अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ २१
अन्नमादौनमस्कृत्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
एवंप्राणाहुतिंकुर्यान्मन्त्रेणचपृथक्पृथक् ॥६६॥
ततःस्वादुकरान्नं च भुञ्जीतसुसमाहितः ।
आचम्यदेवतामिष्टां संस्मरन्तूदरंस्पृशेत् ॥६७॥
इतिहासपुराणाभ्यां किंचित्कालनयेद्बुधः ।
ततःसंध्यामुपासीत बहिर्गत्वाविधानतः ॥६८॥
कृतहोमस्तुभुञ्जीत रात्रौचातिथिभोजनम् ।
सायंप्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम् ॥६९॥
नांतराभोजनंकुर्यादग्निहोत्रसमोविधि ।
शिष्यानध्यापयेच्चापि अनध्यायेविसर्जयेत् ॥७०॥
स्मृत्युक्तानखिलांश्चापि पुराणोक्तानपिद्विजः ।
महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपिषष्ठ्यं सु ॥७१॥
प्रसन्न चित्त से प्रथम अन्न को नमस्कार करके प्राणाहुति ( प्राणा-
यस्वाहा ) इत्यादि मन्त्र पढ़ २ छोटे २ पांच ग्रास पृथक् २ मुख में
देवे ॥ ६६ ॥ फिर भले प्रकार सावधान हुआ अन्न का स्वाद ले २ कर भो-
जन करै पश्चात् आचमन करके इष्ट देवता का स्मरण करता हुआ उदर का
स्पर्श करै ॥ ६७ ॥ इस के अनन्तर कुछेक समय इतिहास (भारतादि) और
पुराणों के कहने सुनने में बितावे फिर ग्राम से बाहर जाकर विधि से संध्य
वंदन करै ॥ ६८ ॥ सन्ध्या का होम कर कोई अभ्यागत मिले तो उसे भोजन
कराके रात्रि को स्वयं भोजन करै सायं प्रातःकाल भोजन करना द्विजातियों
को वेद में कहा है ॥६९॥ बीच में (दिन में दुबारा) भोजन न करे क्यों कि अ-
ग्निहोत्र के पश्चात् प्राणाग्निहोत्र भोजन का विधान भी दो ही वार है।
शिष्यों को वेदादि पढ़ावे और अनध्याय में पढ़ाने की छुट्टी कर देवे ॥ ७० ॥
जो सब अनध्याय धर्मशास्त्र और पुराणों में कहे हैं कि महानवमी (कार्तिक
शुदी) द्वादशी, भरणी नक्षत्र, पर्व, (अमावस पौर्णमासी आदि) ॥ ७१ ॥