अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३० भाषार्थसहिता ॥
संक्षेपेणद्विजश्रेष्ठा धर्मस्तेषांसनातनः ॥ १३ ॥
श्रुत्वैवंमुनयोधर्मं स्वर्गमोक्षफलप्रदम् ।
प्रणम्यतमृषिं जग्मुर्मुदिताःस्वंस्वमाश्रमम् ॥ १४ ॥
धर्मशास्त्रमिदंसर्वं हारीतमुखनिःसृतम् ।
अधीत्यकुरुतेधर्मं सयातिपरमांगतिम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मणस्यतुयत्कर्म कथितंबाहुजस्यच ।
ऊरुजस्यापियत्कर्म कथितंपादजस्यच ॥ १६ ॥
अन्यथावर्तमानस्तु सद्यःपततिजातितः ।
योयस्याभिहितोधर्मः सतुतस्यतथैवच ॥ १७ ॥
तस्मात्स्वधर्मंकुर्वीत द्विजोनित्यमनापदि ।
राजेन्द्रवर्णाश्चत्वारश्चत्वारश्चापिचाश्रमाः ॥१८॥
स्वधर्मं येनुतिष्ठंति तेयांतिपरमांगतिम् ।
स्वधर्मेणयथानृणां नारसिंहःप्रसीदति ॥१९॥
से उन का सनातन सब धर्म तुम से कहा ॥ १३ ॥ स्वर्ग और मोक्षरूपदाता धर्म को इस प्रकार सुन कर उन हारीत मुनि को नमस्कार करके प्रसन्न हुए सब मुनि अपने २ आश्रम को चलेगये ॥ १४ ॥ हारीत मुनि के मुख से निकले इस सब धर्मशास्त्र को पढ़कर जो धर्म करता है वह परम गति (मोक्ष) को प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को जो कर्म इस में कहा है ॥ १६ ॥ उस के विरुद्ध जो बर्ताव करता है वह शीघ्र जाति से पतित होता है । जो जिस वर्ण का धर्म कहा है वह वैसा ही उस वर्ण का धर्म है उस में लौट पौट कुछ में की जाय तो वह उस का धर्म न होगा ॥ १७ ॥ आपत्काल को छोड़ कर प्रति दिन द्विज लोग अपने २ धर्म को करें राजा है मुख्य जिन में ऐसे-चार वर्ण और चार ही आश्रम हैं ॥ १८ ॥ अपने धर्म को जो करते हैं वे परम गति को प्राप्त होते हैं जैसे अपने धर्म से मनुष्यों पर नरसिंह भगवान् प्रसन्न होते हैं ॥ १९ ॥