अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
द्वादशेवैश्यजातिस्तु व्रतोपनयमर्हति ॥ १९ ॥
४ व्यासस्मृति ॥
द्वादशेवैश्यजातिस्तु व्रतोपनयमर्हति ॥ १९ ॥ तस्यप्राप्तव्रतस्यायं कालःस्याद्विगुणाधिकः । वेदव्रतच्युतोव्रात्यः सव्रात्यस्तोममर्हति ॥ २० ॥ द्वेजन्मनीद्विजातीनां मातुःस्यात्प्रथमन्तयोः । द्वितीयंछन्दसांमातुर्ग्रहणाद्विधिवद्गुरोः ॥ २१ ॥ एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तोवान्यदोषतः । श्रुतिस्मृतिपुराणानां भवेदध्ययनक्षमः ॥ २२ ॥ उपनीतोगुरुकुले वसेन्द्रियसमाहितः । बिभृयाद्दण्डकौपीनोपवीताजिनमेखलाः ॥ २३ ॥ पुण्येन्हिगुर्वनुज्ञातः कृतमन्त्राहूतिक्रियः । स्मृत्वोङ्कारंचगायत्री मारभेद्वेदमादितः ॥ २४ ॥ शौचाचारविचारार्थं धर्मशास्त्रमपिद्विजः ।
वर्ष क्षत्रिय के और बारहवें वर्ष वैश्य के बालक व्रतोपनयन (जनेउ) के योग्य होते हैं ॥१९॥ इन के उपनयन संस्कार का जो समय है उनसे दूने से अधिक समय यदि बीत जाय और संस्कार न हो तो वे तीनों वर्ण के बालक वेद के व्रत से पतित "व्रात्य" हो जाते हैं तब वे व्रात्यस्तोम [प्रायश्चित्त] करने योग्य हो जाते हैं ॥ २० ॥ द्विजातियों के दो जन्म होते हैं, उन में पहिला माता से और दूसरा गुरु से वेदों की माता ( गायत्री ) के विधिपूर्वक ग्रहण करने से ॥ २१ ॥ ऐसे द्विजत्व को प्राप्त हुआ और अन्य दुराचारादि दोषों से निवृत्त होकर श्रुतिस्मृति पुराण इन के पढ़ने के योग्य होता है ॥२२॥ यज्ञोपवीत होने पर गुरु के कुल में सावधान होकर वसे और दण्ड, कौपीन, जनेऊ, मृगछाला, और मेखला (कंधनी) इन सब ब्रह्मचर्य के शास्त्रोक्त चिन्हों को धारण करे ॥२३॥ फिर पुण्य दिन शुभ मुहूर्त में गुरु की आज्ञा से मन्त्रों से समिदाधान कर तथा ओंकार और गायत्री का स्मरण करके आदि से अपने वेद का पढ़ना आरम्भ करे ॥ २४ ॥ द्विज ब्रह्मचारी शौच तथा आचार को सम्यक् जानने के लिये गुरु से धर्मशास्त्र को भी पढ़े और धर्मशास्त्र में कहे कर्म को गुरु की
भःचार्यसंहिता ॥ ५
पठेत्तगुरोःसम्यक् कर्मतद्दिष्टमाचरेत् ॥ २५ ॥ ततोभिवाद्यस्थविरान् गुरुंचैवसमाश्रयेत् । स्वाध्यायार्थंतदापन्नः सर्वदाहितमाचरेत् ॥ २६ ॥ नापक्षिपोऽपिभाषेत नाव्रजेत्ताडितोऽपिवा । विद्वेषमथपैशुन्यं हिंसनंचार्कवीक्षणम् ॥ २७ ॥ तौर्य्यत्रिकानृतोन्मादपरिवादानलङ्क्रियाम् । अञ्जनोद्वर्त्तनादर्शस्रग्विालेपनयोषितः ॥ २८ ॥ वृथाटनमसन्तोषं ब्रह्मचारीविवर्जयेत् । ईषच्चलितमध्यान्हेऽनुज्ञातोगुरुणास्वयम् ॥ २९ ॥ अलोलुपश्चरेद्भैक्षं व्रतिपूत्तमवृत्तिषु । सद्योभिक्षान्नमादाय वित्तवत्तदुपस्पृशेत् ॥ ३० ॥ कृतमाध्यान्हिकोऽश्नीयादनुज्ञातोयथाविधि । नाद्यादेकान्नमुच्छिष्टं भुक्त्वाचाचामितामियात् ॥ ३१ ॥
आज्ञानुसार भली प्रकार करे ॥ २५ ॥ फिर वृद्धों को नमस्कार करके गुरु का आश्रय ले और वेद पढ़ने के लिये सावधानी से गुरु के हित का आचरण करे ॥ २६ ॥ निन्दा करने पर भी गुरु के सम्मुख न बोले और गुरु की ताड़ना से भी वहां से कहीं न जावे । वैर, पैशुन्य, (चुगलपन) हिंसा, सूर्य को बिना प्रयोजन देखना ॥ २७ ॥ तौर्य्यत्रिक (गाना, बजाना, नाचना) झूठ बोलना, उन्माद, निन्दा, भूषण पहरना, अंजन, उबटन, आदर्श ( शीशा ) का देखना पुष्प माला, चन्दन आदि सुगन्ध का लगाना और स्त्री का स्मरण, देखना, स्पर्श आदि ॥ २८ ॥ वृथा फिरना-असन्तोष नाम लोभलालच इन को ब्रह्मचारी वर्जन कर देवे और जब कुछ मध्यान्ह ढले उस समय गुरु की आज्ञा से आप ही ॥ २९ ॥ चंचलता को त्याग कर उत्तम आचरण वाले वेदाध्ययन जिन के होते और जो पञ्चमहायज्ञादि करते हों, ऐसे ब्राह्मणादि द्विजों के घरों से ब्रह्मचारी भिक्षा मांगे और शीघ्र भिक्षा के अन्न को लाकर लब्ध वस्तु के समान उस का संस्कार करे ॥ ३० ॥ फिर मध्यान्ह का कर्म करके गुरु की आज्ञा से विधि पूर्वक भोजन करे और एक घर का भिक्षा अन्न और उच्छिष्ट [ बचा हुआ ] इन को न खावे यदि खावे तो आचमन करे ॥३१॥
६ व्यासस्मृति ॥
नान्यद्भिक्षितमादद्यादापन्नोद्रविणादिकम् । अनिन्द्यामन्त्रितःश्राद्धे पैत्रेऽद्याद्गुरुचोदितः ॥ ३२ ॥ एकान्नम्प्यविरोधे व्रतानांप्रथमाश्रमे । भुक्त्वागुरुमुपासीत कृत्वासन्द्युक्षणादिकम् ॥ ३३ ॥ समिधोऽग्नावादधीत ततःपरिचरेद्गुरुम् । शयीतगुर्व्वनुज्ञातः प्रह्वश्चप्रथमंकरीः ॥ ३४ ॥ एवमन्वहमभ्यासी ब्रह्मचारीव्रतेञ्चरेत् । हितोपवादःप्रियवाक् सत्यभूतार्थसाधकः ॥ ३५ ॥ नित्यमाराधयेदेनमासमाप्तौसुविस्तरम् । अनेनविधिनाधीतो वेदःस्याद्द्विजन्मनेत् ॥ ३६ ॥ शापानुग्रहसामर्थ्यमृषीणाञ्चभवेत्कुशाम् । पयोऽमृताभ्याम्मधुभिः साज्यैःप्रीणान्तदेवताः ॥ ३७ ॥ तस्मादहरहश्चैतमध्यापयेत्प्रयत्नतः ।
नियम बद्ध रहता हुआ ब्रह्मचारी व्यथा में भोजन से अन्य धनादि पदार्थ किसी के आदर या आदर पूर्वक देने पर भी न लेवे और अनिन्द्य (शुद्ध) पुरुष के निमन्त्रण देने पर भी पितरों के श्राद्ध में गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥ ३२ ॥ यदि ब्रह्मचर्याश्रम के अन्य नियम व्रतों में बाधा न होती हो तो ब्रह्मचारी किसी एक गृहस्थ के भिक्षान्न को खाकर भी तथा सन्धुक्षण (अग्ने सुप्रवः) आदि कर्म करके गुरु की सेवा किया करे ॥ ३३ ॥ प्रतिदिन विधि पूर्वक समिदाधान कर्म करके गुरु की सेवा किया करे और प्रथम गुरु को नमस्कार करके गुरु की आज्ञा से शयन करे ॥ ३४ ॥ ऐसे प्रति दिन अभ्यास करता हुआ ब्रह्मचारी व्रतों को चरे और हित की बात बोले, प्यारी वाणी रक्खे और भली प्रकार गुरु के कार्य को साधे ॥ ३५ ॥ वेद के पढ़ने की समाप्ति तक नित्य गुरु की आराधना (सेवा) करे । इस विधि से पढ़ा हुआ वेद का मन्त्र द्विज को ऐसा करता है कि वह ॥३६॥ शाप और वरदान देने में समर्थ और ऋषियों के लोक में जाने योग्य हो जाता है। ब्रह्म-चारी ने विधि पूर्वक किये वेदाध्ययन सेः दूध, अमृत, मधु और आज्य (घी) इनसे तृप्त होने के तुल्य देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ३७ ॥ जिससे अनध्यायों
भाषाधर्मसंहिता ॥ ९
यदङ्गंतदनध्याये गुरोर्वचनमाचरन् ॥ ३८ ॥ व्यतिक्रमादसम्पर्णमनहंकृतिराचरेत् । परत्रेहचतद्ब्रह्म अनधीतमपिद्विजम् ॥ ३६ ॥ यस्तूपनयनादेतदा मृत्योर्व्रतमाचरेत् । सनैष्ठिकोब्रह्मचारी ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ४० ॥ उपकुर्वाणकोयस्तु द्विजःषड्विंशवार्षिकः। केशान्तकर्मणान्तत्र यथोक्तचरितव्रतः ॥ ४१ ॥ समाप्यवेदान्वेदाँवा वेदंवाप्रसभंद्विजः । स्नायात्तगुर्वनुज्ञातः प्रहृत्तोदितदक्षिणः ॥ ४२ ॥ इति श्रीवेदव्यासीये धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ एवंस्नातकतांप्राप्तो द्वितीयाश्रमकाङ्क्षया । प्रतीक्षेतविवाहार्थमनिन्द्यान्वयसम्भवाम् ॥ १ ॥
को छोड़ कर प्रतिदिन विधिपूर्वक वेद को पढ़े और गुरु की आज्ञा पालन करता हुआ वेद के जो अंग (व्याकरणा आदि) हैं उन्हें अनध्यायी में पढ़े। इस नियमों का व्यतिक्रम करने में वेदाध्ययन असम्पूर्ण (पूरा नहीं होता) रहता है इससे अहंकार को छोड़कर यही आचरण करे, वह वेद चाहे द्विज न पढ़े (अर्थात् बहुत कम पढ़े) तो भी गुरु सेवादि नियम को सम्यक् पूरा करने वाले ब्रह्मचारी को इस लोक और परलोक में सुख देता है ॥३८॥ जो यज्ञोपवीत संस्कार से लेकर मृत्यु पर्यन्त इस व्रत को करे वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी ब्रह्मसायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है ॥ ४० ॥ केशांत कर्म तक शास्त्र में कहे के अनुसार किये हैं व्रत जिसने ऐसा जो छब्बीस वर्ष का द्विज हो वह यदि गृहाश्रम करके अपना दा भिक्षादि देने द्वारा गरीबों का उपकार करना चाहता हो तो ॥४१॥ तीनों वेदों को वा दो वेदों को या एक वेद को शीघ्र समाप्त करके और गुरु की आज्ञा से गुरु की दक्षिणा देकर विधि पूर्वक समावर्त्तन संस्कार करे ॥ ४२ ॥
श्रीवेदव्यासीयधर्मशास्त्र के प्रथम अध्याय का यह अनुवाद पूरा हुआ ॥
द्वितीय गृहस्थ आश्रमकी इच्छा से ऐसे स्नातकरूप को प्राप्त हुआ द्विज शुद्ध वंश में पैदा हुई स्त्री को विवाह के लिये प्रतीक्षा (अन्वेषण) करे ॥ १ ॥
८ व्यासस्मृति ॥
अरोगदुष्टवंशोत्था मशूल्कदानदूषिताम् ।
सवर्णामसमानार्षाममातृपितृगोत्रजाम् ॥ २ ॥
अनन्यपूर्विकांलघ्वीं शुभलक्षणसंयुताम् ।
धृताधोवसनांगौरीं विख्यातदशपूरुषाम् ॥ ३ ॥
ख्यातनाम्नःपुत्रवतः सदाचारवतः सतः
दातुमिच्छोर्दुहितरं प्राप्यधर्मेणचोद्वहेत् ॥ ४ ॥
ब्राह्मोद्वाहविधानेन तदभावेपरोविधिः ।
दातव्यैपासदृक्षाय वयोविद्वान्वयादिभिः ॥ ५ ॥
पितृतत्पितृभ्रातृषु पितृव्यज्ञातिमातृषु ।
पूर्वाभावेपरोदद्यात्सर्वाभावेस्वयंव्रजेत् ॥ ६ ॥
यदिसादातृवैकल्याद्रजः पश्येत्कुमारिका ।
और जिस स्त्री के कुष्ठादि कोई बड़ा असाध्य वा कष्ट साध्य रोग न हो-दुष्ट वंश की न हो, जिस का बाप धन लेकर विवाह करना न चाहता हो, अपने वर्ण की हो-अपने प्रवर की न हो-तथा जो माता वा पिता के गोत्र की न हो ॥ २ ॥ जिस का अन्य के साथ पहिले विवाह न हुआ हो, जो विशेष मोटी न हो, शुभलक्षणों वाली हो, अधोवस्त्र ( लहंगा ) पहनती हो, गौरी ( ८ वर्ष की ) हो और जिस के कुल में पूर्वज दश पुरुष तक विख्यात कुलीन हों ॥३॥ जिस का नाम विख्यात हो ऐसे पुत्रवाले और अच्छे आचरण वाले की पुत्री हो जो अपनी कन्या का विवाह कर देना चाहता हो, ऐसे की कन्या मिलती हो तो धर्मानुसार शास्त्रोक्त विधि से विवाह कर लेवे ॥४॥ ब्राह्मविवाह की विधि से विवाहे और ब्राह्मविवाह के न हो सकने पर दूसरी ( दैव आदि विवाहों की ) विधि करे और यह पुरुष अवस्था विद्या, और कुलीनता में समान वा कुछ बड़ा हो उस वर के साथ कन्या का विवाह करे ॥ ५ ॥ पिता, पितामह, भाई, चाचा, कुटुम्ब के मनुष्य, माता, इन में पहिले २ के अभाव में अगला २ कन्या का विवाह करे। यदि इन में से कोई भी न हो तो कन्या आप ही योग्य पति के साथ विवाह कर लेवे ॥ ६ ॥ यदि यह कन्या देने वालों की असावधानी वा ढील ढाल से विवाह से पहिले ही रजस्वला होने लगे तो जितने वर्षों तक रजस्वला होती रहे उतनी ही
भाषार्थसहिता ॥ ९
भ्रूणहत्याश्चयावत्यः पतितःस्यात्तदप्रदः ॥ ७ ॥ तुभ्यंदास्याम्यहमिति ग्रहीष्यामीतिथस्तयोः । कृत्वासमयमन्योन्यं भजतेनसद्ण्डभाक् ॥ ८ ॥ त्यजन्नदुष्टांदण्ड्यःस्याद्दूषयंश्चाप्यदूषिताम् । ऊढायांहिसवर्णायामन्याँवाकाममुद्वहेत् ॥ ९ ॥ तस्यामुत्पादितःपुत्रो नसवर्णात्प्रहीयते । उद्वहेत्क्षत्रियांविप्रो वैश्यांचक्षत्रियोविशाम् ॥ १० ॥ नतुशूद्रांद्विजःकश्चिन्नाधमःपूर्ववर्णजाम् । नानावर्णासुभार्यासु सवर्णासहचारिणी ॥ ११ ॥ धर्म्याधर्मेषुधर्म्मिष्ठा ज्येष्ठामप्यस्वजातिषु । पाटितोऽयंद्विजाःपूर्वमेकंदेहःस्वयंभुवा ॥ १२ ॥
भ्रूणहत्याओं के पाप से कन्या का विवाह न करने वाला पतित होता है ॥७॥ मैं तुम को दूंगा और मैं उस को ग्रहण करूंगा ऐसे परस्पर समय की प्रतिज्ञा वर और दाता दोनों करके यदि उन दोनों में से जो अपनी प्रतिज्ञा को पूरी न करे वही राजदण्ड का भागी होता है ॥ ८ ॥ जो स्त्री दूषित न हो उसे जो त्यागे वह और जो निर्दोष कन्या को दूषण लगाये वे दोनों राजदण्ड के योग्य होते हैं। यदि अपने वर्ण की एक कन्या के साथ विवाह कर लिया हो तो दूसरे क्षत्रियादि वर्ण की अन्य स्त्री के साथ विशेष काम भोगेच्छा होने पर विवाह कर लेवे ॥ ९ ॥ उस अन्य वर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है वह सवर्ण ही अर्थात् पिता के वर्ण का होता है । ब्राह्मण, क्षत्रिया और वैश्य कन्या के साथ विवाह करे और क्षत्रिय पुरुष वैश्य कन्या के साथ कर ले ॥ १० ॥ कोई भी द्विज, शूद्र कन्या के साथ विवाह न करे और नीच वर्ण का पुरुष अपने से उत्तम वर्ण की कन्या के साथ विवाह न करे । अनेक वर्ण की स्त्रियों से विवाह किया हो तो जो सवर्णा हो वही अग्निहोत्रादि धर्म कार्यों में सहचारिणी रहे ॥ ११ ॥ जिस पुरुष ने कई सवर्णा स्त्रियों से विवाह किया हो तो अग्निहोत्रादि धर्म के कामों में जो अधिक श्रद्धावती हो वही धर्मानुकूल बड़ी होने से सहचारिणी होनी चाहिये। हे द्विजो ! स्त्री पुरुष मिल के यह एक ही देह पहिले था जिस को ब्रह्मा जी ने स्त्री पुरुष रूप दो भाग किया है ॥ १२ ॥
२
१० व्यासस्मृतिः ॥
पतयोर्द्धेनचार्द्धेन पत्न्योऽभूवन्नितिश्श्रुतिः । यावन्नविन्दतेजायां तावदर्द्धोभवेत्पुमान् ॥ १३ ॥ नार्द्धंप्रजायतेसर्वं प्रजायेतेत्यपिश्रुतिः । गुर्वीसाभूस्त्रिवर्गस्य वोढुंनान्येनशक्यते ॥ १४ ॥ यतस्ततोन्वहंभृत्यास्ववशोविभृयाञ्चताम् । कृतदारोऽग्निपत्नीभ्यां कृतवेश्मागृहंवसेत् ॥ १५ ॥ स्वकृतंवित्तमासाद्य वैतानाग्नीन्नहापयेत् । स्मार्तवैवाहिकेवह्नौ श्रौतंर्वैतानिकाग्निषु ॥ १६ ॥ कर्मकुर्यात्प्रतिदिनं निविद्यन्प्रीतिपूर्व्वतः । सम्यग्धर्मार्थकामेषु दम्पतिभ्यामहर्निशम् ॥ १७ ॥ एकचित्ततयाभाव्यं समानव्रतवृत्तितः । नपृथग्विद्यतेस्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम् ॥ १८ ॥ भावनोह्यनिर्देशाद्वा वृत्तिशास्त्रविधिःपरः ।
आधे देह से पति और आधे से स्त्री हुई है यह श्रुतिमें लिखा है। इसलिये जब तक पुरुष स्त्री को न विआहे तब तक आधा ही रहता है इसी कारण पत्नी अर्द्धाङ्गिनी कहाती है ॥ १३॥ वेद में लिखा है कि पुरुष को सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिये। और बिना पत्नी के आधा शरीर पुत्रोत्पत्ति कर नहीं सकता इस से सन्तान के साथ विवाह करना आवश्यक है। वह स्त्री, धर्म, अर्थ, और काम की बड़ी भारी भूमि (पैदा करने वाली) है। उस त्रिवर्ग की प्राप्ति पत्नी के बिना अन्य साधन से नहीं हो सकती ॥१४॥ जहां तहां के व्यभिचारादि से बच कर अपने शरीरेन्द्रियों को वशी भूत रखता हुआ गृहस्थ पुरुष उस स्त्री का भरण पोषण करे ; विवाह करके अग्नि और पत्नी के सहित पुरुष घर को बना कर उस में बसे ॥ १५॥ अपने परिश्रम से पैदा किये धन को प्राप्त हो कर विधि से स्थापित किये श्रौत अग्नियों को न त्यागे । स्मृति में कहे कर्मों को विवाह सम्बन्धी गृह्य अग्नि में और श्रौत-कर्मों को श्रौत अग्नियों में किया करे ॥१६॥ प्रतिदिन विधि और प्रीति पूर्वक उक्त कर्मा को करे-स्त्री पुरुषों को धर्म, अर्थ, कामों में रात दिन भलीप्रकार ॥१७॥ एक मन, एक व्रत, एकवृत्ति से रहना चाहिये स्त्रियों को धर्म अर्थ काम को प्राप्त करने का पति से पृथक् कोई साधन नहीं है॥१८॥ भाव (पति के अभिप्राय)
भाषार्थसहिता ॥ ११
पत्युःपूर्वंसमुत्थाय देहशुद्धिंविधायच ॥ १९ ॥
उत्थायशयनाद्यानि कृत्वावेश्मविशोधनम् ।
मार्जनैर्लेपनैःप्राप्य साग्निशालांस्वमङ्गणम् ॥ २० ॥
शोधयेदग्निकार्याणि स्निग्धान्युष्णेनवारिणा ।
प्रोक्षणैर्यैरितितान्येव यथास्थानंप्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
द्वन्द्वपात्राणिसर्वाणि न कदाचिद्वियोजयेत् ।
शोधयित्वातुपात्राणि पूरयित्वातुधारयेत् ॥ २२ ॥
महानसस्यपात्राणि बांहिःप्रक्षाल्यसर्वथा ।
मृद्भिश्चशोधयेच्चुल्लीं तत्राग्निंविन्यसेत्ततः ॥ २३ ॥
स्मृत्वानियोगपात्राणि रसांश्चद्रविधानिच ।
कृतपूर्वाह्नकार्याच श्वशुरानभिवादयेत् ॥ २४ ॥
ताभ्यांभर्तृपितृभ्यांचा भ्रातृमातुलबान्धवैः ।
भ या उसकी आज्ञा से स्त्री धर्मादि को जाने तथा करे यही शास्त्र की उत्तम विधि है। स्त्री पति से पहले उठ कर और देह की शुद्धि करके ॥ १९ ॥ शय्या आदि को उठाकर और झाडू आदि से घर का शोधन (सफाई) करके मार्जन (बुहारने) और लीपने से अग्नि की शाला और अपने आंगन को ॥ २० ॥ शुद्ध करे और अग्नि के कार्य जिनसे होमादि होते हों ऐसे (यज्ञ पात्र आदि) जो चिकने हों उनको (प्रोक्षणैर्यै०) इस मन्त्र से गर्म जल से शुद्ध करे, फिर उन्हें जहां के तहां रख दे ॥२१॥ शूर्प-अग्निहोत्र हवणी, स्रुक्, स्रुव, उलूखल-मुसल, दृषत् उपला इत्यादि एक साथ काम आने वाले जो दो २ पात्र हैं उनको कदापि पृथक् २ न रक्खे। फिर पात्रों को शुद्ध करके और जल आदि से भर कर रक्खे ॥ २२ ॥ चौके से बाहर महानस (रसोई) के सब पात्र धोकर पीली मिट्टी से चूल्हे को पोत कर उस में अग्नि को स्थापित कर देवे ॥२३॥ बरतने के पात्रों को और रसों तथा द्रव्यों को स्मरण (याद) करके कि किस २ धातु आदि के पात्र में कौन २ रसादि रखना है ऐसा स्मरण करके उन २ पात्रों में वह २ रसादि धर देवे। पूर्वाह्न (दुपहर से पहिले) के काम करके अपने गुरु (पति) की अभिवादन करे ॥ २४ ॥ अपने माता, पिता, वा पति के माता पिता अपने सासु ससुर ने तथा भाई,
१२ व्यासस्मृतिः ॥
वस्त्रालङ्काररत्नानि प्रदत्तान्येवधारयेत् ॥ २५ ॥ मनोवाक्कर्मभिःशुद्धा पतिदेशानुवर्तिनी । छायेवानुगतास्वच्छा सखीवहितकर्मसु ॥ २६ ॥ दासीवादिष्टकार्येषु भार्याभर्तुःसदाभवेत् । ततोऽन्नसाधनंकृत्वा पतयेविनिवेदयेत् ॥ २७ ॥ वैश्वदेवकृतैरन्नैर्भोजनीयांश्चभोजयेत् । पतिंचैवाभ्यनुज्ञाता सिद्धमन्नादिनात्मना ॥ २८ ॥ भुक्त्वानयेदहः शेषमायव्ययविचिन्तया । पुनःसायंपुनःप्रातर्गृहशुद्धिंविधायच ॥ २९ ॥ कृतान्नसाधनासाध्वी सुभृशंभोजयेत्पतिम् । नातितृप्त्यास्वयंभुक्त्वा गृहनीतिंविधायच ॥३०॥ आस्तीर्यसाधुशयनं ततःपरिचरेत्पतिम् । सुप्तेपत्यौतदभ्याशे स्वपेत्तद्गतमानसा ॥३१॥
माता, बांधव, इन के ही दिये वस्त्र और आभूषणों को धारण करै ॥ २५ ॥ मन, वाणी कर्म से शुद्ध, पति की आज्ञा में चलने वाली छाया के समान पति की अनुगासिनी और स्वच्छ हुई सखी के समान पति का हित करै ॥२६॥ पति के कहे कार्यों में पत्नी सदैव दासी के समान रहे फिर अन्न का उत्तम स्वादिष्ट पाक बना कर पति को निवेदन करके ॥ २७ ॥ किया है वैश्वदेव [ अर्थात्-देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ ] जिस्में ऐसे अन्न से जिमाने के योग्य [ अतिथि आदि ] को और पति को जिमावे और पति की आज्ञा लेकर शेष [ बचे ] अन्न को आप खावे तथा भोजन करने पश्चात् शेष दिन को आय ( आमदनी ) व्यय ( खर्च ) की चिन्ता से वितावे । इसी प्रकार नित्य २ सायं प्रातःकाल घर की शुद्धि करके ॥ २८ ॥ साध्वी स्त्री नित्य २ प्रीतिपूर्वक उत्तम स्वादिष्ट पाक बनाकर बड़ी प्रीति से अपने पति को जिमावे और अत्यन्त तृप्ति जिस में नही उतना भोजन स्वयं करके और घरका उत्तम प्रबन्ध करके ॥३०॥ अच्छी सेज बिछाकर पति की सेवा करे । जब पति सो जांय तब पति में है मन जिसका ऐसी स्त्री उन के समीप में सो जावे ॥३१॥
भाषार्य्यसंहिता ॥ १३
अनग्नाचापमत्ताच निष्कामाचजितेन्द्रिया । नोच्चैर्वदेन्नपरुषं नबहून्पत्युरप्रियम् ॥ ३२ ॥ नकेनचिद्विवदेच्च अप्रलापविलापिनी । नचातिव्ययशीलास्याद्धर्म्मार्थविरोधिनो ॥३३॥ प्रमादोन्मादरोषेष्र्या वञ्चनं चातिमानिताम् । पैशुन्यहिंसाविद्वेषमहाहङ्कारधूर्त्तता ॥३४॥ नास्तिक्यंसाहसंस्तेयं दम्भान्त्साध्वीविवर्जयेत् । एवंपरिचरन्तीसा पतिंपरमदैवतम् ॥३५॥ यशःशर्म्मैहयात्येव परत्रचसलोकताम् । योषितांनित्यकर्मोक्तं नैमित्तिकमथोच्यते ॥३६॥ रजोदर्शनतोदोषान् सर्वमेवपरित्यजेत् । सर्वैरलक्षिताशीघ्रं लज्जितान्तर्गृ हेवसेत् ॥ ३७ ॥
नंगी न रहै, प्रमत्त ( बेहोश ) न रहै, निष्काम और जितेन्द्रिय रहै, ऊंचे स्वर से चिल्ला कर न बोले और कठोर न बोले, बहुत व्यर्थ न बोले मितभाषिणी हो, पति को प्यारे न हों ऐसे वचन कदापि न बोले ॥ ३२ ॥ किसी के संग विवाद वा लड़ाई न करै, अनर्थक वृथा न बोले, किसी गुजरे दुःख का विलाप न करै, बहुत खर्च करने का स्वभाव न रक्खे, धर्म और अर्थ का विरोध न करै ॥ ३३ ॥ असावधानी, उन्माद, क्रोध, ईर्ष्या, ठगना, ( छल फरेब ) अत्यन्त मान चाहना, चुगलपन, हिंसा, बैर, बड़ा अहंकार, धूर्त्तपन ॥ ३४ ॥ नास्तिकपना, साहस (शीघ्रता में बिना विचारे चाहे जो कर बैठना) चोरी, दम्भ, इन सब को साध्वी स्त्री छोड़ देवे, ऐसे परम देवता रूप पति की सेवा करती यह स्त्री ॥ ३५ ॥ इस लोक में यश और सुख को और परलोक में पति के लोक को अवश्य प्राप्त होती है। यह स्त्री का नित्य कर्त्तव्य धर्म कहा अब इस के आगे नैमित्तिक ( जो किसी निमित्त से हो ) कर्म कहते हैं ॥ ३६ ॥ रजोदर्शन होने पर दोष (अपराध लगने) के भय से सब कामों को त्याग देवे। जहां किसी की न दीखे वहां शीघ्र ही जाकर घर के भीतर लज्जित हुई वसै ॥ ३७ ॥
१४ व्यासस्मृतिः ॥
एकाम्बरावृतादीना स्नानालङ्कारवर्जिता ।
मौनिन्यधोमुखीचक्षः पाणिपद्भिरञ्चला ॥ ३८ ॥
अश्नीयात्केवलं भक्तं नक्तंमृन्मयभाजने ।
स्वपेद्भुमावप्रमत्ता क्षपेदेवमहस्त्रयम् ॥ ३९ ॥
स्नायात्तच्चत्रिरात्रान्ते सचैलमुदितेरवौ ।
विलोक्यभर्तुर्वदनं शुद्धाभवतिधर्मतः ॥ ४० ॥
कृतशौचापुनःकर्म पूर्ववच्चसमाचरेत् ।
रजोदर्शनतोयाःस्यु रात्रयःषोडशर्तवः ॥ ४१ ॥
तत्रपुंबीजमक्लिष्टं शुद्धेक्षेत्रेप्ररोहति ।
चतस्रश्चादिमारात्रीः पर्व्ववर्जञ्चविवर्जयेत् ॥ ४२ ॥
गच्छेद्युग्मासुरात्रीषु पौष्णापित्रर्क्षराक्षसान् ।
प्रच्छादिनादित्यपथे पुमान्गच्छेदृतुंव्यापितः ॥ ४३ ॥
क्षमालङ्कृदवाप्नोति पुत्रंपूजितलक्षणम् ।
एकधोती वस्त्र धारण किये दीनदशा रखती हुई; स्नान और आभूषण से वर्जित, मौन हुई; नीचे को मुख किये, हाथ पग इन को विशेष न चलावे ॥३८॥ रात्रि के समय मिट्टी के पात्र में एक वार साम्भी भात खावे । प्रमाद छोड़ सावधान हुई पृथिवी पर चटाई डाल कर सोवे ऐसे तीन दिन वितावे ॥ ३९ ॥ तीन दिन पूरे होने पर चौथे दिन प्रातःकाल सूर्य के उदय हो जाने पर पहिने हुये वस्त्रों सहित स्नान कर फिर शुद्ध वस्त्र पहिन कर अपने पति के मुख को देख के धर्म से शुद्ध होती है ॥४०॥ किया है शौच जिसने वह स्त्री फिर पहिले के समान कामों को करै—रजोदर्शन से लेकर ऋतुकाल की जो सोलह रात्रि होती हैं ॥ ४१ ॥ उन रात्रियों में पुरुषका नीरोग बीज शुद्ध क्षेत्र में जमता है । चार पहिली रात्रियों को और अमावास्या अष्टमी पौर्णमासी चतुर्दशी ये पर्व्व तिथि सोलह में आजावें तो उन को भी छोड़ देवे ॥ ४२ ॥ शेष बची रात्रियों में से ६ । ८ । १० । १२ । १४ । १६ इन समरात्रियों में यदि रेवती-मघा आश्लेषा इन में से कोई नक्षत्र हो तो उस दिन सूर्य के अस्त हो जाने पर रात्रि में पुरुष अपनी स्त्री के पास जावे ॥४३॥ क्षमा से शोभायमान वह पुरुष
भाषाधर्मसंहिता ॥ १५
ऋतुकालेऽभिगम्यैवं ब्रह्मचर्य्यव्यवस्थितः ॥ ४४ ॥
गच्छन्नपियथाकामं नदुष्टःस्यादनन्यकृत् ।
भ्रूणहत्यामवाप्नोति ऋतौभार्य्यापराङ्मुखः ॥ ४५ ॥
सोत्त्वाप्यान्यतोगर्भं त्याज्याभवतिपापिनी ।
महापातकदुष्टाच पतिगर्भविनाशिनी ॥४६॥
सद्वृत्तचारिणींपत्नीं त्यक्त्वापततिधर्मतः ।
महापातकदुष्टोऽपि नाप्रतीक्ष्यस्तयापतिः ॥४७॥
अशुद्धेःक्षयमादूरं स्थितायामनुचिन्तया ।
व्यभिचारेणदुष्टानां पत्नीनांदर्शनादृते ॥४८॥
धिक्कृतायामवाच्यायामन्यत्रवासयेत्पतिः ।
पुनस्तामार्त्तवस्नानां पूर्ववद्व्यवहारयेत् ॥४९॥
धूर्त्तांचधर्मकामघ्नी मपुत्रांदीर्घगेगिणीम् ।
प्रशंसा के योग्य हैं सन्नरा जिस के ऐसे पुत्र को प्राप्त होता है । ऋतु के समय उक्त प्रकार स्त्री का संग करके अन्य समय पुरुष ब्रह्मचारी रहे ॥ ४४ ॥ ऋतु से भिन्न काल में भी यथेच्छ गमन करता हुआ पुरुष दूषित नहीं होता यदि अन्य निन्दित कर्म आदि न करे । जो ऋतुकाल में स्त्री का संग नहीं करता वह भ्रूणहत्या का दोष भागी होता है ॥ ४५ ॥ यदि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष से गर्भवती हो जाय तो उस पापिनी का त्याग कर देवे । और पति के गर्भ का नाश करने वाली तथा ब्रह्महत्यादि महापातकों से दूषित हो तो भी उस का त्याग करना चाहिये ॥ ४६ ॥ अच्छे आचरण करने वाली पत्नी को त्याग कर पुरुष धर्म से पतित होता है। और पति महापातक से दूषित हो तो शुद्धि तक वह स्त्री प्रतीक्षा करे (बाट देखे) ॥ ४७ ॥ महापातकी पति की शुद्धि पर्यन्त व्यभिचारी स्त्री दुष्ट पति उन के दर्शन को छोड़ कर थोड़ी दूर स्थान में चिन्ता से ठहरी पत्नी हो तब प्रतीक्षा करे ॥४८॥ और जिसे धिक्कार दी हो वा जिस के संग बोलना छोड़ दिया हो उसे दूसरे स्थान में बसा दे फिर जब वह ऋतु स्नान कर ले तब पूर्व के समान उस के संग बर्ताव करे ॥ ४९ ॥ जो स्त्री धूर्त हो, जो धर्म और काम को नष्ट करे,
१६ व्यासस्मृतिः॥
सुदुष्टांव्यसनासक्तमहितामधिवासयेत् ॥५०॥
अधिविन्नामपिप्रभुः स्त्रीणांतुसमतामियात् ।
विवर्णादीनवदना देहसंस्कारवर्जिता ॥५१॥
पतिव्रतानिराहारा शोष्यतेप्रोषितेपतौ ।
मृतंभर्त्तारमादाय ब्राह्मणीवन्हिमाविशेत् ॥५२॥
जीवन्तीचेत्त्यक्तकेशा तपसाशोधयेद्वपुः ।
सर्वावस्थासुनारीणां नयुक्तंस्यादरक्षणम् ॥५३॥
तदेवानुक्रमात्कार्यं पितृभर्तृसुतादिभिः ।
जाताःसुरक्षितावाये पुत्रपौत्रप्रपौत्रकाः ॥५४॥
येयजन्तिपितॄन्यज्ञैर्मोक्षप्राप्तिमहोदयैः ।
जिस के कोई पुत्र न हो, जिस को असाध्य दीर्घ रोग हो, जो अत्यन्त दुष्ट हो, जिसे कुछ व्यसन (मदिरा पीना आदि) लगा हो और जो पति का हित न चाहती वा करती हो इन ऐसी स्त्रियों का अधिवासन करे अर्थात् इन के विद्यमान होते भी द्वितीय विवाह कर लेवे ॥५०॥ जिस के होते दूसरा विवाह किया है पति को अन्य स्त्रियों के समान ही उस अधिविन्ना स्त्री का आदर वस्त्राभूषणादि से करना चाहिये । पति के परदेश जाने पर जो स्त्री मलिन वर्ण, दीन मुख, देह के संस्कार उबटना तैल मर्दन आदि को न करती हुई ॥५१॥ पति में व्रत रक्खे, अन्य पुरुष का मन में भी ध्यान न करे, अति सूक्ष्म आहार करे, देह को कृश निर्बल कर दे ऐसी ब्राह्मणी आदि पतिव्रता कहाती है, वह मरे हुए पति को लेकर अग्नि में प्रवेश करे (सती होजाय) ॥ ५२ ॥ यदि जीवित रहे तो केशों को मुंडा अपने तप से शरीर को शुद्ध करे स्त्रियों की सब अवस्था (बालक से वृद्ध तक) ओं में पुरुषों को रक्षा करनी उचित है ॥ ५३ ॥ सो बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्रादि लोग अपनी पुत्री, पत्नी और मातादि की क्रम से रक्षा करें। जो सन्तान अपने घर में उत्पन्न हुए वा गोद लेकर जिन का पालन पोषण किया ऐसे जो पुत्र पौत्र और प्रपौत्र कहाने वाले लोग ॥ ५४ ॥ मोक्ष देने वाले तथा महान् फलोदय वाले बड़े २ अग्निहोत्रादि यज्ञों से अपने पितरों को पूजते हैं वे लोग जब मरें तो उन का स्थापित किये अग्निहोत्र के
भाषासंहिता ॥ १९
मृतान्तानग्निहोत्रेण दाहयेद्विधिपूर्वकम् । दाहयेदविलम्बेन भार्याञ्चात्रव्रजेत्तसा ॥ ५५ ॥ इति श्रीवेदव्यासीये धर्म्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ नित्यंनैमित्तिकंकाम्यमितिकर्म्मत्रिधामतम् । त्रिविधंतच्चवक्ष्यामि गृहस्थस्यावधार्यताम् ॥ १ ॥ यामिन्याःपश्चिमेयामे त्यक्तनिद्रोहरिंस्मरेत् । आलोक्यमङ्गलद्रव्यं कर्म्मावश्यकमाचरेत् ॥ २ ॥ कृतशौचोनिषेव्याग्नीन्दन्तान्प्रक्षाल्यवारिणा । स्नात्वापास्यद्विजःसन्ध्यां देवादींश्चैवतर्पयेत् ॥३॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणि इतिहासानिचाभ्यसेत् । अध्यापयेन्नसच्छिष्यान् सद्दिप्रांश्चद्विजोत्तमः ॥ ४ ॥ अलब्धंप्रापयेल्लब्ध्वा क्षणमात्रंसमापयेत् ।
अग्नि में विधिपूर्वक दाह करे और ऐसे लोगों की पत्नी पहिले मरे तो उसका भी उसी अग्निहोत्र के अग्नि से दाह करे तो वह भी स्वर्ग में जाती है ॥५५॥
श्रीवेदव्यासीय धर्मशास्त्र के द्वितीय अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ ॥
गृहस्थ पुरुष का नित्य नैमित्तिक काम्य यह तीन प्रकार का कर्म शास्त्र में कहा है वह तीनों प्रकार का कर्म हम कहते हैं तुम लोग सुनो ॥१॥ ब्राह्मणादि द्विज पुरुष रात्रि के पिछले चौथे पहर में उठकर विष्णु का स्मरण करे [ हरि का ग्रहण उपलक्षणार्थ है तिस से शम्भु आदि अन्य देवों का भी स्मरण जानो ] फिर मङ्गल द्रव्य (गौ आदि) को देखकर शौचादि आवश्यक काम को करे ॥२॥ मल मूत्र त्यागादि शौच, अग्नि की सेवा, जल से दांतों का धोना, और स्नान करने पश्चात् संध्या करके देव ऋषि और पितरों का तर्पण करें ॥ ३ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण वेद, वेदाङ्ग, छः शास्त्र और इतिहासों का अभ्यास किया करे । अच्छे शिष्य और उत्तम ब्राह्मणों को वेदादि पढ़ाया करे ॥ ४ ॥
अप्राप्त ( जो अपने यहां न हो ) वस्तु की प्राप्ति का उपाय करै और उस वस्तु को पाकर कुछ थोड़े काल ठहर जावे फिर अन्य अप्राप्त की प्राप्ति का उपाय करे । विद्यादि गुणों में समर्थ होकर किसी धनादि से समर्थ राजा रईसादि के यहां अपने गुण को अप्रकट करके न बसे । किन्तु
३
१८ व्यासस्मृतिः ॥
समर्थोऽहिसमर्थेन नाविज्ञातःक्वचिद्वसेत् ॥ ५ ॥ सरित्सरःसुवापीषु गर्तप्रस्रवणादिषु । स्नायीतयावदुद्धृत्य पञ्चपिण्डानिवारिणा ॥ ६ ॥ तीर्थाभावेप्यशक्तोवा स्नायात्तोयैःसमाहृतैः । गृहाङ्गनगतस्तत्र यावदम्बरपीडनम् ॥ ७ ॥ स्नानमब्दैवतैःकुर्यात् पावनैश्चापि मार्जनम् । मन्त्रैःप्राणांस्त्रिरायम्य सौरैश्चार्कंविलोकयेत् ॥ ८ ॥ तिष्ठन्स्थित्वातुगायत्रीं ततःस्वाध्यायमारभेत् । ऋचांचयजुषांसाम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ॥ ६ ॥ इतिहासपुराणानां वेदोपनिषदांद्विजः । शक्त्यासम्यक्पठेन्नित्यमल्पमप्यासमापनात् ॥ १० ॥ सयज्ञदानतपसामखिलंफलमाप्नुयात् ।
अपने गुण को जता कर वहां से आदर प्राप्त करे ॥ ५ ॥ नदी, छोटा तालाब, बावड़ी, कुण्ड, झरने इन में से किसी में तब स्नान करे जब पहिले पांच पिण्ड मिट्टी को बाहर निकाल देवे॥६॥ कोई घाट नदी आदि में नहीं वा घाट तक जाने का सामर्थ्य न हो तो नदी आदि से जल मंगाकर वा कुए से जल को भर कर घर के आंगन में जितने जल से पहिना वस्त्र (धोती) भींग जाय उतने जल से स्नान करे ॥७॥ जल है देवता जिनका ऐसे वेद मन्त्रों से स्नान करे और (चित्पतिर्मापुनातु?) इत्यादि पावन मन्त्रों से मार्जन करे और व्याहृत्यादि मन्त्रों से तीन प्राणायाम करके सूर्य देवता वाले मन्त्रों से खड़ा हुआ सूर्य को देखे अर्थात् सूर्य नारायण को देखता हुआ उपस्थान करे॥८॥ फिर खड़ा होकर गायत्री का जप करके ब्रह्मयज्ञ की विधि से वेद का अभ्यास करे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ॥९॥ इतिहास, पुराण, वेदों के उपनिषद् इनका थोड़ा भी भाग उन २ की समाप्ति होने तक अपनी शक्ति के अनुसार जो द्विज भली प्रकार पढ़े ( यही स्वाध्याय नामक ब्रह्मयज्ञ कहाता है ) ॥ १० ॥ वह यज्ञ, दान, और तप के सम्पूर्ण फल को प्राप्त होता है तिस से ब्राह्मणादि द्विज पुरुष प्रतिदिन वाणी को वश में रख कर अर्थात् बीच में अन्य कुछ भी
प्रथमंकृतस्वाध्यायस्तर्पयेच्चाथदेवताः ॥ १२ ॥
भाषार्थसहिता ॥ १९
तस्मादहरहर्वेदं द्विजोऽधीयीतवाग्यतः ॥ ११ ॥
धर्मशास्त्रेतिहासादि सर्वेषांशक्तितःपठेत् ।
प्रथमंकृतस्वाध्यायस्तर्पयेच्चाथदेवताः ॥ १२ ॥
जान्वाच्यदक्षिणंदर्भैः प्रागग्रैःसयवैस्तिलैः ।
एकैकाञ्जलिदानेन प्रकृतिस्थोपवीतकः ॥ १३ ॥
समजानुद्वयोब्रह्म सूत्रहारउदङ्मुखः ।
तिर्यग्दर्भैश्चवामाग्रैर्यवैस्तिलविमिश्रितैः ॥ १४ ॥
अम्भोभिरुत्तरक्षिप्तैः कनिष्ठामूलनिर्गतैः ।
द्वाभ्यांद्वाभ्यामञ्जलिभ्यां मनुष्यांस्तर्पयेत्ततः ॥ १५ ॥
दक्षिणाभिमुखःसव्यं जान्वाच्यद्विगुणैःकुशैः ।
तिलैर्जलैश्चदेशिन्या मूलदर्भाद्विनिःसृतैः ॥ १६ ॥
दक्षिणांसोपवीतस्यान् क्रमेणाञ्जलिभिस्त्रिभिः ।
सन्तर्पयेत्तुदिव्यान्पितॄंस्तत्परांश्चपितॄन्स्वकान् ॥ १७ ॥
न बोलता हुआ वेद को पढ़े ॥ ११ ॥ और धर्मशास्त्र इतिहासादि का भी थोड़ा २ भाग अपनी शक्ति के अनुसार पढ़े इस प्रकार प्रथम स्वाध्याय करके देवताओं का आगे लिखे प्रकार से तर्पण करे ॥ १२ ॥ दहिने घोटू [ जानु ] को भूमि पर नवाय कर पूर्व को है अग्रभाग जिन का ऐसे कुश जौ, और तिल लेकर सव्य यज्ञोपवीत धारण किये पूर्वाभिमुख बैठा एक २ अंजलि देता हुआ तर्पण करे ॥ १३ ॥ दोनों जानु बराबर रख जनेऊ कंठ में कर उत्तर को मुख कर,-बांयी ओर अग्रभाग जिन का ऐसे तिरछे कुश और तिल मिले हुये जौ से ॥ १४ ॥ कनिष्ठा अंगुली के मूल से उत्तर में जो गिरें ऐसे जलों से दो २ अंजलियों से सनकादि मनुष्यों [ऋषियों] का तर्पण करे ॥१५॥ दक्षिण को मुख करके बायां जानु (घोंटू) भूमि पर टेक कर द्विगुण कुश तिल, और प्रदेशिनी (तर्जनी) के मूल पर रक्खे कुशों से गिरते हुए जलों से ॥ १६ ॥ दहिने कन्धे पर जनेऊ रक्खे हुये क्रम से तीन २ अंजली देता हुआ दिव्य पितरों का तर्पण करके अपने पिता, पितामह, प्रपितामह पितरों का तर्पण क्रम से करे ॥ १७ ॥
२० व्यासस्मृतिः ॥
मातृमातामहांस्तद्वत् त्रीनेवंस्त्रिभिस्त्रिभिः । मातामहस्ययेऽप्यन्ये गोत्रिणोदाहवर्जिताः ॥ १८ ॥ तानेकाञ्जलिदानेन तर्पयेच्चपृथक्पृथक् । असंस्कृतप्रमीताये प्रेतसंस्कारवर्जिताः ॥ १९ ॥ वस्त्रनिष्पीडिताम्भोभिस्तेषामाप्यायनंभवेत् । अतर्पितेषुपितृषु वस्त्रंनिष्पीडयेत्तुयः ॥ २० ॥ निराशाःपितरस्तस्य भवन्तिसुरमानुषैः । पयोदर्भस्वधाकार गोत्रनामतिलैर्भवेत् ॥ २१ ॥ सुदत्तंतत्पुनस्तेषामेकेनापिविनावृथा । अन्यचित्तेनयद्दत्तं यद्दत्तंविधिवर्जितम् ॥ २२ ॥ अनासनस्थितेनापि तज्जलंरुधिरायते । एवंसन्तर्पिताःकामैस्तर्पकांस्तर्पयन्तिच ॥ २३ ॥ ब्रह्मविष्णुशिवादित्यमित्रावरुणनामभिः ।
पितादि के तुल्य माता, पितामही, और प्रपितामही इन तीनों का तर्पण करके मातामह (नाना) प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह इन तीनों का भी इसी प्रकार तीन २ अञ्जुलियों से तर्पण करे—और नाना के गोत्र के अन्य जो लोग मर गये हों जिन का दाह कर्म नहीं हुआ हो ॥ १८ ॥ उन का भी एक २ अञ्जलि देकर पृथक् २ तर्पण करे और जो उपनयनादि संस्कार हुए विना ही मरे हैं तथा जिन का दशगात्रादि प्रेत संस्कार भी नहीं हुआ ॥१९॥ उन को वस्त्र (अंगोछा) निचोड़ने के जल से तृप्ति होजाती है। जो पुरुष पितरों के तर्पण से पहिले वस्त्र को निचोड़ता है ॥२०॥ उस के पितर; देवता और मनुष्यों सहित निराश हो जाते हैं। जल, कुश, स्वधा, गोत्र नाम और तिल इन सब के सहित जो तर्पण किया जाता है ॥ २१ ॥ वह जलदान उत्तम है। उन जलादि में से एक भी कोई वस्तु न हो तो किया हुआ तर्पण वृथा हो जाता है। अन्य विचार मन में रख कर वा विधिपूर्वक जो तर्पण नहीं किया ॥ २२ ॥ अथवा आसन पर बैठे विना जो जल दिया वह सब रुधिर के समान है। इस प्रकार तृप्त किये पितर तर्पण करने वालों की कामनाओं की पूर्ति से तृप्त करते हैं ॥२३॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आदित्य, मित्रावरुण, इन देवताओं
भाषार्थसहिता ॥ २९
पूजयेल्लक्षितैर्मन्त्रैर्जलैर्मन्त्रोक्तदेवताः ॥ २४ ॥ उपस्थायरविंकाष्ठां पूजयित्वाचदेवताः । ब्रह्माग्नीन्द्रौषधीजीवविष्णुवाङ् महतांतथा ॥ २५ ॥ अपांपतेतिसत्कारं नमस्कारैःस्वनामभिः । कृत्वामुखंसमालभ्य स्नानमेवंसमाचरेत् ॥ २६ ॥ ततःप्रविश्य भवनमावसथ्येहुताशने । पाकयज्ञांश्चतुरो विदध्याद्विधिवद्द्विजः ॥ २७ ॥ अनाहितावसथ्याग्निरादायान्नंघृतप्लुतम् । शाकलेनविधानेन जुहुयाल्लौकिकेऽनले ॥ २८ ॥ व्यस्ताभिर्व्याहृतीभिश्च समस्ताभिस्ततःपरम् । षड्भिर्देवकृतस्येति मन्त्रवद्भिर्यथाक्रमम् ॥ २९ ॥ प्राजापत्यंस्विष्टकृतं हुत्वैवं द्वादशाहुतीः । ओंकारपूर्वःस्वाहान्तस्त्यागःस्विष्टविधानतः ॥ ३० ॥
को उन २ के मन्त्रों द्वारा जल से अर्घ देवे ॥२४॥ सूर्य नारायण का उपस्थान करके और पूर्व दिशाओं को उन २ के इन्द्रादि देवताओं सहित नमस्कार करके ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, ओषधी, जीव, विष्णु, वाक्, महत्, ॥२५॥ अपांपति इन सब का ( अग्नयेनमः ) इत्यादि नाम मन्त्रों से पूजन करके (संवर्चसा०) मन्त्र से मुख का प्रक्षालन करके फिर मध्याह्न का स्नान करे ॥ २६ ॥ फिर घर में जाकर गृह्य अग्नि में ब्राह्मणादि द्विज विधिपूर्वक देव यज्ञादि चारो पाक यज्ञों को करें ॥ २७ ॥ विधिपूर्वक गृह्याग्नि का स्थापन जिस ने न किया हो वह पुरुष घी से सम्यक् प्लावित अन्न को लेकर शाकल्य संहिता में कहे विधान से लौकिक अग्नि में होम करे ॥ २८ ॥ १- ओं भूः स्वाहा । २- ओंभुवः स्वाहा । ३- ओंस्वः स्वाहा । इस प्रकार व्यस्त नाम पृथक् २ तीन व्याहृतियों से तथा- ओंभूर्भुवःस्वः स्वाहा । और ( देवकृतस्यैन० ) इत्यादि शाकल होम के छः मन्त्रों से छः आहुति करके ॥ २९ ॥ इसी प्रकार प्राजापत्य तथा एक स्विष्टकृत् ये सब बारह आहुति करे उक्त सब मन्त्रों के पूर्व ओंकार और अन्त में स्वाहा पद लगावे । त्याग वाक्य गृह्यसूत्रानुसार जानो ॥ ३० ॥
२२ व्यासस्मृतिः ॥
भुविदर्भान्समास्तीर्य बलिकर्मसमाचरेत् ।
विश्वेभ्योदेवेभ्यइति सर्वेभ्योभूतेभ्यएवच ॥ ३१ ॥
भूतानांपतयेचेति नमस्कारेणशास्त्रवित् ।
दद्याद्वलित्रयंचाग्रे पितृभ्यश्चस्वधानमः ॥ ३२ ॥
पात्रनिर्णेजनंवारि वायव्यांदिशि निःक्षिपेत् ।
उद्धृत्यषोडशग्रासमात्रमन्नंघृतोक्षितं ॥ ३३ ॥
इदमन्नंमनुष्येभ्योहन्तेत्युक्त्वासमुत्सृजेत् ।
गोत्रनामस्वधाकारैः पितृभ्यश्चापिशक्तितः ॥ ३४ ॥
षड्भ्योऽन्नमन्वहंदद्यात्पितृयज्ञविधानतः ।
वेदादीनांपठेत्किञ्चिदल्पंब्रह्ममवाप्तये ॥ ३५ ॥
ततोऽन्यदन्नमादाय निर्गत्यभवनाद्बहिः ।
काकेभ्यःश्वपचेभ्यश्च क्षिपेद्गोग्रासमेवच ॥ ३६ ॥
उपविश्यगृहद्वारि तिष्ठेद्यावन्मुहूर्तकम् ।
अप्रमुक्तोऽतिथिंलिप्सुर्भावशुद्धःप्रतीक्षकः ॥ ३७ ॥
पृथ्वी पर कुश बिछा कर बलि कर्म (भूतयज्ञ) करै (विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः) (सर्वेभ्योभूतेभ्योनमः) ॥ ३१ ॥ और (भूतानांपतयेनमः) इस प्रकार शास्त्र का जानने वाला पुरुष तीन बलि प्रथम दे कर (पितृभ्यःस्वधानमः) इस मन्त्र से पितरों के लिये एक बलि अपसव्य दक्षिणाभिमुख हो कर देवे ॥ ३२ ॥ वैश्वदेव सम्बन्धी अन्नपात्र के धोने का जल वायव्य दिशा में छोड़े फिर घृतसेचन किये सोलह ग्रास परिमित अन्न को निकाल कर ॥३३॥ इदमन्नं मनुष्येभ्योहन्त-यह कहकर मनुष्य यज्ञ कर देवे और अपने गोत्र का नाम तथा स्वधा कहकर यथा शक्ति पितरोंको भी देवे॥३४॥ पितृयज्ञ की विधि से छः (३ पितृपक्ष के ३ मातृपक्ष के) को नित्य अन्न देवे। फिर ब्रह्मयज्ञ की प्राप्ति के निमित्त कुछ वेद आदि का भाग पढ़ै ॥३५॥ फिर अन्य अन्न को ले घर से बाहर जाके काक कुत्ते चाण्डाल इन को भी देवे और गौओं को ग्रास भी देवे ॥३६॥ फिर घर के द्वार पर बैठ कर दो घड़ी ठहरे तथा स्वयं भोजन न करै और अतिथि की आकांक्षा करता हुआ मन से शुद्ध होकर अतिथि की बाट देखे ॥ ३७ ॥
पादधावनसम्मानाभ्यञ्जनादिभिरर्चितः ।
भाषार्थसहिता ॥ २३
आगतंदूरतःशान्तं भोक्तुकाममकिंचनम् ।
दृष्ट्वासम्मुखमभ्येत्य सत्कृत्यप्रश्रयार्चनैः ॥ ३८ ॥
पादधावनसम्मानाभ्यञ्जनादिभिरर्चितः ।
त्रिदिवंप्रापयेत्सद्यो यज्ञास्याभ्यधिकोऽतिथिः ॥ ३९ ॥
कालागतोऽतिथिर्हृष्ट्वेदपारोगृहागतः ।
द्वावेतौपूजितौस्वर्गं नयतोऽधस्त्वपूजितौ ॥ ४० ॥
विवाह्यस्नातकक्ष्माभृदाचार्यसुहृदृर्त्विजः ।
अर्ध्याभवन्तिधर्मेण प्रतिवर्षंगृहागताः ॥ ४१ ॥
गृहागतायसत्कृत्य श्रोत्रियाययथाविधि ।
भक्त्योपकल्पयेदेकं महाभागंविसर्जयेत् ॥ ४२ ॥
विसर्जयेदनुव्रज्य सुतृप्तञ्छ्रोत्रियातिथीन् ।
मित्रमातुलसंबन्धिभ्यान्यवान्सगुपागतान् ॥ ४३ ॥
भोजयेद्गृहिणोभिक्षां सत्कृतांभिक्षुकोऽर्हति ।
जो दूरसे आया हो, शान्तस्वभाव हो, निर्धन हो, ऐसे अभ्यागत ब्राह्मण या संन्यासी को देखकर सन्मुख जाके नम्रता और आदर पूर्वक स्तुति प्रार्थना से ॥ ३८ ॥ पग धोना, सम्मान, तैलमर्दनादि से पूजित हुआ अतिथि यज्ञ से भी अधिक स्वर्ग को प्राप्त कराता (पहुंचाना) है ॥ ३९ ॥ उचित समय पर आया अतिथि और वेद का तत्त्व जानने वाला अपने घर आये ये दोनों पूजे हों तो स्वर्ग में, और न पूजे हों तो नरक में ले जाते हैं ॥४०॥ जो अपने यहां विवाहा हो, ब्रह्मचर्य समाप्त करके हुआ स्नातक, राजा, आचार्य, मित्र, ऋत्विज्, ये छः अपने घर पर आवें तो प्रतिवर्ष अर्घ्य मधुपर्कादि विधि विहित धर्म से पूजने योग्य हैं ॥४१॥ अपने घर आये वेदपाठी का शास्त्रोक्त विधि से सत्कार करके श्रद्धा से अपने धनादि का एक बड़ा भाग (हिस्सा) देकर विदाकरे ॥४२॥ अच्छे आदर सत्कार से तृप्त किये वेदपाठी तथा अतिथियों के पीछे कुछ दूर चल कर विसर्जन करे। मित्र, मामा, सम्बन्धि, बांधव, ये लोग अपने घर पर आये हों तो ॥४३॥ उन को भी आदर से भोजन करावे और सत्कार से दी हुई गृहस्थी की भिक्षा को भिक्षुक भी अवश्य ग्रहण करे और जो गृहस्थी स्वादु अन्न को स्वयं खाता तथा अस्वादु अन्न अतिथि आदि को देता है वह