भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 805 में से

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१० व्यासस्मृतिः ॥

पतयोर्द्धेनचार्द्धेन पत्न्योऽभूवन्नितिश्श्रुतिः । यावन्नविन्दतेजायां तावदर्द्धोभवेत्पुमान् ॥ १३ ॥ नार्द्धंप्रजायतेसर्वं प्रजायेतेत्यपिश्रुतिः । गुर्वीसाभूस्त्रिवर्गस्य वोढुंनान्येनशक्यते ॥ १४ ॥ यतस्ततोन्वहंभृत्यास्ववशोविभृयाञ्चताम् । कृतदारोऽग्निपत्नीभ्यां कृतवेश्मागृहंवसेत् ॥ १५ ॥ स्वकृतंवित्तमासाद्य वैतानाग्नीन्नहापयेत् । स्मार्तवैवाहिकेवह्नौ श्रौतंर्वैतानिकाग्निषु ॥ १६ ॥ कर्मकुर्यात्प्रतिदिनं निविद्यन्प्रीतिपूर्व्वतः । सम्यग्धर्मार्थकामेषु दम्पतिभ्यामहर्निशम् ॥ १७ ॥ एकचित्ततयाभाव्यं समानव्रतवृत्तितः । नपृथग्विद्यतेस्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम् ॥ १८ ॥ भावनोह्यनिर्देशाद्वा वृत्तिशास्त्रविधिःपरः ।


आधे देह से पति और आधे से स्त्री हुई है यह श्रुतिमें लिखा है। इसलिये जब तक पुरुष स्त्री को न विआहे तब तक आधा ही रहता है इसी कारण पत्नी अर्द्धाङ्गिनी कहाती है ॥ १३॥ वेद में लिखा है कि पुरुष को सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिये। और बिना पत्नी के आधा शरीर पुत्रोत्पत्ति कर नहीं सकता इस से सन्तान के साथ विवाह करना आवश्यक है। वह स्त्री, धर्म, अर्थ, और काम की बड़ी भारी भूमि (पैदा करने वाली) है। उस त्रिवर्ग की प्राप्ति पत्नी के बिना अन्य साधन से नहीं हो सकती ॥१४॥ जहां तहां के व्यभिचारादि से बच कर अपने शरीरेन्द्रियों को वशी भूत रखता हुआ गृहस्थ पुरुष उस स्त्री का भरण पोषण करे ; विवाह करके अग्नि और पत्नी के सहित पुरुष घर को बना कर उस में बसे ॥ १५॥ अपने परिश्रम से पैदा किये धन को प्राप्त हो कर विधि से स्थापित किये श्रौत अग्नियों को न त्यागे । स्मृति में कहे कर्मों को विवाह सम्बन्धी गृह्य अग्नि में और श्रौत-कर्मों को श्रौत अग्नियों में किया करे ॥१६॥ प्रतिदिन विधि और प्रीति पूर्वक उक्त कर्मा को करे-स्त्री पुरुषों को धर्म, अर्थ, कामों में रात दिन भलीप्रकार ॥१७॥ एक मन, एक व्रत, एकवृत्ति से रहना चाहिये स्त्रियों को धर्म अर्थ काम को प्राप्त करने का पति से पृथक् कोई साधन नहीं है॥१८॥ भाव (पति के अभिप्राय)

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