अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 438, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्य्यसंहिता ॥ १३
अनग्नाचापमत्ताच निष्कामाचजितेन्द्रिया । नोच्चैर्वदेन्नपरुषं नबहून्पत्युरप्रियम् ॥ ३२ ॥ नकेनचिद्विवदेच्च अप्रलापविलापिनी । नचातिव्ययशीलास्याद्धर्म्मार्थविरोधिनो ॥३३॥ प्रमादोन्मादरोषेष्र्या वञ्चनं चातिमानिताम् । पैशुन्यहिंसाविद्वेषमहाहङ्कारधूर्त्तता ॥३४॥ नास्तिक्यंसाहसंस्तेयं दम्भान्त्साध्वीविवर्जयेत् । एवंपरिचरन्तीसा पतिंपरमदैवतम् ॥३५॥ यशःशर्म्मैहयात्येव परत्रचसलोकताम् । योषितांनित्यकर्मोक्तं नैमित्तिकमथोच्यते ॥३६॥ रजोदर्शनतोदोषान् सर्वमेवपरित्यजेत् । सर्वैरलक्षिताशीघ्रं लज्जितान्तर्गृ हेवसेत् ॥ ३७ ॥
नंगी न रहै, प्रमत्त ( बेहोश ) न रहै, निष्काम और जितेन्द्रिय रहै, ऊंचे स्वर से चिल्ला कर न बोले और कठोर न बोले, बहुत व्यर्थ न बोले मितभाषिणी हो, पति को प्यारे न हों ऐसे वचन कदापि न बोले ॥ ३२ ॥ किसी के संग विवाद वा लड़ाई न करै, अनर्थक वृथा न बोले, किसी गुजरे दुःख का विलाप न करै, बहुत खर्च करने का स्वभाव न रक्खे, धर्म और अर्थ का विरोध न करै ॥ ३३ ॥ असावधानी, उन्माद, क्रोध, ईर्ष्या, ठगना, ( छल फरेब ) अत्यन्त मान चाहना, चुगलपन, हिंसा, बैर, बड़ा अहंकार, धूर्त्तपन ॥ ३४ ॥ नास्तिकपना, साहस (शीघ्रता में बिना विचारे चाहे जो कर बैठना) चोरी, दम्भ, इन सब को साध्वी स्त्री छोड़ देवे, ऐसे परम देवता रूप पति की सेवा करती यह स्त्री ॥ ३५ ॥ इस लोक में यश और सुख को और परलोक में पति के लोक को अवश्य प्राप्त होती है। यह स्त्री का नित्य कर्त्तव्य धर्म कहा अब इस के आगे नैमित्तिक ( जो किसी निमित्त से हो ) कर्म कहते हैं ॥ ३६ ॥ रजोदर्शन होने पर दोष (अपराध लगने) के भय से सब कामों को त्याग देवे। जहां किसी की न दीखे वहां शीघ्र ही जाकर घर के भीतर लज्जित हुई वसै ॥ ३७ ॥