अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 431, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें६ व्यासस्मृति ॥
नान्यद्भिक्षितमादद्यादापन्नोद्रविणादिकम् । अनिन्द्यामन्त्रितःश्राद्धे पैत्रेऽद्याद्गुरुचोदितः ॥ ३२ ॥ एकान्नम्प्यविरोधे व्रतानांप्रथमाश्रमे । भुक्त्वागुरुमुपासीत कृत्वासन्द्युक्षणादिकम् ॥ ३३ ॥ समिधोऽग्नावादधीत ततःपरिचरेद्गुरुम् । शयीतगुर्व्वनुज्ञातः प्रह्वश्चप्रथमंकरीः ॥ ३४ ॥ एवमन्वहमभ्यासी ब्रह्मचारीव्रतेञ्चरेत् । हितोपवादःप्रियवाक् सत्यभूतार्थसाधकः ॥ ३५ ॥ नित्यमाराधयेदेनमासमाप्तौसुविस्तरम् । अनेनविधिनाधीतो वेदःस्याद्द्विजन्मनेत् ॥ ३६ ॥ शापानुग्रहसामर्थ्यमृषीणाञ्चभवेत्कुशाम् । पयोऽमृताभ्याम्मधुभिः साज्यैःप्रीणान्तदेवताः ॥ ३७ ॥ तस्मादहरहश्चैतमध्यापयेत्प्रयत्नतः ।
नियम बद्ध रहता हुआ ब्रह्मचारी व्यथा में भोजन से अन्य धनादि पदार्थ किसी के आदर या आदर पूर्वक देने पर भी न लेवे और अनिन्द्य (शुद्ध) पुरुष के निमन्त्रण देने पर भी पितरों के श्राद्ध में गुरु की आज्ञा होने पर भोजन करे ॥ ३२ ॥ यदि ब्रह्मचर्याश्रम के अन्य नियम व्रतों में बाधा न होती हो तो ब्रह्मचारी किसी एक गृहस्थ के भिक्षान्न को खाकर भी तथा सन्धुक्षण (अग्ने सुप्रवः) आदि कर्म करके गुरु की सेवा किया करे ॥ ३३ ॥ प्रतिदिन विधि पूर्वक समिदाधान कर्म करके गुरु की सेवा किया करे और प्रथम गुरु को नमस्कार करके गुरु की आज्ञा से शयन करे ॥ ३४ ॥ ऐसे प्रति दिन अभ्यास करता हुआ ब्रह्मचारी व्रतों को चरे और हित की बात बोले, प्यारी वाणी रक्खे और भली प्रकार गुरु के कार्य को साधे ॥ ३५ ॥ वेद के पढ़ने की समाप्ति तक नित्य गुरु की आराधना (सेवा) करे । इस विधि से पढ़ा हुआ वेद का मन्त्र द्विज को ऐसा करता है कि वह ॥३६॥ शाप और वरदान देने में समर्थ और ऋषियों के लोक में जाने योग्य हो जाता है। ब्रह्म-चारी ने विधि पूर्वक किये वेदाध्ययन सेः दूध, अमृत, मधु और आज्य (घी) इनसे तृप्त होने के तुल्य देवता प्रसन्न होते हैं ॥ ३७ ॥ जिससे अनध्यायों