अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 136, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंहारीतस्मृतिः ॥ ३१
नतुष्यतितथान्येन कर्मणामधुसूदनः अतःकुर्वन्निजंकर्म यथाकालमतन्द्रितः ॥२०॥ सहस्रानीकदेवेशं नारसिंहंचसालयम् । उत्पन्नवैराग्यबलेनयोगी ध्यायेत्परंब्रह्मसदाक्रियावान् । सत्यंसुखरूपमनंतमाद्यं विहायदेहंपदमेतिविष्णोः ॥२२॥
इतिहारीते धर्मशास्त्रे सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
वैसे अन्य वर्गों के धर्म से प्रसन्न नहीं होते इससे नित्य आलस्य को छोड़ कर समय पर अपना धर्म करता हुआ मनुष्य ॥२०॥ सहस्रों देवों के स्वामी भगवान् को प्राप्त होता है ॥२१॥ उत्पन्न हुए वैराग्य के बल से जो सदाचारी धर्म कर्म निष्ठ योगी परब्रह्म का ध्यान करता है वह देह को त्याग कर सत्य सुखरूप अनन्त (अविनाशी) आद्य जो विष्णु का पद उस को प्राप्त होता है ॥ २२ ॥
इति हारीते धर्म-शास्त्रे ७ अध्याय भाषा समाप्ता ।
समाप्तं चेदं धर्मशास्त्रम् ॥