अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ २३
अतःपरं प्रवक्ष्यामि वानप्रस्थस्यसत्तमाः ।
धर्माश्रमं महाभागाः कथ्यमानं निबोधत ॥ १ ॥
गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन्दृष्ट्वा पलितमात्मनः ।
भार्यांपुत्रेषु निःक्षिप्य सहवाप्रविशेद्दनम् ॥ २ ॥
नखरोमाणिचतथा सितगात्रत्वगादिच ।
धारयन्जुहुयादग्निं वनस्थोविधिमाश्रितः ॥ ३ ॥
धान्यैश्चवनसंभूतैर्नीवाराद्यैरनिन्दितैः ।
शाकमूलफलैर्वापि कुर्यान्नित्यंप्रयत्नतः ॥४॥
त्रिकालस्नानयुक्तस्तु कुर्यात्तीव्रंतपस्तदा ।
पक्षांतेवासमश्नीयान्मासान्तेवास्वपक्वभुक् ॥ ५ ॥
तथाचतुर्थकालेतु भुञ्जीयादष्टमेऽथवा ।
षष्ठेचकालेऽप्यथवा वायुभक्षोऽथवाभवेत् ॥६॥
घर्मेपंचाग्निमध्यस्थस्तथावर्षेनिराश्रयः ।
हेमन्तेचजलेस्थित्वा नयेत्कालं तपश्चरन् ॥७॥
इससे आगे वानप्रस्थ के धर्म कहते हैं-हे श्रेष्ठो हे महाभाग्यशालीलोगो हमारे कहे वानप्रस्थ आश्रम के धर्म को तुम सुनो ॥ १ ॥ गृहस्थी पुरुष पुत्र पौत्र आदिको और अपनी वृद्ध अवस्था को देखकर स्त्री को पुत्रोंके आधीन करके या संग लेकर वन में चला जावे ॥ २ ॥ नख केश और सफेद गात्र वाले वृक्ष की त्वचा का वस्त्र धारण करता हुआ वन में ठहर कर शास्त्रोक्त विधि से अग्निहोत्र करै ॥३॥ वन में पैदा हुए शुद्ध नीवारादि अन्नसे वा शाक मूल फलों से यत्न के साथ अपना निर्वाह और सायंप्रातः होम करै ॥४॥ उस समय वनमें सायंप्रातः मध्याह्न में त्रिकाल स्नान करता हुआ तीव्र तप करै । पक्षके अंतमें वा महिने के अन्त में एकदिन स्वयं पकाया भोजन करे ॥५॥ चौथे काल (पहर) में अथवा आठवें प्रहर में अथवा छठे प्रहर में प्रतिदिन एकबार भोजन करै अथवा अन्न जल छोड़के केवल वायु का ही भक्षण करै ॥ ६ ॥ घाम ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य में वर्षा ऋतु में निराश्रय (खुलीभूमि) में और शीतकालमें जलके मध्य में बैठकर तप करता हुआ कालको बितावे ॥ ७ ॥