भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 805 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 436

भाषार्थसहिता ॥ ११

पत्युःपूर्वंसमुत्थाय देहशुद्धिंविधायच ॥ १९ ॥
उत्थायशयनाद्यानि कृत्वावेश्मविशोधनम् ।
मार्जनैर्लेपनैःप्राप्य साग्निशालांस्वमङ्गणम् ॥ २० ॥
शोधयेदग्निकार्याणि स्निग्धान्युष्णेनवारिणा ।
प्रोक्षणैर्यैरितितान्येव यथास्थानंप्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
द्वन्द्वपात्राणिसर्वाणि न कदाचिद्वियोजयेत् ।
शोधयित्वातुपात्राणि पूरयित्वातुधारयेत् ॥ २२ ॥
महानसस्यपात्राणि बांहिःप्रक्षाल्यसर्वथा ।
मृद्भिश्चशोधयेच्चुल्लीं तत्राग्निंविन्यसेत्ततः ॥ २३ ॥
स्मृत्वानियोगपात्राणि रसांश्चद्रविधानिच ।
कृतपूर्वाह्नकार्याच श्वशुरानभिवादयेत् ॥ २४ ॥
ताभ्यांभर्तृपितृभ्यांचा भ्रातृमातुलबान्धवैः ।


भ या उसकी आज्ञा से स्त्री धर्मादि को जाने तथा करे यही शास्त्र की उत्तम विधि है। स्त्री पति से पहले उठ कर और देह की शुद्धि करके ॥ १९ ॥ शय्या आदि को उठाकर और झाडू आदि से घर का शोधन (सफाई) करके मार्जन (बुहारने) और लीपने से अग्नि की शाला और अपने आंगन को ॥ २० ॥ शुद्ध करे और अग्नि के कार्य जिनसे होमादि होते हों ऐसे (यज्ञ पात्र आदि) जो चिकने हों उनको (प्रोक्षणैर्यै०) इस मन्त्र से गर्म जल से शुद्ध करे, फिर उन्हें जहां के तहां रख दे ॥२१॥ शूर्प-अग्निहोत्र हवणी, स्रुक्, स्रुव, उलूखल-मुसल, दृषत् उपला इत्यादि एक साथ काम आने वाले जो दो २ पात्र हैं उनको कदापि पृथक् २ न रक्खे। फिर पात्रों को शुद्ध करके और जल आदि से भर कर रक्खे ॥ २२ ॥ चौके से बाहर महानस (रसोई) के सब पात्र धोकर पीली मिट्टी से चूल्हे को पोत कर उस में अग्नि को स्थापित कर देवे ॥२३॥ बरतने के पात्रों को और रसों तथा द्रव्यों को स्मरण (याद) करके कि किस २ धातु आदि के पात्र में कौन २ रसादि रखना है ऐसा स्मरण करके उन २ पात्रों में वह २ रसादि धर देवे। पूर्वाह्न (दुपहर से पहिले) के काम करके अपने गुरु (पति) की अभिवादन करे ॥ २४ ॥ अपने माता, पिता, वा पति के माता पिता अपने सासु ससुर ने तथा भाई,