अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२७ भाषार्थसहिता ॥
तस्मादतिथयेकार्यं पूजनंगृहमेधिना ॥ ५९ ॥
भक्त्याचशक्तितोनित्यं पूजयेद्विष्णुमन्वहम् ।
भिक्षांचभिक्षवेद्यात्परिव्राड्ब्रह्मचारिणे ॥ ६० ॥
अकल्पितान्नादुद्धृत्य सव्यंजनसमन्विताम् ।
अकृतेवैश्वदेवेपि भिक्षौचगृहमागते ॥ ६१ ॥
उद्धृत्यवैश्वदेवार्थं भिक्षांदत्वाविसर्जयेत् ।
वैश्वदेवाकृतान्दोषांश्छक्तोभिक्षुर्व्यपोहितुम् ॥ ६२ ॥
नहिभिक्षुकृतान्दोषान्वैश्वदेवोव्यपोहति ।
तस्मात्प्राप्तायतयतये भिक्षांदद्यात्समाहितः ॥ ६३ ॥
विष्णोरेवयतिश्छाया इतिनिश्चित्यभावयेत् ।
सुवासिनींकुमारींच भोजयित्वानरानपि ॥ ६४ ॥
बालवृद्धांस्ततःशेषं स्वयंभुञ्जीतवागृही ।
प्राङ्मुखोदङ्मुखोवापि मौनीचमितभाषणः ॥६५॥
सन्न होते हैं इस से सद्गृहस्थों को अतिथि का पूजन अवश्य करना चाहिये ॥ ५९ ॥ भक्ति और अपनी शक्ति से नित्य विष्णु भगवान् का पूजन करे अनन्तर संन्यासी ब्रह्मचारी भिक्षु को भिक्षा देवे ॥ ६० ॥ वैश्वदेव के लिये अन्न निकालने से पहिले ही यदि कोई अभ्यागत संन्यासी घर पर आजाय तो वैश्वदेव किये बिना भी वैश्वदेव के लिये पृथक् पात्र में अन्न निकाल कर अतिथि को शाक भाजी सहित भिक्षा देके विसर्जन करे क्यों कि वैश्वदेव न करने से जो दोष लगता उस को अतिथि दूर करने को समर्थ है ॥ ६१ । ६२ ॥ परन्तु अतिथि को भिक्षान देने से जो अपराध गृहस्थ को लगता है उसे वैश्वदेव दूर नहीं कर सकता है । इस से प्राप्त हुये अतिथि को सावधानी से भिक्षा देवे ॥ ६३ ॥ विष्णु का रूप ही संन्यासी है निश्चय से ऐसी भावना करे। सुवासिन ( सुहागिन ) और कुमारी और अन्य आये पुरुष आदि को भोजन कराकर ॥ ६४ ॥ तथा घर के बालक वृद्धों को जिमा कर फिर बाकी बचे अन्न को पूर्व वा उत्तर को मुख कर मौन हो वा परिमित बोलता हुआ गृहस्थ पुरुष इस प्रकार भोजन करे कि ॥ ६५ ॥