भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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४ व्यासस्मृति ॥

द्वादशेवैश्यजातिस्तु व्रतोपनयमर्हति ॥ १९ ॥ तस्यप्राप्तव्रतस्यायं कालःस्याद्विगुणाधिकः । वेदव्रतच्युतोव्रात्यः सव्रात्यस्तोममर्हति ॥ २० ॥ द्वेजन्मनीद्विजातीनां मातुःस्यात्प्रथमन्तयोः । द्वितीयंछन्दसांमातुर्ग्रहणाद्विधिवद्गुरोः ॥ २१ ॥ एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तोवान्यदोषतः । श्रुतिस्मृतिपुराणानां भवेदध्ययनक्षमः ॥ २२ ॥ उपनीतोगुरुकुले वसेन्द्रियसमाहितः । बिभृयाद्दण्डकौपीनोपवीताजिनमेखलाः ॥ २३ ॥ पुण्येन्हिगुर्वनुज्ञातः कृतमन्त्राहूतिक्रियः । स्मृत्वोङ्कारंचगायत्री मारभेद्वेदमादितः ॥ २४ ॥ शौचाचारविचारार्थं धर्मशास्त्रमपिद्विजः ।


वर्ष क्षत्रिय के और बारहवें वर्ष वैश्य के बालक व्रतोपनयन (जनेउ) के योग्य होते हैं ॥१९॥ इन के उपनयन संस्कार का जो समय है उनसे दूने से अधिक समय यदि बीत जाय और संस्कार न हो तो वे तीनों वर्ण के बालक वेद के व्रत से पतित "व्रात्य" हो जाते हैं तब वे व्रात्यस्तोम [प्रायश्चित्त] करने योग्य हो जाते हैं ॥ २० ॥ द्विजातियों के दो जन्म होते हैं, उन में पहिला माता से और दूसरा गुरु से वेदों की माता ( गायत्री ) के विधिपूर्वक ग्रहण करने से ॥ २१ ॥ ऐसे द्विजत्व को प्राप्त हुआ और अन्य दुराचारादि दोषों से निवृत्त होकर श्रुतिस्मृति पुराण इन के पढ़ने के योग्य होता है ॥२२॥ यज्ञोपवीत होने पर गुरु के कुल में सावधान होकर वसे और दण्ड, कौपीन, जनेऊ, मृगछाला, और मेखला (कंधनी) इन सब ब्रह्मचर्य के शास्त्रोक्त चिन्हों को धारण करे ॥२३॥ फिर पुण्य दिन शुभ मुहूर्त में गुरु की आज्ञा से मन्त्रों से समिदाधान कर तथा ओंकार और गायत्री का स्मरण करके आदि से अपने वेद का पढ़ना आरम्भ करे ॥ २४ ॥ द्विज ब्रह्मचारी शौच तथा आचार को सम्यक् जानने के लिये गुरु से धर्मशास्त्र को भी पढ़े और धर्मशास्त्र में कहे कर्म को गुरु की