अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ भाषार्थसहिता ॥
तथाक्षयतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्विजः ।
माघमासेतुसप्तम्यां रथ्याख्यायांतुवर्जयेत् ॥७२॥
अध्यापनंसमभ्यस्यस्नानकालेचवर्जयेत् ।
नीयमानंशवंदृष्ट्वा महीस्थंवाद्बिजोत्तमाः ॥७३॥
नपठेद्रुदितंश्रुत्वा संध्यायांतुद्विजोत्तमाः ।
दानानिचप्रदेयानि गृहस्थेनद्विजोत्तमाः ॥७४॥
हिरण्यदानंगोदानं पृथिवीदानमेवच ।
एवंधर्मोगृहस्थस्य सारभूतउदाहृतः ॥ ७५ ॥
यएवं श्रद्धयाकुर्यात्सयातिब्रह्मणःपदम् ।
ज्ञानोत्कर्षश्चतस्यस्यान्नारसिंहप्रसादतः ॥ ७६ ॥
तस्मान्मुक्तिमवाप्नोति ब्राह्मणोद्विजसत्तमाः ।
एवंहिविप्राःकथितोमयावः समासतःशाश्वतधर्मराशिः॥७७॥
गृहीगृहस्थस्यसतोहिधर्मं कुर्वन्प्रयत्नाद्धरिमेतियुक्तम् ॥७८॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अक्षय तृतीया (वैशाख शुदी ३) इन में भी ब्राह्मण शिष्यों को न पढ़ावे माघ महीने की रथ सप्तमी को भी वर्जदे ॥ ७२ ॥ उबटना करने के और स्नान के समय न पढ़ावे हे ऋषियो ! लेजाते हुए वा पृथ्वी पर पड़े मुर्दा को देख कर ॥ ७३ ॥ अथवा रोने को सुन कर और संध्या के समय वेद वेदाङ्गों को न पढ़े और हे ब्राह्मणो निम्न लिखित दान गृहस्थ को देने चाहिये कि ॥७४॥ सुवर्ण गौ, पृथ्वी ये उत्तम दान हैं यह गृहस्थ का सारभूत धर्म कहा है ॥ ७५ ॥ जो श्रद्धा से इन धर्मको करता है वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है और नरसिंह भगवान् की कृपा से उसको ज्ञानकी अधिकता होती है ॥७६॥ हेऋषि ब्राह्मणो ! इस ज्ञानसे ब्राह्मण मुक्तिको प्राप्त होता है हेब्राह्मणो! इस प्रकार हमने सनातन धर्मका समूह तुमसे कहा ॥७७॥ गृहस्थी सद् गृहस्थ के धर्म को यत्न से करता हुआ विष्णु को अवश्य प्राप्त होता है ॥७८ ॥
इतिहारीते धर्मशास्त्रे ४ अध्याय भाषा समाप्ता ॥