अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ २५
इष्टिंवैश्वानरींकृत्वा प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपिवा । अग्निंस्वात्मनिसंरोप्य मन्त्रवित्प्रव्रजेत्पुमः॥४॥ ततःप्रभृतिपुत्रादौ स्नेहालापादिवर्जयेत् । बन्धूनामभयं दद्यात्सर्वभूताभयं तथा ॥ ५ ॥ त्रिदण्डं वैष्णवं सम्यक् संततं समपर्वकम् ॥ वेष्टितं कृष्णगोवाल रज्जु मचतुरंगुलम् ॥ ६ ॥ शौचार्थमासनार्थंच मुनिभिःसमुदाहृतम् । कौपीनाच्छादनंवासः कंथांशीतनिवारिणीम् ॥७॥ पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम् । एतानितस्यलिंगानि यतेःप्रोक्तानि सर्वदा ॥ ७ ॥ संगृह्यकृतसंन्यासो गत्वातीर्थमनुत्तमम् । स्नात्वाचम्यचविधिवद्वस्त्रपूतेनवारिणा ॥ ८ ॥ तर्पयित्वा तु देवांश्च मंत्रवद्भास्करंनमेत् ।
श्रौतविधि के अनुसार वैश्वानरी इष्टि करके पूर्व वा उत्तर को मुख कर मन्त्र पूर्वक गार्हपत्यादि अग्नियों को अपने शरीर में समारोप कर के [अग्नियों के समारोप की रीति यह है कि अग्निकुण्ड पर पेट करके (अयन्ते योनिर्ऋ त्वियो०) मन्त्र पढ़ के गृहहस्थ्य अग्नि अपने में आगये मान लेवे] संन्यासी होजावे ॥ ४ ॥ तब से लेकर पुत्रादि में प्रीति और वार्त्तालापादि व्यवहार को त्याग देवे और अपने भाई बंधों और सब प्राणियों को अभय दान देवे ॥ ५ ॥ ऐसा बांस का त्रिदण्ड ग्रहण करे जिस में चार अंगुल कपड़ा और काली गौ के बालों की रस्सी लगी हो जिस की ग्रंथि सम हों ॥६॥ शुद्धि के अर्थ और बिछाने के लिये मुनियों के कहे हुए कौपीन शीत को दूर करने वाली कंथा (गुदड़ी) और पादुका (खड़ाऊं) इन को ग्रहण करे इस से अधिक का संग्रह न करे । ये संन्यासी के सदैव काल के चिन्ह कहे हैं ॥७॥ संन्यासी हुआ इन कौपीनादि को ग्रहण कर उत्तम तीर्थ में जाके वस्त्र से छाने जल से विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ॥ ८ ॥ मन्त्रों से देवताओं का तर्पण करके परमात्मरूप सूर्यदेव को नम-
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