अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ भाषाधर्मसंहिता ॥
आत्मानंप्राङ्मुखोमौनौ प्राणायामत्रयंचरेत् ॥ ९ ॥
गायत्रींचयथाशक्ति जप्त्वाध्यायेत्परंपदम् ।
स्थित्यर्थमात्मनोनित्यं भिक्षाटनमथाचरेत् ॥ १० ॥
सायंकालेतुविप्राणां गृहाण्यभ्यवपद्यतु ।
सम्यग्याचेच्चकवलं दक्षिणेनकरेणवै ॥ ११ ॥
पात्रंवामकरेस्थाप्य दक्षिणेनतुशोधयेत् ।
यावत्तान्नेनतृप्तिःस्या-त्तावद्वैक्षंसमाचरेत् ॥ १२ ॥
ततोनिवृत्यतत्पात्रं संस्थाप्यान्यत्रसंयमी ।
चतुर्भिरंगुलैश्छाद्य ग्रासमात्रंसमाहितः ॥ १३ ॥
सर्वव्यंजनसंयुक्तं पृथक्पात्रे नियोजयेत् ।
सूर्यादिभूतदेवेभ्यो दत्त्वासंप्रोक्ष्यवारिणा ॥ १४ ॥
भुञ्जीतपात्रपुटके पात्रेवावाग्यतोयतिः ।
वटकाश्वत्थपर्णेषु कुंभीतैन्दुकपात्रके ॥ १५ ॥
कोविदारकदंबेषु नभुञ्जीतकदाचन ।
स्कार करे । पूर्वाभिमुख और मौन होकर तीन प्राणायाम करे ॥ ९ ॥ यथा-शक्ति गायत्री जप कर परंपद ( ब्रह्म ) का ध्यान करे देह की स्थिति के लिये नित्य भिक्षा मांगे ॥ १० ॥ सायंकाल के समय ब्राह्मणों के घरों में जाकर दहिने हाथ से भले प्रकार कवल (ग्रास) मांगे ॥११॥ बायें हाथमें पात्र को रख कर उसे दहिने हाथ से पोंछे फिर उसमें मागी हुई भिक्षा रोटी आदि घरे जितने अन्न से तृप्ति हो उतनी ही भिक्षा नित्य मांगे कौवे कुत्ते आदिके लिये अधिक न मांगे॥१२॥ फिर संयमी पुरुष ग्राम से लौट कर उस पात्र को दूसरी जगह रखकर और सावधानी से सब व्यंजनों सहित एक ग्रास अन्न लेके सूर्यादि भूत देवताओं के लिये किसी दोना पत्ता में पृथक् धर के चार अंगुलों से ढांप कर देवता को समर्पण करे फिर शेष अन्न को जल से छिड़क के ॥ १३ ॥ ॥ १४ ॥ पत्तों के दोने में अथवा पात्र से मौन होकर संन्यासी भोजन करे बड़, पीपल, कटहल, तेंदु ॥१५॥ कचनार कदंब-इनके पत्तों में वा इन से बने दोना पत्तलों