भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 437, कुल 805 में से

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१२ व्यासस्मृतिः ॥

वस्त्रालङ्काररत्नानि प्रदत्तान्येवधारयेत् ॥ २५ ॥ मनोवाक्कर्मभिःशुद्धा पतिदेशानुवर्तिनी । छायेवानुगतास्वच्छा सखीवहितकर्मसु ॥ २६ ॥ दासीवादिष्टकार्येषु भार्याभर्तुःसदाभवेत् । ततोऽन्नसाधनंकृत्वा पतयेविनिवेदयेत् ॥ २७ ॥ वैश्वदेवकृतैरन्नैर्भोजनीयांश्चभोजयेत् । पतिंचैवाभ्यनुज्ञाता सिद्धमन्नादिनात्मना ॥ २८ ॥ भुक्त्वानयेदहः शेषमायव्ययविचिन्तया । पुनःसायंपुनःप्रातर्गृहशुद्धिंविधायच ॥ २९ ॥ कृतान्नसाधनासाध्वी सुभृशंभोजयेत्पतिम् । नातितृप्त्यास्वयंभुक्त्वा गृहनीतिंविधायच ॥३०॥ आस्तीर्यसाधुशयनं ततःपरिचरेत्पतिम् । सुप्तेपत्यौतदभ्याशे स्वपेत्तद्गतमानसा ॥३१॥


माता, बांधव, इन के ही दिये वस्त्र और आभूषणों को धारण करै ॥ २५ ॥ मन, वाणी कर्म से शुद्ध, पति की आज्ञा में चलने वाली छाया के समान पति की अनुगासिनी और स्वच्छ हुई सखी के समान पति का हित करै ॥२६॥ पति के कहे कार्यों में पत्नी सदैव दासी के समान रहे फिर अन्न का उत्तम स्वादिष्ट पाक बना कर पति को निवेदन करके ॥ २७ ॥ किया है वैश्वदेव [ अर्थात्-देवयज्ञ, भूतयज्ञ, पितृयज्ञ ] जिस्में ऐसे अन्न से जिमाने के योग्य [ अतिथि आदि ] को और पति को जिमावे और पति की आज्ञा लेकर शेष [ बचे ] अन्न को आप खावे तथा भोजन करने पश्चात् शेष दिन को आय ( आमदनी ) व्यय ( खर्च ) की चिन्ता से वितावे । इसी प्रकार नित्य २ सायं प्रातःकाल घर की शुद्धि करके ॥ २८ ॥ साध्वी स्त्री नित्य २ प्रीतिपूर्वक उत्तम स्वादिष्ट पाक बनाकर बड़ी प्रीति से अपने पति को जिमावे और अत्यन्त तृप्ति जिस में नही उतना भोजन स्वयं करके और घरका उत्तम प्रबन्ध करके ॥३०॥ अच्छी सेज बिछाकर पति की सेवा करे । जब पति सो जांय तब पति में है मन जिसका ऐसी स्त्री उन के समीप में सो जावे ॥३१॥

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