अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थंसहिता ॥ ३
एषांसम्भाषणात्स्नानं दर्शनादर्कवीक्षणम् ॥ १२ ॥
गर्भाधानंपुंसवनं सीमन्तो जातकर्मच ।
नामक्रियानिष्क्रमणेऽन्नाशनंवपनक्रिया ॥ १३ ॥
कर्णवेधोव्रतादेशो वेदारम्भक्रियाविधिः ।
केशान्तःस्नानमुद्वाहो विवाहाग्निपरिग्रहः ॥ १४ ॥
त्रेताग्निसंग्रहश्चेति संस्काराःषोडशस्मृताः ।
नवैताःकर्णवेधान्ता मन्त्रवर्जंस्त्रियाःक्रियाः ॥ १५
विवाहोमन्त्रतस्तस्याः शूद्रस्याप्यमन्त्रोदश ।
गर्भाधानंप्रथमतस्तृतीयेमासिपुंसवः ॥ १६ ॥
सीमन्तश्चाष्टमेमासि जातेजातक्रियांवदेत् ।
एकादशेऽह्निनामाख्यंयथासभक्तिर्यथाकुलम् ॥ १७ ॥
षष्ठेमास्यन्नमश्नीयाच्चूडाकर्मकुलोचितम् ।
कृतचूडेचबालेच कर्णवेधोविधीयते ॥ १८ ॥
विप्रोगर्भाष्टमेवर्षे क्षत्रएकादशेतथा ।
का दर्शन करे ॥ १२ ॥ १-गर्भाधान, २-पुंसवन, ३-सीमन्त, ४-जातकर्म, ५-नामकरण, ६-निष्क्रमण, ७-अन्नप्राशन, ८-मुण्डन, ९-कर्णवेध, १०-यज्ञोपवीत, ११-वेदारम्भ, १२-केशान्त, १३-समावर्तन, १४-विवाह, १५-आवसथ्याग्निधान, १६-गार्हपत्य, आहवनीय, और दक्षिणाग्नि इन तीनों श्रौत अग्नियों का स्थापन, ये गर्भाधान आदि सोलह संस्कार कहाते हैं। कर्णवेध तक जो नौ संस्कार हैं वे स्त्री के बिना मन्त्र होते हैं ॥ १५ ॥ विवाह स्त्री का भी मन्त्रों से होता है और शूद्रों के ये इसी संस्कार बिना वेद मन्त्रों के होने चाहिये॥ गर्भाधान प्रथम (पहिले गर्भस्थापन के समय) होता, तीन मास का जब गर्भ हो तब पुंसवन संस्कार करे ॥ १६ ॥ आठवें महीने में सीमन्तोन्नयन संस्कार करे, सन्तान के पैदा हुए पर जात कर्म, ग्यारहवें दिन नामकरण, चौथे महीने अर्कैक्षा (निष्क्रमण) अर्थात् बाहर निकाल कर बालक को सूर्यनारायण का दर्शन करावे ॥ १७ ॥ छठे महीने अन्नप्राशन और मुण्डन कुल की रीति के अनुसार करे, जब बालक का मुण्डन हो चुके तब कर्णवेध कान छेदने का संस्कार करे ॥ १८ ॥ गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण के, ग्यारहवें