अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 434, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ९
भ्रूणहत्याश्चयावत्यः पतितःस्यात्तदप्रदः ॥ ७ ॥ तुभ्यंदास्याम्यहमिति ग्रहीष्यामीतिथस्तयोः । कृत्वासमयमन्योन्यं भजतेनसद्ण्डभाक् ॥ ८ ॥ त्यजन्नदुष्टांदण्ड्यःस्याद्दूषयंश्चाप्यदूषिताम् । ऊढायांहिसवर्णायामन्याँवाकाममुद्वहेत् ॥ ९ ॥ तस्यामुत्पादितःपुत्रो नसवर्णात्प्रहीयते । उद्वहेत्क्षत्रियांविप्रो वैश्यांचक्षत्रियोविशाम् ॥ १० ॥ नतुशूद्रांद्विजःकश्चिन्नाधमःपूर्ववर्णजाम् । नानावर्णासुभार्यासु सवर्णासहचारिणी ॥ ११ ॥ धर्म्याधर्मेषुधर्म्मिष्ठा ज्येष्ठामप्यस्वजातिषु । पाटितोऽयंद्विजाःपूर्वमेकंदेहःस्वयंभुवा ॥ १२ ॥
भ्रूणहत्याओं के पाप से कन्या का विवाह न करने वाला पतित होता है ॥७॥ मैं तुम को दूंगा और मैं उस को ग्रहण करूंगा ऐसे परस्पर समय की प्रतिज्ञा वर और दाता दोनों करके यदि उन दोनों में से जो अपनी प्रतिज्ञा को पूरी न करे वही राजदण्ड का भागी होता है ॥ ८ ॥ जो स्त्री दूषित न हो उसे जो त्यागे वह और जो निर्दोष कन्या को दूषण लगाये वे दोनों राजदण्ड के योग्य होते हैं। यदि अपने वर्ण की एक कन्या के साथ विवाह कर लिया हो तो दूसरे क्षत्रियादि वर्ण की अन्य स्त्री के साथ विशेष काम भोगेच्छा होने पर विवाह कर लेवे ॥ ९ ॥ उस अन्य वर्ण की स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है वह सवर्ण ही अर्थात् पिता के वर्ण का होता है । ब्राह्मण, क्षत्रिया और वैश्य कन्या के साथ विवाह करे और क्षत्रिय पुरुष वैश्य कन्या के साथ कर ले ॥ १० ॥ कोई भी द्विज, शूद्र कन्या के साथ विवाह न करे और नीच वर्ण का पुरुष अपने से उत्तम वर्ण की कन्या के साथ विवाह न करे । अनेक वर्ण की स्त्रियों से विवाह किया हो तो जो सवर्णा हो वही अग्निहोत्रादि धर्म कार्यों में सहचारिणी रहे ॥ ११ ॥ जिस पुरुष ने कई सवर्णा स्त्रियों से विवाह किया हो तो अग्निहोत्रादि धर्म के कामों में जो अधिक श्रद्धावती हो वही धर्मानुकूल बड़ी होने से सहचारिणी होनी चाहिये। हे द्विजो ! स्त्री पुरुष मिल के यह एक ही देह पहिले था जिस को ब्रह्मा जी ने स्त्री पुरुष रूप दो भाग किया है ॥ १२ ॥
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