अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभःचार्यसंहिता ॥ ५
पठेत्तगुरोःसम्यक् कर्मतद्दिष्टमाचरेत् ॥ २५ ॥ ततोभिवाद्यस्थविरान् गुरुंचैवसमाश्रयेत् । स्वाध्यायार्थंतदापन्नः सर्वदाहितमाचरेत् ॥ २६ ॥ नापक्षिपोऽपिभाषेत नाव्रजेत्ताडितोऽपिवा । विद्वेषमथपैशुन्यं हिंसनंचार्कवीक्षणम् ॥ २७ ॥ तौर्य्यत्रिकानृतोन्मादपरिवादानलङ्क्रियाम् । अञ्जनोद्वर्त्तनादर्शस्रग्विालेपनयोषितः ॥ २८ ॥ वृथाटनमसन्तोषं ब्रह्मचारीविवर्जयेत् । ईषच्चलितमध्यान्हेऽनुज्ञातोगुरुणास्वयम् ॥ २९ ॥ अलोलुपश्चरेद्भैक्षं व्रतिपूत्तमवृत्तिषु । सद्योभिक्षान्नमादाय वित्तवत्तदुपस्पृशेत् ॥ ३० ॥ कृतमाध्यान्हिकोऽश्नीयादनुज्ञातोयथाविधि । नाद्यादेकान्नमुच्छिष्टं भुक्त्वाचाचामितामियात् ॥ ३१ ॥
आज्ञानुसार भली प्रकार करे ॥ २५ ॥ फिर वृद्धों को नमस्कार करके गुरु का आश्रय ले और वेद पढ़ने के लिये सावधानी से गुरु के हित का आचरण करे ॥ २६ ॥ निन्दा करने पर भी गुरु के सम्मुख न बोले और गुरु की ताड़ना से भी वहां से कहीं न जावे । वैर, पैशुन्य, (चुगलपन) हिंसा, सूर्य को बिना प्रयोजन देखना ॥ २७ ॥ तौर्य्यत्रिक (गाना, बजाना, नाचना) झूठ बोलना, उन्माद, निन्दा, भूषण पहरना, अंजन, उबटन, आदर्श ( शीशा ) का देखना पुष्प माला, चन्दन आदि सुगन्ध का लगाना और स्त्री का स्मरण, देखना, स्पर्श आदि ॥ २८ ॥ वृथा फिरना-असन्तोष नाम लोभलालच इन को ब्रह्मचारी वर्जन कर देवे और जब कुछ मध्यान्ह ढले उस समय गुरु की आज्ञा से आप ही ॥ २९ ॥ चंचलता को त्याग कर उत्तम आचरण वाले वेदाध्ययन जिन के होते और जो पञ्चमहायज्ञादि करते हों, ऐसे ब्राह्मणादि द्विजों के घरों से ब्रह्मचारी भिक्षा मांगे और शीघ्र भिक्षा के अन्न को लाकर लब्ध वस्तु के समान उस का संस्कार करे ॥ ३० ॥ फिर मध्यान्ह का कर्म करके गुरु की आज्ञा से विधि पूर्वक भोजन करे और एक घर का भिक्षा अन्न और उच्छिष्ट [ बचा हुआ ] इन को न खावे यदि खावे तो आचमन करे ॥३१॥