॥ २० ॥ जो संन्यासी धर्म में तत्पर, शांत, सब भूतों में सम, वशी ( इन्द्रिय जिस के वश में हों ऐसा ) हो तो वह उस उत्तम स्थान को प्राप्त होता है जहां जा- कर फिर नहीं लौटते ॥ २१ ॥ जो त्रिदण्डी हो सब से पृथक विचरे और धीरे २ जिस के इन्द्रिय संसार के विषयों से विरक्त हुए हों वह संसार के सब