अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
२७ भाषार्थसहिता ॥
तस्मादतिथयेकार्यं पूजनंगृहमेधिना ॥ ५९ ॥
भक्त्याचशक्तितोनित्यं पूजयेद्विष्णुमन्वहम् ।
भिक्षांचभिक्षवेद्यात्परिव्राड्ब्रह्मचारिणे ॥ ६० ॥
अकल्पितान्नादुद्धृत्य सव्यंजनसमन्विताम् ।
अकृतेवैश्वदेवेपि भिक्षौचगृहमागते ॥ ६१ ॥
उद्धृत्यवैश्वदेवार्थं भिक्षांदत्वाविसर्जयेत् ।
वैश्वदेवाकृतान्दोषांश्छक्तोभिक्षुर्व्यपोहितुम् ॥ ६२ ॥
नहिभिक्षुकृतान्दोषान्वैश्वदेवोव्यपोहति ।
तस्मात्प्राप्तायतयतये भिक्षांदद्यात्समाहितः ॥ ६३ ॥
विष्णोरेवयतिश्छाया इतिनिश्चित्यभावयेत् ।
सुवासिनींकुमारींच भोजयित्वानरानपि ॥ ६४ ॥
बालवृद्धांस्ततःशेषं स्वयंभुञ्जीतवागृही ।
प्राङ्मुखोदङ्मुखोवापि मौनीचमितभाषणः ॥६५॥
सन्न होते हैं इस से सद्गृहस्थों को अतिथि का पूजन अवश्य करना चाहिये ॥ ५९ ॥ भक्ति और अपनी शक्ति से नित्य विष्णु भगवान् का पूजन करे अनन्तर संन्यासी ब्रह्मचारी भिक्षु को भिक्षा देवे ॥ ६० ॥ वैश्वदेव के लिये अन्न निकालने से पहिले ही यदि कोई अभ्यागत संन्यासी घर पर आजाय तो वैश्वदेव किये बिना भी वैश्वदेव के लिये पृथक् पात्र में अन्न निकाल कर अतिथि को शाक भाजी सहित भिक्षा देके विसर्जन करे क्यों कि वैश्वदेव न करने से जो दोष लगता उस को अतिथि दूर करने को समर्थ है ॥ ६१ । ६२ ॥ परन्तु अतिथि को भिक्षान देने से जो अपराध गृहस्थ को लगता है उसे वैश्वदेव दूर नहीं कर सकता है । इस से प्राप्त हुये अतिथि को सावधानी से भिक्षा देवे ॥ ६३ ॥ विष्णु का रूप ही संन्यासी है निश्चय से ऐसी भावना करे। सुवासिन ( सुहागिन ) और कुमारी और अन्य आये पुरुष आदि को भोजन कराकर ॥ ६४ ॥ तथा घर के बालक वृद्धों को जिमा कर फिर बाकी बचे अन्न को पूर्व वा उत्तर को मुख कर मौन हो वा परिमित बोलता हुआ गृहस्थ पुरुष इस प्रकार भोजन करे कि ॥ ६५ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २१
अन्नमादौनमस्कृत्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना ।
एवंप्राणाहुतिंकुर्यान्मन्त्रेणचपृथक्पृथक् ॥६६॥
ततःस्वादुकरान्नं च भुञ्जीतसुसमाहितः ।
आचम्यदेवतामिष्टां संस्मरन्तूदरंस्पृशेत् ॥६७॥
इतिहासपुराणाभ्यां किंचित्कालनयेद्बुधः ।
ततःसंध्यामुपासीत बहिर्गत्वाविधानतः ॥६८॥
कृतहोमस्तुभुञ्जीत रात्रौचातिथिभोजनम् ।
सायंप्रातर्द्विजातीनामशनं श्रुतिचोदितम् ॥६९॥
नांतराभोजनंकुर्यादग्निहोत्रसमोविधि ।
शिष्यानध्यापयेच्चापि अनध्यायेविसर्जयेत् ॥७०॥
स्मृत्युक्तानखिलांश्चापि पुराणोक्तानपिद्विजः ।
महानवम्यां द्वादश्यां भरण्यामपिषष्ठ्यं सु ॥७१॥
प्रसन्न चित्त से प्रथम अन्न को नमस्कार करके प्राणाहुति ( प्राणा-
यस्वाहा ) इत्यादि मन्त्र पढ़ २ छोटे २ पांच ग्रास पृथक् २ मुख में
देवे ॥ ६६ ॥ फिर भले प्रकार सावधान हुआ अन्न का स्वाद ले २ कर भो-
जन करै पश्चात् आचमन करके इष्ट देवता का स्मरण करता हुआ उदर का
स्पर्श करै ॥ ६७ ॥ इस के अनन्तर कुछेक समय इतिहास (भारतादि) और
पुराणों के कहने सुनने में बितावे फिर ग्राम से बाहर जाकर विधि से संध्य
वंदन करै ॥ ६८ ॥ सन्ध्या का होम कर कोई अभ्यागत मिले तो उसे भोजन
कराके रात्रि को स्वयं भोजन करै सायं प्रातःकाल भोजन करना द्विजातियों
को वेद में कहा है ॥६९॥ बीच में (दिन में दुबारा) भोजन न करे क्यों कि अ-
ग्निहोत्र के पश्चात् प्राणाग्निहोत्र भोजन का विधान भी दो ही वार है।
शिष्यों को वेदादि पढ़ावे और अनध्याय में पढ़ाने की छुट्टी कर देवे ॥ ७० ॥
जो सब अनध्याय धर्मशास्त्र और पुराणों में कहे हैं कि महानवमी (कार्तिक
शुदी) द्वादशी, भरणी नक्षत्र, पर्व, (अमावस पौर्णमासी आदि) ॥ ७१ ॥
२२ भाषार्थसहिता ॥
तथाक्षयतृतीयायां शिष्यान्नाध्यापयेद्विजः ।
माघमासेतुसप्तम्यां रथ्याख्यायांतुवर्जयेत् ॥७२॥
अध्यापनंसमभ्यस्यस्नानकालेचवर्जयेत् ।
नीयमानंशवंदृष्ट्वा महीस्थंवाद्बिजोत्तमाः ॥७३॥
नपठेद्रुदितंश्रुत्वा संध्यायांतुद्विजोत्तमाः ।
दानानिचप्रदेयानि गृहस्थेनद्विजोत्तमाः ॥७४॥
हिरण्यदानंगोदानं पृथिवीदानमेवच ।
एवंधर्मोगृहस्थस्य सारभूतउदाहृतः ॥ ७५ ॥
यएवं श्रद्धयाकुर्यात्सयातिब्रह्मणःपदम् ।
ज्ञानोत्कर्षश्चतस्यस्यान्नारसिंहप्रसादतः ॥ ७६ ॥
तस्मान्मुक्तिमवाप्नोति ब्राह्मणोद्विजसत्तमाः ।
एवंहिविप्राःकथितोमयावः समासतःशाश्वतधर्मराशिः॥७७॥
गृहीगृहस्थस्यसतोहिधर्मं कुर्वन्प्रयत्नाद्धरिमेतियुक्तम् ॥७८॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
अक्षय तृतीया (वैशाख शुदी ३) इन में भी ब्राह्मण शिष्यों को न पढ़ावे माघ महीने की रथ सप्तमी को भी वर्जदे ॥ ७२ ॥ उबटना करने के और स्नान के समय न पढ़ावे हे ऋषियो ! लेजाते हुए वा पृथ्वी पर पड़े मुर्दा को देख कर ॥ ७३ ॥ अथवा रोने को सुन कर और संध्या के समय वेद वेदाङ्गों को न पढ़े और हे ब्राह्मणो निम्न लिखित दान गृहस्थ को देने चाहिये कि ॥७४॥ सुवर्ण गौ, पृथ्वी ये उत्तम दान हैं यह गृहस्थ का सारभूत धर्म कहा है ॥ ७५ ॥ जो श्रद्धा से इन धर्मको करता है वह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है और नरसिंह भगवान् की कृपा से उसको ज्ञानकी अधिकता होती है ॥७६॥ हेऋषि ब्राह्मणो ! इस ज्ञानसे ब्राह्मण मुक्तिको प्राप्त होता है हेब्राह्मणो! इस प्रकार हमने सनातन धर्मका समूह तुमसे कहा ॥७७॥ गृहस्थी सद् गृहस्थ के धर्म को यत्न से करता हुआ विष्णु को अवश्य प्राप्त होता है ॥७८ ॥
इतिहारीते धर्मशास्त्रे ४ अध्याय भाषा समाप्ता ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २३
अतःपरं प्रवक्ष्यामि वानप्रस्थस्यसत्तमाः ।
धर्माश्रमं महाभागाः कथ्यमानं निबोधत ॥ १ ॥
गृहस्थः पुत्रपौत्रादीन्दृष्ट्वा पलितमात्मनः ।
भार्यांपुत्रेषु निःक्षिप्य सहवाप्रविशेद्दनम् ॥ २ ॥
नखरोमाणिचतथा सितगात्रत्वगादिच ।
धारयन्जुहुयादग्निं वनस्थोविधिमाश्रितः ॥ ३ ॥
धान्यैश्चवनसंभूतैर्नीवाराद्यैरनिन्दितैः ।
शाकमूलफलैर्वापि कुर्यान्नित्यंप्रयत्नतः ॥४॥
त्रिकालस्नानयुक्तस्तु कुर्यात्तीव्रंतपस्तदा ।
पक्षांतेवासमश्नीयान्मासान्तेवास्वपक्वभुक् ॥ ५ ॥
तथाचतुर्थकालेतु भुञ्जीयादष्टमेऽथवा ।
षष्ठेचकालेऽप्यथवा वायुभक्षोऽथवाभवेत् ॥६॥
घर्मेपंचाग्निमध्यस्थस्तथावर्षेनिराश्रयः ।
हेमन्तेचजलेस्थित्वा नयेत्कालं तपश्चरन् ॥७॥
इससे आगे वानप्रस्थ के धर्म कहते हैं-हे श्रेष्ठो हे महाभाग्यशालीलोगो हमारे कहे वानप्रस्थ आश्रम के धर्म को तुम सुनो ॥ १ ॥ गृहस्थी पुरुष पुत्र पौत्र आदिको और अपनी वृद्ध अवस्था को देखकर स्त्री को पुत्रोंके आधीन करके या संग लेकर वन में चला जावे ॥ २ ॥ नख केश और सफेद गात्र वाले वृक्ष की त्वचा का वस्त्र धारण करता हुआ वन में ठहर कर शास्त्रोक्त विधि से अग्निहोत्र करै ॥३॥ वन में पैदा हुए शुद्ध नीवारादि अन्नसे वा शाक मूल फलों से यत्न के साथ अपना निर्वाह और सायंप्रातः होम करै ॥४॥ उस समय वनमें सायंप्रातः मध्याह्न में त्रिकाल स्नान करता हुआ तीव्र तप करै । पक्षके अंतमें वा महिने के अन्त में एकदिन स्वयं पकाया भोजन करे ॥५॥ चौथे काल (पहर) में अथवा आठवें प्रहर में अथवा छठे प्रहर में प्रतिदिन एकबार भोजन करै अथवा अन्न जल छोड़के केवल वायु का ही भक्षण करै ॥ ६ ॥ घाम ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य में वर्षा ऋतु में निराश्रय (खुलीभूमि) में और शीतकालमें जलके मध्य में बैठकर तप करता हुआ कालको बितावे ॥ ७ ॥
२४ भाषार्थसंहिता ॥
एवंचकुर्वतायेन कृतबुद्धिर्यथाक्रमम् अग्निंस्वात्मनिकृत्वातु प्रब्रजेदुत्तरांदिशम्॥८॥ आदेहपातंवनगो मौनमास्थायतपसः॥ स्मरन्नतींद्रियंब्रह्म ब्रह्मलोकेमहीयते ॥९॥ तपोहि यः सेवतिवन्यवासःसमाधियुक्तःप्रयतांतरत्मा। विमुक्तपापोविमलःप्रशांतः सयातिदिव्यं पुरुषंपुराणम् इति हारीते धर्मशास्त्रे पंचमोऽध्यायः॥५॥ अतःपरंप्रवक्ष्यामि चतुर्थाश्रममुत्तमम् । श्रद्धयातमनुष्ठाय तप्तन्मुच्येतबन्धनात् ॥१॥ एवंवनाश्रमेनिष्ठन्द्यातयंश्चैवकिल्विषम् ॥ चतुर्थमाश्रमंगच्छे त्संन्यासविधिनाद्विजः ॥२॥ दत्वापितृभ्योदेवेभ्यो मानुषेभ्यश्चयत्नतः। दत्वाश्राद्धंघंपितृभ्यश्च मानुषेभ्यस्तथात्मनः ॥३॥
क्रम २ से इस प्रकार करते हुए जिसने बुद्धि को स्थिर किया है वह तपस्वी अग्नि को अपने आत्मा में मन्त्रपूर्वक समारोप करके संन्यासी होकर ॥ ८ ॥ मौन धारण किये देह के पतनपर्यन्त वनमें जिसको कोई इन्द्रियों से नहीं देख जान सकता ऐसे ब्रह्म को स्मरण करता हुआ उत्तर दिशा को चला जावे इस प्रकार शरीर त्याग देने से ब्रह्मलोक में आदर पाता है ॥९॥ जो वानप्रस्थ मन को वश में कर समाधि लगाके तप करता है-पापों से रहित, निर्मल और शांति रूप वह वानप्रस्थ सनातन दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है ॥ १० ॥ इति हारीते धर्मशास्त्रे ५ अध्याय भाषासमाप्ता ॥ अब आगे उत्तम चौथे आश्रम (संन्यास) को कहते हैं उस संन्यास के धर्म को श्रद्धा से सेवन करके टिकता हुआ पुरुष बन्धन से छूटजाता है ॥१॥ इस प्रकार वानप्रस्थ आश्रम में ठहरता और पापको दूर करता हुआ ब्राह्मण संन्यास की विधि से चौथे आश्रम में जाय संन्यासी हो जावे ॥२॥ पितर देवता मनुष्य इन के निमित्त दान दे के और दिव्य पितर मनुष्य पितर और अपने लिये जीवित ही श्राद्ध करके ॥ ३ ॥
६
हारीतस्मृतिः ॥ २५
इष्टिंवैश्वानरींकृत्वा प्राङ्मुखोदङ्मुखोऽपिवा । अग्निंस्वात्मनिसंरोप्य मन्त्रवित्प्रव्रजेत्पुमः॥४॥ ततःप्रभृतिपुत्रादौ स्नेहालापादिवर्जयेत् । बन्धूनामभयं दद्यात्सर्वभूताभयं तथा ॥ ५ ॥ त्रिदण्डं वैष्णवं सम्यक् संततं समपर्वकम् ॥ वेष्टितं कृष्णगोवाल रज्जु मचतुरंगुलम् ॥ ६ ॥ शौचार्थमासनार्थंच मुनिभिःसमुदाहृतम् । कौपीनाच्छादनंवासः कंथांशीतनिवारिणीम् ॥७॥ पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम् । एतानितस्यलिंगानि यतेःप्रोक्तानि सर्वदा ॥ ७ ॥ संगृह्यकृतसंन्यासो गत्वातीर्थमनुत्तमम् । स्नात्वाचम्यचविधिवद्वस्त्रपूतेनवारिणा ॥ ८ ॥ तर्पयित्वा तु देवांश्च मंत्रवद्भास्करंनमेत् ।
श्रौतविधि के अनुसार वैश्वानरी इष्टि करके पूर्व वा उत्तर को मुख कर मन्त्र पूर्वक गार्हपत्यादि अग्नियों को अपने शरीर में समारोप कर के [अग्नियों के समारोप की रीति यह है कि अग्निकुण्ड पर पेट करके (अयन्ते योनिर्ऋ त्वियो०) मन्त्र पढ़ के गृहहस्थ्य अग्नि अपने में आगये मान लेवे] संन्यासी होजावे ॥ ४ ॥ तब से लेकर पुत्रादि में प्रीति और वार्त्तालापादि व्यवहार को त्याग देवे और अपने भाई बंधों और सब प्राणियों को अभय दान देवे ॥ ५ ॥ ऐसा बांस का त्रिदण्ड ग्रहण करे जिस में चार अंगुल कपड़ा और काली गौ के बालों की रस्सी लगी हो जिस की ग्रंथि सम हों ॥६॥ शुद्धि के अर्थ और बिछाने के लिये मुनियों के कहे हुए कौपीन शीत को दूर करने वाली कंथा (गुदड़ी) और पादुका (खड़ाऊं) इन को ग्रहण करे इस से अधिक का संग्रह न करे । ये संन्यासी के सदैव काल के चिन्ह कहे हैं ॥७॥ संन्यासी हुआ इन कौपीनादि को ग्रहण कर उत्तम तीर्थ में जाके वस्त्र से छाने जल से विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ॥ ८ ॥ मन्त्रों से देवताओं का तर्पण करके परमात्मरूप सूर्यदेव को नम-
४
२६ भाषाधर्मसंहिता ॥
आत्मानंप्राङ्मुखोमौनौ प्राणायामत्रयंचरेत् ॥ ९ ॥
गायत्रींचयथाशक्ति जप्त्वाध्यायेत्परंपदम् ।
स्थित्यर्थमात्मनोनित्यं भिक्षाटनमथाचरेत् ॥ १० ॥
सायंकालेतुविप्राणां गृहाण्यभ्यवपद्यतु ।
सम्यग्याचेच्चकवलं दक्षिणेनकरेणवै ॥ ११ ॥
पात्रंवामकरेस्थाप्य दक्षिणेनतुशोधयेत् ।
यावत्तान्नेनतृप्तिःस्या-त्तावद्वैक्षंसमाचरेत् ॥ १२ ॥
ततोनिवृत्यतत्पात्रं संस्थाप्यान्यत्रसंयमी ।
चतुर्भिरंगुलैश्छाद्य ग्रासमात्रंसमाहितः ॥ १३ ॥
सर्वव्यंजनसंयुक्तं पृथक्पात्रे नियोजयेत् ।
सूर्यादिभूतदेवेभ्यो दत्त्वासंप्रोक्ष्यवारिणा ॥ १४ ॥
भुञ्जीतपात्रपुटके पात्रेवावाग्यतोयतिः ।
वटकाश्वत्थपर्णेषु कुंभीतैन्दुकपात्रके ॥ १५ ॥
कोविदारकदंबेषु नभुञ्जीतकदाचन ।
स्कार करे । पूर्वाभिमुख और मौन होकर तीन प्राणायाम करे ॥ ९ ॥ यथा-शक्ति गायत्री जप कर परंपद ( ब्रह्म ) का ध्यान करे देह की स्थिति के लिये नित्य भिक्षा मांगे ॥ १० ॥ सायंकाल के समय ब्राह्मणों के घरों में जाकर दहिने हाथ से भले प्रकार कवल (ग्रास) मांगे ॥११॥ बायें हाथमें पात्र को रख कर उसे दहिने हाथ से पोंछे फिर उसमें मागी हुई भिक्षा रोटी आदि घरे जितने अन्न से तृप्ति हो उतनी ही भिक्षा नित्य मांगे कौवे कुत्ते आदिके लिये अधिक न मांगे॥१२॥ फिर संयमी पुरुष ग्राम से लौट कर उस पात्र को दूसरी जगह रखकर और सावधानी से सब व्यंजनों सहित एक ग्रास अन्न लेके सूर्यादि भूत देवताओं के लिये किसी दोना पत्ता में पृथक् धर के चार अंगुलों से ढांप कर देवता को समर्पण करे फिर शेष अन्न को जल से छिड़क के ॥ १३ ॥ ॥ १४ ॥ पत्तों के दोने में अथवा पात्र से मौन होकर संन्यासी भोजन करे बड़, पीपल, कटहल, तेंदु ॥१५॥ कचनार कदंब-इनके पत्तों में वा इन से बने दोना पत्तलों
हारीतस्मृतिः ॥
२७
मलाक्ताःसर्वउच्यंते यतयः कांस्यभोजिनः ॥ १६ ॥
कांस्यभांडेषुयत्पाको गृहस्थस्यतथैवच ।
कांस्येभोजयतःसर्व्वं किल्विषंप्राप्नुयात्तयोः ॥ १७ ॥
भुक्त्वापात्रंयतिर्नित्यं क्षालयेन्मंत्रपूर्वकम् ।
नदुष्यतेचतत्पात्रं यज्ञेषुचमसाइव ॥ १८ ॥
अथाचम्यनिदिध्यास्य उपतिष्ठेतभास्करम् ।
जपध्यानेतिहासैश्च दिनशेषंनयेद्बुधः ॥ १९ ॥
कृतसंध्यस्ततोरात्रीं नयेद्देवगृहादिषु ।
हृत्पुण्डरीकनिलये ध्यायेदात्मानमव्ययम् ॥ २० ॥
यदिधमंरतिःशांतः सर्वभूतसमोवशी ।
प्राप्नोतिपरमंस्थानं यत्प्राप्यननिवर्तते ॥ २१ ॥
त्रिदंडभूत्वाहिपृथक्समाचरेच्छनैःशनैर्यस्तु बहिर्मुखाक्षः।
में कभी भी भोजन न करे-और कांसे के पात्र में भोजन करने वाले संन्यासी मलिन कहे हैं ॥१६॥ कांसे के पात्रमें पकाने वाले और जिमाने वाले गृहस्थी को जो पाप है उन दोनों के पाप को कांसे के पात्रमें भोजन करने वाला संन्यासी प्राप्त होता है ॥१७॥ संन्यासी जिस पात्र में भोजन करे उस को मंत्रों से धोडा ले। यज्ञों में सोम पीने के चमसों के तुल्य संन्यासी का वह पात्र दूषित (अशुद्ध) नहीं होता ॥ १८ ॥ इस के अनन्तर आचमन और ध्यान कर के सूर्य्य देव की स्तुति करे और शेष दिन को जप ध्यान तथा उत्तम इतिहासों के कहने सुनने में बितावे॥ १९॥ फिर संध्या करके इसी प्रकार घर आदि में रात्रि को बितावे-अपने कमल रूपी हृदय में अविनाशी आत्मा का ध्यान करे ॥ २० ॥ जो संन्यासी धर्म में तत्पर, शांत, सब भूतों में सम, वशी ( इन्द्रिय जिस के वश में हों ऐसा ) हो तो वह उस उत्तम स्थान को प्राप्त होता है जहां जा- कर फिर नहीं लौटते ॥ २१ ॥ जो त्रिदण्डी हो सब से पृथक विचरे और धीरे २ जिस के इन्द्रिय संसार के विषयों से विरक्त हुए हों वह संसार के सब
२८
भाषार्थसहिता ॥
संमुच्य संसारसमस्तबंधनात्सयातिविष्णोरमृतात्मनः पदं
इति हारीतेधर्मशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच कथितंधर्मलक्षणम् ।
येनस्वर्गापवर्गौच प्राप्नुवंतिद्विजातयः ॥ १ ॥
योगशास्त्रंप्रवक्षामि संक्षेपात्सारमुत्तमम्
यस्यचश्रवणाद्यान्ति मोक्षंचैवमुमुक्षवः ॥ २ ॥
योगाभ्यासबलेनैव नश्येयुःपातकानितु ।
तस्माद्योगपरोभूत्वा ध्यायेन्नित्यक्रियापरः ॥ ३ ॥
प्राणायामेनवचनंप्रत्याहारेणचेन्द्रियम् ।
धारणाभिर्वशेकृत्वा पूर्वंदुर्धर्षणंमनः ॥ ४ ॥
एकाकारमनामंदबुधैरुपमलाचयम् ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरंध्यायेज्जगदाधारमुच्यते ॥ ५ ॥
आत्मनोबहिरन्तस्थं शुद्धचामीकरप्रभम् ।
रहस्येकान्तमासीनो ध्यायेदामरणान्तिकम् ॥६॥
बंधनों को तोड़ कर अमृत रूपी विष्णु के पद को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्मशास्त्रे ६ अध्याय भाषा समाप्त ॥
वर्ण और आश्रम के धर्मों का स्वरूप कहा द्विज लोग जिस धर्म से स्वर्ग वा मोक्ष को पाते हैं ॥ १ ॥ अब संक्षेप से योग शास्त्र का उत्तम सार कहते हैं कि जिस के सुनने से मोक्ष चाहने वाले मुक्त होते हैं ॥ २ ॥ योगाभ्यास के बल से ही पाप नष्ट होते हैं इस से योग में तत्पर होकर उत्तम आचरण से नित्य ध्यान करे ॥ ३ ॥ प्रथम प्राणायाम से वाणी को प्रत्याहार (विषयों से इन्द्रियों को हटाने) द्वारा उपस्थेन्द्रिय को धारणा (किसी खास वस्तु में मन को बांधने) से वश करने अयोग्य मन को वश में करके ॥ ४ ॥ एकाग्र चित्त होकर देवताओं को भी अगम्य (प्राप्ति के अयोग्य) और सूक्ष्म जो जगत् का आश्रय भगवान् तिस का ध्यान करे ॥ ५ ॥ जो ब्रह्म अपने स्वरूप से बाहर और भीतर स्थित है और शुद्ध सोने के समान जिस की कांति है ऐसे ब्रह्म का मरण पर्यन्त एकान्त में एकाग्र बैठ कर ध्यान करे ॥ ६ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ २६
यत्तत्सर्वप्राणिहृदयं सर्वेषांचहृदिस्थितम् ।
यच्चसर्वजनैर्ज्ञेयं सोऽहमस्मीतिचिंतयेत् ॥ ७ ॥
आत्मलाभसुखंयाव-त्तपोध्यानमुदीरितम् ।
श्रुतिस्मृत्यादिकंधमं तद्विरुद्धंनचाचरेत् ॥ ८ ॥
यथारथोऽश्वहीनस्तु यथाश्वोरथिहीनकः ।
एवंतपश्चविद्याच संयुतेभेषजंभवेत् ॥ ९ ॥
यथान्नंमधुसंयुक्तं मधुवान्नेनसंयुतम् ।
उभाभ्यामपिपक्षाभ्यां यथाखेपक्षिणांगतिः ॥ १० ॥
तथैवज्ञानकर्मभ्यां प्राप्यतेब्रह्मशाश्वतम् ।
विद्यातपोभ्यांसंपन्नो ब्राह्मणोयोगतत्परः ॥ ११ ॥
देहद्वयंविहायाशु मुक्तोभवतिबंधनात् ।
नतथाक्षीणदेहस्य विनाशोविद्यते क्वचित् ॥ १२ ॥
मयातु कथितःसर्वो वर्णाश्रमविभागशः ।
जो सब प्राणियों का हृदय है और जो सब के हृदय में स्थित है और जो सब जनों के जानने योग्य है वही मैं हूं ऐसा चिंतन ( स्मरण ) करै ॥ ७ ॥
जब तक आत्मप्राप्ति का सुख न हो तब तक ध्यान करे यह शास्त्रकारों ने कहा है । आत्मलाभ का अविरोधी जो श्रुति और स्मृति का धर्म उस को करे किन्तु गृहस्थादि का धर्म न करे ॥ ८ ॥
जैसे घोड़े के विना रथ और सारथि के विना घोड़ा नहीं चल सकते और दोनों परस्पर सहायक हैं-इसी प्रकार तप नाम कर्मकाण्ड विद्या ( ज्ञान ) दोनों मिलकर संसार रोग की औषध हैं ॥ ९ ॥
जैसे मीठे से मिला अन्न तथा मीठा और जैसे दोनों ही पंखों से आकाश में पक्षियों की गति ( उड़ना ) होती है ॥ १० ॥
तैसे ही ज्ञान और तप से युक्त और योग में तत्पर ब्राह्मण ॥ ११ ॥
दोनों ( स्थूल—सूक्ष्म ) देहों को शीघ्र छोड़कर बन्धनों से छूट जाता है । इस प्रकार जिस का देह नष्ट होगया हो उस का कभी भी नाश ( कुगति ) नहीं होता ॥ १२ ॥
हे ऋषि मुनियो ! हमने वर्ण और आश्रम के भेद और संक्षेप
३० भाषार्थसहिता ॥
संक्षेपेणद्विजश्रेष्ठा धर्मस्तेषांसनातनः ॥ १३ ॥
श्रुत्वैवंमुनयोधर्मं स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्यतमृषिं जग्मुर्मुदिताःस्वंस्वमाश्रमम् ॥ १४ ॥
धर्मशास्त्रमिदंसर्वं हारीतमुखनिःसृतम् ।
अधीत्यकुरुतेधर्मं सयातिपरमांगतिम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मणस्यतुयत्कर्म कथितंबाहुजस्यच ।
ऊरुजस्यापियत्कर्म कथितंपादजस्यच ॥ १६ ॥
अन्यथावर्तमानस्तु सद्यःपततिजातितः ।
योयस्याभिहितोधर्मः सतुतस्यतथैवच ॥ १७ ॥
तस्मात्स्वधर्मंकुर्वीत द्विजोनित्यमनापदि ।
राजेन्द्रवर्णाश्चत्वारश्चत्वारश्चापिचाश्रमाः ॥१८॥
स्वधर्मं येनुतिष्ठंति तेयांतिपरमांगतिम् ।
स्वधर्मेणयथानृणां नारसिंहःप्रसीदति ॥१९॥
से उन का सनातन सब धर्म तुम से कहा ॥ १३ ॥ स्वर्ग और मोक्षरूपदाता धर्म को इस प्रकार सुन कर उन हारीत मुनि को नमस्कार करके प्रसन्न हुए सब मुनि अपने २ आश्रम को चलेगये ॥ १४ ॥ हारीत मुनि के मुख से निकले इस सब धर्मशास्त्र को पढ़कर जो धर्म करता है वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को जो कर्म इस में कहा है ॥ १६ ॥ उस के विरुद्ध जो बर्ताव करता है वह शीघ्र जाति से पतित होता है । जो जिस वर्ण का धर्म कहा है वह वैसा ही उस वर्ण का धर्म है उस में लौट पौट कुछ में की जाय तो वह उस का धर्म न होगा ॥ १७ ॥ आपत्काल को छोड़ कर प्रति दिन द्विज लोग अपने २ धर्म को करें राजा है मुख्य जिन में ऐसे-चार वर्ण और चार ही आश्रम हैं ॥ १८ ॥ अपने धर्म को जो करते हैं वे परम गति को प्राप्त होते हैं जैसे अपने धर्म से मनुष्यों पर नरसिंह भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १९ ॥
हारीतस्मृतिः ॥ ३१
नतुष्यतितथान्येन कर्मणामधुसूदनः अतःकुर्वन्निजंकर्म यथाकालमतन्द्रितः ॥२०॥ सहस्रानीकदेवेशं नारसिंहंचसालयम् । उत्पन्नवैराग्यबलेनयोगी ध्यायेत्परंब्रह्मसदाक्रियावान् । सत्यंसुखरूपमनंतमाद्यं विहायदेहंपदमेतिविष्णोः ॥२२॥
इतिहारीते धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
वैसे अन्य वर्गों के धर्म से प्रसन्न नहीं होते इससे नित्य आलस्य को छोड़ कर समय पर अपना धर्म करता हुआ मनुष्य ॥२०॥ सहस्रों देवों के स्वामी भगवान् को प्राप्त होता है ॥२१॥ उत्पन्न हुए वैराग्य के बल से जो सदाचारी धर्म कर्म निष्ठ योगी परब्रह्म का ध्यान करता है वह देह को त्याग कर सत्य सुखरूप अनन्त (अविनाशी) आद्य जो विष्णु का पद उस को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्म-शास्त्रे ७ अध्याय भाषा समाप्ता ।
समाप्तं चेदं धर्मशास्त्रम् ॥
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अथौशनसस्मृतिः ॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामि जातिवृत्तिविधानकम् ।
अनुलोमविधानंच प्रतिलोमविधिंतथा ॥१॥
सांतरालकसंयुक्तं सर्वं संक्षिप्यचोच्यते ।
नृपाद्ब्राह्मणकन्यायां विवाहेष्वसमन्वयात् ॥२॥
जातःसूतोऽत्रनिर्दिष्टः प्रतिलोमविधिद्विजः ।
वेदानर्हस्तथाचैषां धर्म्माणामनुवोधकः ॥३॥
सूताद्विप्रप्रसूतायां सुतोवेणुकउच्चयते ।
नृपायामेवतस्यैव जातोयश्चर्मकारकः ॥४॥
ब्राह्मण्यांक्षत्रियाच्चौर्याद्रथकारःप्रजायते ।
वृत्तंचशूद्रवत्तस्य द्विजत्वंप्रतिषिध्यते ॥५॥
यानानांयेचवोढारस्तेषांचपरिचारकः ।
अब आगे उत्तर जातियों की और जीविका विधान कहेंगे तथा अनुलोम (नीच वर्ण की कन्या में ऊंचे वर्ण से उत्पन्न) की और प्रतिलोम (ऊँचे वर्ण की कन्या में नीच वर्ण से उत्पन्न हुए) की विधि कहते हैं ॥१॥ अन्तरालक (जो इन के बीच में पैदा हुए हैं पुलिंद आदि) उन सहित सब संक्षेप से कहा जाता है। ब्राह्मण की कन्या में विवाह होने पर जो सन्तान क्षत्रिय से ॥ २ ॥ उत्पन्न होता है वह सूत कहा है वह प्रतिलोम विधि का द्विज है। यह सूत वेदका अधिकारी नहीं यह केवल वेद के धर्मों को इतिहासादि द्वारा उपदेष्टा (बतलानेवाला) होता है ॥ ३ ॥ सूत से ब्राह्मण की कन्या में जो हो उसे वेणुक (भाट) कहते हैं क्षत्रिय कन्या में जो सूत से पैदा हो वह चमार कहाता है ॥ ४ ॥ ब्राह्मण की कन्या में जो क्षत्रिय से गुप्त व्यभिचार द्वारा पैदा हो वह रथकार (बढ़ई) कहाता है इसका धर्म वही है जो शूद्र का और यह द्विज नहीं होता ॥ ५ ॥ जो यान (सवारी) के चलाने वाले हैं अथवा जो गाड़ी चलाने वालों के
२
भाषार्थसहिता ॥
शूद्रवृत्त्यातुजीवन्ति नक्षात्रंधर्ममाचरेत् ॥ ६ ॥
ब्राह्मण्यांवैश्यसंसर्गाज्जातोमागधउच्यते ।
वंदित्वंब्राह्मणानां च क्षत्रियाणांविशेषतः ॥ ७ ॥
प्रशंसावृत्तिकोजीवेद्वैश्यप्रेष्यकरस्तथा ।
ब्राह्मण्यांशूद्रसंसर्गाज्जातश्चांडालउच्यते ॥ ८ ॥
सीसमाभरणंतस्य कार्ष्णायसमथापिवा ।
वध्रींकण्ठेसमाबध्य महल्लरींकक्षतोपिवा ॥ ९ ॥
मलापकर्षणंग्रामे पूर्वाह्नेपरिशुद्धिकम् ।
नपराह्ने प्रविशेपि बहिर्ग्रामाच्चनैऋते ॥ १० ॥
पिण्डीभूताभवंत्यत्र नोचेद्वध्याविशेषतः ।
चांडालाद्वैश्यकन्यायां जातःश्वपचउच्यते ॥ ११ ॥
श्वमांसभक्षणंतेषां श्वानएवचतद्बलम् ।
नृपायांवैश्यसंसर्गादायोगवइतिस्मृतः ॥ १२ ॥
तंतुवायाभवंत्येव वसुकांस्योपजीविनः ।
शोलिकाःकेचिदत्रैव जीवनंवस्त्रनिर्मितै ॥ १३ ॥
६॥क होकर शूद्र की वृत्ति से जीते हैं वेभी क्षत्रिय धर्म का आचरण न करें ॥ ६ ॥ ब्राह्मणी में जो वैश्य के संसर्ग ( मेल ) से उत्पन्न हो उसे मागध (भाट) कहते हैं ये ब्राह्मणों का तथा विशेष कर क्षत्रियों का बंदी ( स्तुति करने वाला) होता है ॥७॥ प्रशंसा वृत्ति (अन्यों की स्तुति प्रशंसा कर धन प्राप्त करना) उसकी जीविका है अथवा वैश्य की सेवा करे ब्राह्मणी में जो शूद्र के संसर्ग (मेल) से उत्पन्न हो उसे चांडाल कहते हैं ॥८॥ इस के सीसे अथवा लोहे के आभरण (गहने) होते हैं और कंठ में वधी (चमड़े का पट्टा) और कोख में झालरी बांध कर ॥९॥ दोपहर से पूर्व गांव में शुद्धता के अर्थ मल को उठावे और मध्यान्ह के पश्चात ग्राम में न घुसे किन्तु गांव से बाहर नैऋंत दिशा में रहा करे ॥१०॥ और वे सब एक ही जगह रहें और जो एकत्र न रहें तो अवश्य वध के योग्य हैं चांडाल से जो वैश्य की कन्या में पुत्र उत्पन्न हो उसे श्वपच कहते हैं ॥११॥ कुत्ते का मांस ही उनका भोजन है और कुत्ता ही उन का बल है क्षत्रिय की कन्या में जो वैश्य से पुत्र उत्पन्न हो वह आयोगव (कोरी) कहाता है ॥१२॥
औशनसस्मृतिः ॥ ३
आयोगवेनविप्रायां जातास्ताम्रोपजीविनः ।
तस्यैवनृपकन्यायां जातःसूनिकउच्यते ॥ १४ ॥
सूनिकस्यनृपायांतु जाताउद्बंधकाःस्मृताः ।
निर्णेजयेयुर्वस्त्राणि अस्पृश्याश्चभवन्त्यतः ॥ १५ ॥
नृपायांवैश्यतश्चौर्यात् पुलिंदःपरिकीर्तितः ।
पशुवृत्तिर्भवेत्तस्य हन्युस्तान्दुष्टसत्त्वकान् ॥ १६ ॥
नृपायांशूद्रसंसर्गाज्जातः पुल्कसउच्यते ।
सुरावृत्तिंसमारुह्य मधुविक्रयकर्म्मणा ॥ १७ ॥
कृतकानांसुराणांच विक्रे तायाचको भवेत् ।
पुल्कसाद्वैश्यकन्यायां जातोरजकउच्यते ॥ १८ ॥
नृपायांशूद्रतश्चौर्याज्जातोरंजक उच्यते ।
ये वस्त्र वियनने और कांसे के व्यापार से जीविका करें तथा इन में जो वस्त्र पर रचे सूत रेशम आदि के कसीदे से जीते हैं वे शीलिन कहते हैं ॥ १३ ॥
आयोगव (कोरी) से जो ब्राह्मण की कन्या में उत्पन्न होते हैं वे ताम्रोपजीवी (तांबे आदि से जीविका करने वाले) होते हैं और आयोगव (कोरी) व क्षत्रिय कन्या में जो उत्पन्न हो उसे सूनिक (सोनी) कहते हैं ॥ १४ ॥
सूनिक से जो क्षत्रिय की कन्या में उत्पन्न हों उन्हें उद्बंधक कहते हैं ये वस्त्रों को धोवें और स्पर्श करने के योग्य नहीं होते ॥ १५ ॥
क्षत्रिय की कन्या में जो छिप कर व्यभिचार द्वारा वैश्य से पैदा हो उस को पुलिंद कहते हैं और ये दुष्ट जीवों को मार पशुवृत्ति (मांसवृत्ति) होते हैं ॥ १६ ॥
क्षत्रिय की कन्या में जो शूद्र से उत्पन्न हो उसे पुल्कश (कजाल) कहते हैं वह सुरा (मदिरा) की जीवका के निमित्त मधुर मीठा को बेचता है ॥ १७ ॥
और बनी हुई मदिरा को बेचता और पकाता भी है और पुल्कश से वैश्य की कन्या में जो पैदा हो उसे रजक कहते हैं ॥ १८ ॥
क्षत्रिय की कन्या में शूद्र से चोरी (व्यभिचार) से जो पैदा हो उसे रंजक (रंगरेज) कहते हैं तथा रंजक से जो वैश्य की कन्या में पैदा हो उसे शतंक (नट) वा गायक
४ | भाषार्थसहिता ॥
वैश्यायांरंजकाज्जातो नर्त्तकोगायकोभवेत् ॥ १९ ॥
वैश्यायांशूद्रसंसर्गाज्जातोवैदेहकःस्मृतः ।
अजानांपालनंकुर्यान्महिषीणांगवामपि ॥ २० ॥
दधिक्षीराज्यतक्राणां विक्रयाज्जीवनंभवेत् ।
वैदेहिकात्तुविप्रायां जातश्चर्मोपजीविनः ॥ २१ ॥
नृपायामिवतस्यैव सूचिकःपाचिकःस्मतः
वैश्यायांशूद्रतश्चौर्याज्जातश्चक्रीचउच्यते ॥ २२ ॥
तैलपिष्टकजीवीतु लवणंभावयन्पुनः ।
विधिनाब्राह्मणःप्राप्य नृपायांतुसमन्त्रकम् ॥ २३ ॥
जातःसुवर्णइत्युक्तः सानुलोमद्विजस्मृतः ।
अथवर्णक्रियांकुर्वन्नित्यनैमित्तिकींक्रियाम् ॥ २४ ॥
अश्वरथंहस्तिनंच वाहयेद्वानृपाज्ञया ।
सैनापत्यंचभैषज्यं कुर्याज्जीवेत्तुवृत्तिषु । २५ ॥
नृपायांविप्रतश्चौर्यात्संजातोयोभिषक्स्मृतः ।
कथक ) कहते हैं ॥१९॥ वैश्य की कन्या में शूद्र के संसर्ग से जो पैदा हो उसे वैदेहिक (गड़रिया) कहते हैं वह बकरी-भैंस-गौ इन को पाले ॥२०॥ और दही दूध-घी-मठा इनका बेचना उस की जीविका है-वैदेहिक से ब्राह्मणी में जो पुत्र उत्पन्न हों वे चर्मोपजीवी होते हैं अर्थात् चाम बेच कर जीते हैं ॥२१॥ वैदेहिक से क्षत्रिय की कन्यामें जो पैदा हो उसे सूचिक (दरजी) अथवा पाचक (रसोइया) कहते हैं शूद्रसे जो वैश्य की कन्यामें चोरी से पैदा हो उसे चक्री (तेली) कहते हैं ॥२२॥ यह तिल वा खल अथवा लवण से जीता है-विधि से ब्राह्मण ने विवाही जो क्षत्रिय की कन्या उस से जो उत्पन्न होता है ॥२३॥ वह अनुलोम सुवर्ण द्विज कहाता है वह नित्य (संध्यादि ) नैमित्तिक (जात कर्मादि) क्रिया को करता हुआ ॥ २४ ॥ राजा की आज्ञा से घोड़ा-रथ हाथी इन को चलाता है और सेनापति बनकर अथवा औषधों से अपना निर्वाह करे ॥२५॥ क्षत्रिय की कन्या में चोरी से जो ब्राह्मण से पुत्र उत्पन्न होता है उसे भिषक्
औशनसस्मृतिः ॥ ५
अभिषिक्तनृपस्याज्ञां परिपालयेत्तुवैद्यकम् ॥२६॥ आयुर्वेदमथाष्टांगं तन्त्रोक्तं धर्ममाचरेत् । ज्योतिषंगणितंवापि कायिकींवृत्तिमाचरेत् ॥ २७ ॥ नृपायांविधिनाविप्राज्जातो नृपहतिस्मृतः । नृपायांनृपसंसर्गात्प्रमादाद्गूढजातकः ॥ २८ ॥ सोऽपिक्षत्रियएवस्या-दभिषेकेचवर्जितः । अभिषेकंविनाप्राप्य गोजङ्गत्यभिधायकः ॥ २९ ॥ सर्वंतुराजवृत्त्य शस्यतेपदवंदनम् । पुनर्भूकरणेराज्ञानृपकालीनएवच ॥ ३० ॥ वैश्यायांविधिनाविप्राज्जातो ह्यंबष्ठउच्यते । कृष्यजीवीभवेत्तस्य तथैवाग्नेयवृत्तिकः ॥ ३१ ॥ ध्वजिनीजीविकावापि ह्यंबष्ठाःशस्त्रजीविनः । वैश्यायांचिप्रतश्चौर्यात्कुंभकारसउच्यते ॥ ३२ ॥ कुलालवृत्त्याजीवेत्तु नापितावाभवन्त्यतः ।
कहते हैं वह राजा की आज्ञा से वैद्यक करता है ॥ २६॥ वह अष्टांग आयुर्वेद अथवा तंत्र के कहे धर्मों को करै ज्योतिष वा गणित विद्या से अपना निर्वाह करे ॥ २७ ॥ क्षत्रिय की कन्या में जो ब्राह्मण से पैदा हो वह नृप और इस नृप से क्षत्रिय कन्या में जो पुत्र पैदा हो वह गूढ़ कहलाता है ॥ २८ ॥ और वह भी क्षत्रिय होता परन्तु अभिषेक (राज तिलक) के योग्य नहीं होता अभिषेक की अयोग्यता से इसे गोज (गोल) कहते हैं ॥ २९ ॥ सब प्रकार से राजा के चरणों की वंदना (नमस्कार) श्रेष्ठ है और यह गोज राजाओं के पुनर्भू करण (द्वितीय विवाह करने) में राजा के समान है अर्थात् इस के यहां राजा द्वितीय विवाह करले ॥ ३० ॥ विधि से विवाही वैश्य कन्या में जो ब्राह्मण से हो वह अंबष्ठ कहलाता है खेती अथवा आग्नेय (लकड़ी) उस की जीविका होती है ॥ ३१ ॥ सेना की अथवा शस्त्र की जीविका अंबष्ठों की है—और वैश्य की कन्या में जो चोरी से ब्राह्मण से पैदा हो उसे कुंभकार (कुम्हार) कहते हैं ॥ ३२ ॥ यह कुलाल की वृत्ति (मट्टी के पात्र बनाने) से जीवे
भाषार्थसहिता ॥
सूतकेप्रेतकेवापि दीक्षाकालेऽथवापनम् ॥ ३३ ॥ नाभेरूर्ध्वंतुवपनं तस्मान्नापितउच्यते । कायस्थइतिजीवेत्तु विचरेच्चइतस्ततः ॥ ३४ ॥ काकाल्लोहं यंयमात्क्रौर्यंस्थपतेरथकृंतनम् । आद्यक्षराणिसंगृह्य कायस्थइतिकीर्तितः ॥ ३५ ॥ शूद्रायांविधिनाविप्राज्जातः पारशवोमतः । भद्रकादीन्समाश्रित्य जीवेयुःपूतकाःस्मृताः ॥ ३६ ॥ शिवाद्यागमविद्यावैस्तथामंडलवृत्तिभिः । तस्यांवैचौरसोवृत्तो निषादोजातउच्यते ॥ ३७ ॥ वनेदुष्टमृगान्हत्वा जीवनंमांसविक्रयः । नृपाज्जातोथवैश्यायां गृह्यायांविधिनास्मृतः। वैश्यवृत्त्यातुजीवेत क्षत्रधर्मंनचारयेत् ॥ ३८ ॥ तस्यांतस्यैवचौरेण मणिकारःप्रजायते ।
इसी से नापित (नाई) होते हैं जन्मसूतक अथवा मरणसूतक में अथवा दीक्षा (मंत्र का उपदेश) काल में ये केशों का छेदन करते हैं ॥ ३३ ॥ नाभी के ऊपर के केश काटने से नापित कहाता है और यह कायस्थ नाम से इधर उधर विचरता हुआ जीविका करता है ॥ ३४ ॥ काक (कौआ) से चंचलता-यमराज से क्रूरता-स्थपति (कारीगर) से काटना इन तीनों अर्थ के जताने के लिये इन तीनों शब्दों के पहिले २ अक्षर लेकर इसको कायस्थ कहा है ॥ ३५ ॥ विधि से विवाही शूद्र की कन्या में जो ब्राह्मण से पैदा हो वह पारशव (पारधी) माना है ये भद्रक (अच्छे) आदि पहाड़ों पर रह कर जीवें और पूतक कहाते हैं ॥ ३६ ॥ शिवादि आगम विद्या (पंचरात्र आदि) ओं से अथवा मंडलवृत्ति से ये जीवें उसी जाति में (स्त्री पुरुष दोनों पारशवों ) जो चौरस पुत्र है उसे निषाद कहते हैं ॥ ३७ ॥ वन में दुष्ट मृगों को मार कर मांस बेचना उन की जीविका है विधि से विवाही वैश्य कन्या में जो पुत्र क्षत्रिय से पैदा हो वह वैश्यवृत्ति से जीवे और क्षत्रिय के धर्म को न करे ॥ ३८ ॥ वैश्य की कन्या में क्षत्रिय से चोरी करके जो पैदा हो वह मणिकार (मीनाकार)
औशनसस्मृतिः ॥ ९
मणीनांराजतांकुर्यान्मुक्तानांवेधनक्रियाम् ॥ ३९ ॥ प्रवालानांचसूत्रित्वं शाखानांवलयक्रियाम् । शूद्रस्यविप्रसंसर्गाज्जातउग्रइतिस्मृतः ॥ ४० ॥ नृपस्यदंडधारःस्यादृढंदंड्येषुसंचरेत् । तस्यैवचौर्य्यसंवृत्या जातःशुण्डिकउच्यते ॥ ४१ ॥ जातदुष्टान्समारोप्य शुंडाकर्मणियोजयेत् । शूद्रायांवैश्यसंसर्गाद्विधिनासूचिकःस्मृतः ॥ ४२ ॥ सचक्राद्विप्रकन्यायां जातस्तक्षकउच्यते । शिल्पकर्माणिचान्यानिप्रासादलक्षणंतथा ॥ ४३ ॥ नृपायामेवतस्यैव जातोयोमत्स्यबंधकः । शूद्रायांवैश्यतश्चौर्यात्कटककारइतिस्मृतः ॥ ४४ ॥ वशिष्ठशापात्त्रेतायां केचित्पारशवारतथा ।
होता है मणियों का रंगना वा मोतियों का बींधना इस का काम है ॥३९॥ अथवा मूंगों की माला वा कड़े बनाना इसका काम है शूद्र के घर ब्राह्मण के संसर्ग से जो पैदा हो वह उग्र कहाता है ॥ ४०॥ यह राजा का दंडधार होता है और दंड के योग्यों को दंड देता है और जो ब्राह्मण से शूद्री में चोरी से हो उसे शुंडिक कहते हैं ॥ ४१ ॥ जन्मते ही दुष्टों के ऊपर अधिपति बना-कर उस शुंडी को शुंडा कर्म ( सूली देना ) में राजा नियुक्त करे विधि से विवाही शूद्र कन्या में जो वैश्य से पैदा हो उसे सूचिक ( दरजी ) कहते हैं॥४२ सूचिक से ब्राह्मण की कन्या में जो पैदा हो उसे तक्षक (बढ़ई) कहते हैं शिल्प कर्म ( कारीगरी ) वा प्रासाद लक्षण ( मकान बनाने का प्रकार ) काम को करता है ॥ ४३ ॥ क्षत्रिय की कन्या में जो सूचिक से पैदा हो वह मत्स्यबंधक ( धीवर ) होता है शूद्र की कन्या में चोरी से जो वैश्य से पैदा हो वह कटकार कहाता है ॥ ४४ ॥ त्रेतायुग में वशिष्ठजी के शाप से भी कोई एक पार-