भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

२२ व्यासस्मृतिः ॥

भुविदर्भान्समास्तीर्य बलिकर्मसमाचरेत् ।
विश्वेभ्योदेवेभ्यइति सर्वेभ्योभूतेभ्यएवच ॥ ३१ ॥
भूतानांपतयेचेति नमस्कारेणशास्त्रवित् ।
दद्याद्वलित्रयंचाग्रे पितृभ्यश्चस्वधानमः ॥ ३२ ॥
पात्रनिर्णेजनंवारि वायव्यांदिशि निःक्षिपेत् ।
उद्धृत्यषोडशग्रासमात्रमन्नंघृतोक्षितं ॥ ३३ ॥
इदमन्नंमनुष्येभ्योहन्तेत्युक्त्वासमुत्सृजेत् ।
गोत्रनामस्वधाकारैः पितृभ्यश्चापिशक्तितः ॥ ३४ ॥
षड्भ्योऽन्नमन्वहंदद्यात्पितृयज्ञविधानतः ।
वेदादीनांपठेत्किञ्चिदल्पंब्रह्ममवाप्तये ॥ ३५ ॥
ततोऽन्यदन्नमादाय निर्गत्यभवनाद्बहिः ।
काकेभ्यःश्वपचेभ्यश्च क्षिपेद्गोग्रासमेवच ॥ ३६ ॥
उपविश्यगृहद्वारि तिष्ठेद्यावन्मुहूर्तकम् ।
अप्रमुक्तोऽतिथिंलिप्सुर्भावशुद्धःप्रतीक्षकः ॥ ३७ ॥


पृथ्वी पर कुश बिछा कर बलि कर्म (भूतयज्ञ) करै (विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः) (सर्वेभ्योभूतेभ्योनमः) ॥ ३१ ॥ और (भूतानांपतयेनमः) इस प्रकार शास्त्र का जानने वाला पुरुष तीन बलि प्रथम दे कर (पितृभ्यःस्वधानमः) इस मन्त्र से पितरों के लिये एक बलि अपसव्य दक्षिणाभिमुख हो कर देवे ॥ ३२ ॥ वैश्वदेव सम्बन्धी अन्नपात्र के धोने का जल वायव्य दिशा में छोड़े फिर घृतसेचन किये सोलह ग्रास परिमित अन्न को निकाल कर ॥३३॥ इदमन्नं मनुष्येभ्योहन्त-यह कहकर मनुष्य यज्ञ कर देवे और अपने गोत्र का नाम तथा स्वधा कहकर यथा शक्ति पितरोंको भी देवे॥३४॥ पितृयज्ञ की विधि से छः (३ पितृपक्ष के ३ मातृपक्ष के) को नित्य अन्न देवे। फिर ब्रह्मयज्ञ की प्राप्ति के निमित्त कुछ वेद आदि का भाग पढ़ै ॥३५॥ फिर अन्य अन्न को ले घर से बाहर जाके काक कुत्ते चाण्डाल इन को भी देवे और गौओं को ग्रास भी देवे ॥३६॥ फिर घर के द्वार पर बैठ कर दो घड़ी ठहरे तथा स्वयं भोजन न करै और अतिथि की आकांक्षा करता हुआ मन से शुद्ध होकर अतिथि की बाट देखे ॥ ३७ ॥