अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाधर्मसंहिता ॥ ९
यदङ्गंतदनध्याये गुरोर्वचनमाचरन् ॥ ३८ ॥ व्यतिक्रमादसम्पर्णमनहंकृतिराचरेत् । परत्रेहचतद्ब्रह्म अनधीतमपिद्विजम् ॥ ३६ ॥ यस्तूपनयनादेतदा मृत्योर्व्रतमाचरेत् । सनैष्ठिकोब्रह्मचारी ब्रह्मसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ४० ॥ उपकुर्वाणकोयस्तु द्विजःषड्विंशवार्षिकः। केशान्तकर्मणान्तत्र यथोक्तचरितव्रतः ॥ ४१ ॥ समाप्यवेदान्वेदाँवा वेदंवाप्रसभंद्विजः । स्नायात्तगुर्वनुज्ञातः प्रहृत्तोदितदक्षिणः ॥ ४२ ॥ इति श्रीवेदव्यासीये धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥ एवंस्नातकतांप्राप्तो द्वितीयाश्रमकाङ्क्षया । प्रतीक्षेतविवाहार्थमनिन्द्यान्वयसम्भवाम् ॥ १ ॥
को छोड़ कर प्रतिदिन विधिपूर्वक वेद को पढ़े और गुरु की आज्ञा पालन करता हुआ वेद के जो अंग (व्याकरणा आदि) हैं उन्हें अनध्यायी में पढ़े। इस नियमों का व्यतिक्रम करने में वेदाध्ययन असम्पूर्ण (पूरा नहीं होता) रहता है इससे अहंकार को छोड़कर यही आचरण करे, वह वेद चाहे द्विज न पढ़े (अर्थात् बहुत कम पढ़े) तो भी गुरु सेवादि नियम को सम्यक् पूरा करने वाले ब्रह्मचारी को इस लोक और परलोक में सुख देता है ॥३८॥ जो यज्ञोपवीत संस्कार से लेकर मृत्यु पर्यन्त इस व्रत को करे वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी ब्रह्मसायुज्य मुक्ति को प्राप्त होता है ॥ ४० ॥ केशांत कर्म तक शास्त्र में कहे के अनुसार किये हैं व्रत जिसने ऐसा जो छब्बीस वर्ष का द्विज हो वह यदि गृहाश्रम करके अपना दा भिक्षादि देने द्वारा गरीबों का उपकार करना चाहता हो तो ॥४१॥ तीनों वेदों को वा दो वेदों को या एक वेद को शीघ्र समाप्त करके और गुरु की आज्ञा से गुरु की दक्षिणा देकर विधि पूर्वक समावर्त्तन संस्कार करे ॥ ४२ ॥
श्रीवेदव्यासीयधर्मशास्त्र के प्रथम अध्याय का यह अनुवाद पूरा हुआ ॥
द्वितीय गृहस्थ आश्रमकी इच्छा से ऐसे स्नातकरूप को प्राप्त हुआ द्विज शुद्ध वंश में पैदा हुई स्त्री को विवाह के लिये प्रतीक्षा (अन्वेषण) करे ॥ १ ॥