अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ भाषार्थसंहिता ॥
एवंचकुर्वतायेन कृतबुद्धिर्यथाक्रमम् अग्निंस्वात्मनिकृत्वातु प्रब्रजेदुत्तरांदिशम्॥८॥ आदेहपातंवनगो मौनमास्थायतपसः॥ स्मरन्नतींद्रियंब्रह्म ब्रह्मलोकेमहीयते ॥९॥ तपोहि यः सेवतिवन्यवासःसमाधियुक्तःप्रयतांतरत्मा। विमुक्तपापोविमलःप्रशांतः सयातिदिव्यं पुरुषंपुराणम् इति हारीते धर्मशास्त्रे पंचमोऽध्यायः॥५॥ अतःपरंप्रवक्ष्यामि चतुर्थाश्रममुत्तमम् । श्रद्धयातमनुष्ठाय तप्तन्मुच्येतबन्धनात् ॥१॥ एवंवनाश्रमेनिष्ठन्द्यातयंश्चैवकिल्विषम् ॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छे त्संन्यासविधिनाद्विजः ॥२॥ दत्वापितृभ्योदेवेभ्यो मानुषेभ्यश्चयत्नतः। दत्वाश्राद्धंघंपितृभ्यश्च मानुषेभ्यस्तथात्मनः ॥३॥
क्रम २ से इस प्रकार करते हुए जिसने बुद्धि को स्थिर किया है वह तपस्वी अग्नि को अपने आत्मा में मन्त्रपूर्वक समारोप करके संन्यासी होकर ॥ ८ ॥ मौन धारण किये देह के पतनपर्यन्त वनमें जिसको कोई इन्द्रियों से नहीं देख जान सकता ऐसे ब्रह्म को स्मरण करता हुआ उत्तर दिशा को चला जावे इस प्रकार शरीर त्याग देने से ब्रह्मलोक में आदर पाता है ॥९॥ जो वानप्रस्थ मन को वश में कर समाधि लगाके तप करता है-पापों से रहित, निर्मल और शांति रूप वह वानप्रस्थ सनातन दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है ॥ १० ॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे ५ अध्याय भाषासमाप्ता ॥ अब आगे उत्तम चौथे आश्रम (संन्यास) को कहते हैं उस संन्यास के धर्म को श्रद्धा से सेवन करके टिकता हुआ पुरुष बन्धन से छूटजाता है ॥१॥ इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम में ठहरता और पापको दूर करता हुआ ब्राह्मण संन्यास की विधि से चौथे आश्रम में जाय संन्यासी हो जावे ॥२॥ पितर देवता मनुष्य इन के निमित्त दान दे के और दिव्य पितर मनुष्य पितर और अपने लिये जीवित ही श्राद्ध करके ॥ ३ ॥
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