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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

भाषार्य्यसंहिता ॥ १३

अनग्नाचापमत्ताच निष्कामाचजितेन्द्रिया । नोच्चैर्वदेन्नपरुषं नबहून्पत्युरप्रियम् ॥ ३२ ॥ नकेनचिद्विवदेच्च अप्रलापविलापिनी । नचातिव्ययशीलास्याद्धर्म्मार्थविरोधिनो ॥३३॥ प्रमादोन्मादरोषेष्र्या वञ्चनं चातिमानिताम् । पैशुन्यहिंसाविद्वेषमहाहङ्कारधूर्त्तता ॥३४॥ नास्तिक्यंसाहसंस्तेयं दम्भान्त्साध्वीविवर्जयेत् । एवंपरिचरन्तीसा पतिंपरमदैवतम् ॥३५॥ यशःशर्म्मैहयात्येव परत्रचसलोकताम् । योषितांनित्यकर्मोक्तं नैमित्तिकमथोच्यते ॥३६॥ रजोदर्शनतोदोषान् सर्वमेवपरित्यजेत् । सर्वैरलक्षिताशीघ्रं लज्जितान्तर्गृ हेवसेत् ॥ ३७ ॥

नंगी न रहै, प्रमत्त ( बेहोश ) न रहै, निष्काम और जितेन्द्रिय रहै, ऊंचे स्वर से चिल्ला कर न बोले और कठोर न बोले, बहुत व्यर्थ न बोले मितभाषिणी हो, पति को प्यारे न हों ऐसे वचन कदापि न बोले ॥ ३२ ॥ किसी के संग विवाद वा लड़ाई न करै, अनर्थक वृथा न बोले, किसी गुजरे दुःख का विलाप न करै, बहुत खर्च करने का स्वभाव न रक्खे, धर्म और अर्थ का विरोध न करै ॥ ३३ ॥ असावधानी, उन्माद, क्रोध, ईर्ष्या, ठगना, ( छल फरेब ) अत्यन्त मान चाहना, चुगलपन, हिंसा, बैर, बड़ा अहंकार, धूर्त्तपन ॥ ३४ ॥ नास्तिकपना, साहस (शीघ्रता में बिना विचारे चाहे जो कर बैठना) चोरी, दम्भ, इन सब को साध्वी स्त्री छोड़ देवे, ऐसे परम देवता रूप पति की सेवा करती यह स्त्री ॥ ३५ ॥ इस लोक में यश और सुख को और परलोक में पति के लोक को अवश्य प्राप्त होती है। यह स्त्री का नित्य कर्त्तव्य धर्म कहा अब इस के आगे नैमित्तिक ( जो किसी निमित्त से हो ) कर्म कहते हैं ॥ ३६ ॥ रजोदर्शन होने पर दोष (अपराध लगने) के भय से सब कामों को त्याग देवे। जहां किसी की न दीखे वहां शीघ्र ही जाकर घर के भीतर लज्जित हुई वसै ॥ ३७ ॥

१४ व्यासस्मृतिः ॥

एकाम्बरावृतादीना स्नानालङ्कारवर्जिता ।
मौनिन्यधोमुखीचक्षः पाणिपद्भिरञ्चला ॥ ३८ ॥
अश्नीयात्केवलं भक्तं नक्तंमृन्मयभाजने ।
स्वपेद्भुमावप्रमत्ता क्षपेदेवमहस्त्रयम् ॥ ३९ ॥
स्नायात्तच्चत्रिरात्रान्ते सचैलमुदितेरवौ ।
विलोक्यभर्तुर्वदनं शुद्धाभवतिधर्मतः ॥ ४० ॥
कृतशौचापुनःकर्म पूर्ववच्चसमाचरेत् ।
रजोदर्शनतोयाःस्यु रात्रयःषोडशर्तवः ॥ ४१ ॥
तत्रपुंबीजमक्लिष्टं शुद्धेक्षेत्रेप्ररोहति ।
चतस्रश्चादिमारात्रीः पर्व्ववर्जञ्चविवर्जयेत् ॥ ४२ ॥
गच्छेद्युग्मासुरात्रीषु पौष्णापित्रर्क्षराक्षसान् ।
प्रच्छादिनादित्यपथे पुमान्गच्छेदृतुंव्यापितः ॥ ४३ ॥
क्षमालङ्कृदवाप्नोति पुत्रंपूजितलक्षणम् ।


एकधोती वस्त्र धारण किये दीनदशा रखती हुई; स्नान और आभूषण से वर्जित, मौन हुई; नीचे को मुख किये, हाथ पग इन को विशेष न चलावे ॥३८॥ रात्रि के समय मिट्टी के पात्र में एक वार साम्भी भात खावे । प्रमाद छोड़ सावधान हुई पृथिवी पर चटाई डाल कर सोवे ऐसे तीन दिन वितावे ॥ ३९ ॥ तीन दिन पूरे होने पर चौथे दिन प्रातःकाल सूर्य के उदय हो जाने पर पहिने हुये वस्त्रों सहित स्नान कर फिर शुद्ध वस्त्र पहिन कर अपने पति के मुख को देख के धर्म से शुद्ध होती है ॥४०॥ किया है शौच जिसने वह स्त्री फिर पहिले के समान कामों को करै—रजोदर्शन से लेकर ऋतुकाल की जो सोलह रात्रि होती हैं ॥ ४१ ॥ उन रात्रियों में पुरुषका नीरोग बीज शुद्ध क्षेत्र में जमता है । चार पहिली रात्रियों को और अमावास्या अष्टमी पौर्णमासी चतुर्दशी ये पर्व्व तिथि सोलह में आजावें तो उन को भी छोड़ देवे ॥ ४२ ॥ शेष बची रात्रियों में से ६ । ८ । १० । १२ । १४ । १६ इन समरात्रियों में यदि रेवती-मघा आश्लेषा इन में से कोई नक्षत्र हो तो उस दिन सूर्य के अस्त हो जाने पर रात्रि में पुरुष अपनी स्त्री के पास जावे ॥४३॥ क्षमा से शोभायमान वह पुरुष

भाषाधर्मसंहिता ॥ १५

ऋतुकालेऽभिगम्यैवं ब्रह्मचर्य्यव्यवस्थितः ॥ ४४ ॥
गच्छन्नपियथाकामं नदुष्टःस्यादनन्यकृत् ।
भ्रूणहत्यामवाप्नोति ऋतौभार्य्यापराङ्मुखः ॥ ४५ ॥
सोत्त्वाप्यान्यतोगर्भं त्याज्याभवतिपापिनी ।
महापातकदुष्टाच पतिगर्भविनाशिनी ॥४६॥
सद्वृत्तचारिणींपत्नीं त्यक्त्वापततिधर्मतः ।
महापातकदुष्टोऽपि नाप्रतीक्ष्यस्तयापतिः ॥४७॥
अशुद्धेःक्षयमादूरं स्थितायामनुचिन्तया ।
व्यभिचारेणदुष्टानां पत्नीनांदर्शनादृते ॥४८॥
धिक्कृतायामवाच्यायामन्यत्रवासयेत्पतिः ।
पुनस्तामार्त्तवस्नानां पूर्ववद्व्यवहारयेत् ॥४९॥
धूर्त्तांचधर्मकामघ्नी मपुत्रांदीर्घगेगिणीम् ।


प्रशंसा के योग्य हैं सन्नरा जिस के ऐसे पुत्र को प्राप्त होता है । ऋतु के समय उक्त प्रकार स्त्री का संग करके अन्य समय पुरुष ब्रह्मचारी रहे ॥ ४४ ॥ ऋतु से भिन्न काल में भी यथेच्छ गमन करता हुआ पुरुष दूषित नहीं होता यदि अन्य निन्दित कर्म आदि न करे । जो ऋतुकाल में स्त्री का संग नहीं करता वह भ्रूणहत्या का दोष भागी होता है ॥ ४५ ॥ यदि वह स्त्री किसी अन्य पुरुष से गर्भवती हो जाय तो उस पापिनी का त्याग कर देवे । और पति के गर्भ का नाश करने वाली तथा ब्रह्महत्यादि महापातकों से दूषित हो तो भी उस का त्याग करना चाहिये ॥ ४६ ॥ अच्छे आचरण करने वाली पत्नी को त्याग कर पुरुष धर्म से पतित होता है। और पति महापातक से दूषित हो तो शुद्धि तक वह स्त्री प्रतीक्षा करे (बाट देखे) ॥ ४७ ॥ महापातकी पति की शुद्धि पर्यन्त व्यभिचारी स्त्री दुष्ट पति उन के दर्शन को छोड़ कर थोड़ी दूर स्थान में चिन्ता से ठहरी पत्नी हो तब प्रतीक्षा करे ॥४८॥ और जिसे धिक्कार दी हो वा जिस के संग बोलना छोड़ दिया हो उसे दूसरे स्थान में बसा दे फिर जब वह ऋतु स्नान कर ले तब पूर्व के समान उस के संग बर्ताव करे ॥ ४९ ॥ जो स्त्री धूर्त हो, जो धर्म और काम को नष्ट करे,

१६ व्यासस्मृतिः॥

सुदुष्टांव्यसनासक्तमहितामधिवासयेत् ॥५०॥
अधिविन्नामपिप्रभुः स्त्रीणांतुसमतामियात् ।
विवर्णादीनवदना देहसंस्कारवर्जिता ॥५१॥
पतिव्रतानिराहारा शोष्यतेप्रोषितेपतौ ।
मृतंभर्त्तारमादाय ब्राह्मणीवन्हिमाविशेत् ॥५२॥
जीवन्तीचेत्त्यक्तकेशा तपसाशोधयेद्वपुः ।
सर्वावस्थासुनारीणां नयुक्तंस्यादरक्षणम् ॥५३॥
तदेवानुक्रमात्कार्यं पितृभर्तृसुतादिभिः ।
जाताःसुरक्षितावाये पुत्रपौत्रप्रपौत्रकाः ॥५४॥
येयजन्तिपितॄन्यज्ञैर्मोक्षप्राप्तिमहोदयैः ।

जिस के कोई पुत्र न हो, जिस को असाध्य दीर्घ रोग हो, जो अत्यन्त दुष्ट हो, जिसे कुछ व्यसन (मदिरा पीना आदि) लगा हो और जो पति का हित न चाहती वा करती हो इन ऐसी स्त्रियों का अधिवासन करे अर्थात् इन के विद्यमान होते भी द्वितीय विवाह कर लेवे ॥५०॥ जिस के होते दूसरा विवाह किया है पति को अन्य स्त्रियों के समान ही उस अधिविन्ना स्त्री का आदर वस्त्राभूषणादि से करना चाहिये । पति के परदेश जाने पर जो स्त्री मलिन वर्ण, दीन मुख, देह के संस्कार उबटना तैल मर्दन आदि को न करती हुई ॥५१॥ पति में व्रत रक्खे, अन्य पुरुष का मन में भी ध्यान न करे, अति सूक्ष्म आहार करे, देह को कृश निर्बल कर दे ऐसी ब्राह्मणी आदि पतिव्रता कहाती है, वह मरे हुए पति को लेकर अग्नि में प्रवेश करे (सती होजाय) ॥ ५२ ॥ यदि जीवित रहे तो केशों को मुंडा अपने तप से शरीर को शुद्ध करे स्त्रियों की सब अवस्था (बालक से वृद्ध तक) ओं में पुरुषों को रक्षा करनी उचित है ॥ ५३ ॥ सो बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्रादि लोग अपनी पुत्री, पत्नी और मातादि की क्रम से रक्षा करें। जो सन्तान अपने घर में उत्पन्न हुए वा गोद लेकर जिन का पालन पोषण किया ऐसे जो पुत्र पौत्र और प्रपौत्र कहाने वाले लोग ॥ ५४ ॥ मोक्ष देने वाले तथा महान् फलोदय वाले बड़े २ अग्निहोत्रादि यज्ञों से अपने पितरों को पूजते हैं वे लोग जब मरें तो उन का स्थापित किये अग्निहोत्र के

भाषासंहिता ॥ १९

मृतान्तानग्निहोत्रेण दाहयेद्विधिपूर्वकम् । दाहयेदविलम्बेन भार्याञ्चात्रव्रजेत्तसा ॥ ५५ ॥ इति श्रीवेदव्यासीये धर्म्मशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ नित्यंनैमित्तिकंकाम्यमितिकर्म्मत्रिधामतम् । त्रिविधंतच्चवक्ष्यामि गृहस्थस्यावधार्यताम् ॥ १ ॥ यामिन्याःपश्चिमेयामे त्यक्तनिद्रोहरिंस्मरेत् । आलोक्यमङ्गलद्रव्यं कर्म्मावश्यकमाचरेत् ॥ २ ॥ कृतशौचोनिषेव्याग्नीन्दन्तान्प्रक्षाल्यवारिणा । स्नात्वापास्यद्विजःसन्ध्यां देवादींश्चैवतर्पयेत् ॥३॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणि इतिहासानिचाभ्यसेत् । अध्यापयेन्नसच्छिष्यान् सद्दिप्रांश्चद्विजोत्तमः ॥ ४ ॥ अलब्धंप्रापयेल्लब्ध्वा क्षणमात्रंसमापयेत् ।


अग्नि में विधिपूर्वक दाह करे और ऐसे लोगों की पत्नी पहिले मरे तो उसका भी उसी अग्निहोत्र के अग्नि से दाह करे तो वह भी स्वर्ग में जाती है ॥५५॥

श्रीवेदव्यासीय धर्मशास्त्र के द्वितीय अध्याय का अनुवाद समाप्त हुआ ॥

गृहस्थ पुरुष का नित्य नैमित्तिक काम्य यह तीन प्रकार का कर्म शास्त्र में कहा है वह तीनों प्रकार का कर्म हम कहते हैं तुम लोग सुनो ॥१॥ ब्राह्मणादि द्विज पुरुष रात्रि के पिछले चौथे पहर में उठकर विष्णु का स्मरण करे [ हरि का ग्रहण उपलक्षणार्थ है तिस से शम्भु आदि अन्य देवों का भी स्मरण जानो ] फिर मङ्गल द्रव्य (गौ आदि) को देखकर शौचादि आवश्यक काम को करे ॥२॥ मल मूत्र त्यागादि शौच, अग्नि की सेवा, जल से दांतों का धोना, और स्नान करने पश्चात् संध्या करके देव ऋषि और पितरों का तर्पण करें ॥ ३ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण वेद, वेदाङ्ग, छः शास्त्र और इतिहासों का अभ्यास किया करे । अच्छे शिष्य और उत्तम ब्राह्मणों को वेदादि पढ़ाया करे ॥ ४ ॥

अप्राप्त ( जो अपने यहां न हो ) वस्तु की प्राप्ति का उपाय करै और उस वस्तु को पाकर कुछ थोड़े काल ठहर जावे फिर अन्य अप्राप्त की प्राप्ति का उपाय करे । विद्यादि गुणों में समर्थ होकर किसी धनादि से समर्थ राजा रईसादि के यहां अपने गुण को अप्रकट करके न बसे । किन्तु

१८ व्यासस्मृतिः ॥

समर्थोऽहिसमर्थेन नाविज्ञातःक्वचिद्वसेत् ॥ ५ ॥ सरित्सरःसुवापीषु गर्तप्रस्रवणादिषु । स्नायीतयावदुद्धृत्य पञ्चपिण्डानिवारिणा ॥ ६ ॥ तीर्थाभावेप्यशक्तोवा स्नायात्तोयैःसमाहृतैः । गृहाङ्गनगतस्तत्र यावदम्बरपीडनम् ॥ ७ ॥ स्नानमब्दैवतैःकुर्यात् पावनैश्चापि मार्जनम् । मन्त्रैःप्राणांस्त्रिरायम्य सौरैश्चार्कंविलोकयेत् ॥ ८ ॥ तिष्ठन्स्थित्वातुगायत्रीं ततःस्वाध्यायमारभेत् । ऋचांचयजुषांसाम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ॥ ६ ॥ इतिहासपुराणानां वेदोपनिषदांद्विजः । शक्त्यासम्यक्पठेन्नित्यमल्पमप्यासमापनात् ॥ १० ॥ सयज्ञदानतपसामखिलंफलमाप्नुयात् ।


अपने गुण को जता कर वहां से आदर प्राप्त करे ॥ ५ ॥ नदी, छोटा तालाब, बावड़ी, कुण्ड, झरने इन में से किसी में तब स्नान करे जब पहिले पांच पिण्ड मिट्टी को बाहर निकाल देवे॥६॥ कोई घाट नदी आदि में नहीं वा घाट तक जाने का सामर्थ्य न हो तो नदी आदि से जल मंगाकर वा कुए से जल को भर कर घर के आंगन में जितने जल से पहिना वस्त्र (धोती) भींग जाय उतने जल से स्नान करे ॥७॥ जल है देवता जिनका ऐसे वेद मन्त्रों से स्नान करे और (चित्पतिर्मापुनातु?) इत्यादि पावन मन्त्रों से मार्जन करे और व्याहृत्यादि मन्त्रों से तीन प्राणायाम करके सूर्य देवता वाले मन्त्रों से खड़ा हुआ सूर्य को देखे अर्थात् सूर्य नारायण को देखता हुआ उपस्थान करे॥८॥ फिर खड़ा होकर गायत्री का जप करके ब्रह्मयज्ञ की विधि से वेद का अभ्यास करे ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ॥९॥ इतिहास, पुराण, वेदों के उपनिषद् इनका थोड़ा भी भाग उन २ की समाप्ति होने तक अपनी शक्ति के अनुसार जो द्विज भली प्रकार पढ़े ( यही स्वाध्याय नामक ब्रह्मयज्ञ कहाता है ) ॥ १० ॥ वह यज्ञ, दान, और तप के सम्पूर्ण फल को प्राप्त होता है तिस से ब्राह्मणादि द्विज पुरुष प्रतिदिन वाणी को वश में रख कर अर्थात् बीच में अन्य कुछ भी

प्रथमंकृतस्वाध्यायस्तर्पयेच्चाथदेवताः ॥ १२ ॥

भाषार्थसहिता ॥ १९

तस्मादहरहर्वेदं द्विजोऽधीयीतवाग्यतः ॥ ११ ॥
धर्मशास्त्रेतिहासादि सर्वेषांशक्तितःपठेत् ।
प्रथमंकृतस्वाध्यायस्तर्पयेच्चाथदेवताः ॥ १२ ॥
जान्वाच्यदक्षिणंदर्भैः प्रागग्रैःसयवैस्तिलैः ।
एकैकाञ्जलिदानेन प्रकृतिस्थोपवीतकः ॥ १३ ॥
समजानुद्वयोब्रह्म सूत्रहारउदङ्मुखः ।
तिर्यग्दर्भैश्चवामाग्रैर्यवैस्तिलविमिश्रितैः ॥ १४ ॥
अम्भोभिरुत्तरक्षिप्तैः कनिष्ठामूलनिर्गतैः ।
द्वाभ्यांद्वाभ्यामञ्जलिभ्यां मनुष्यांस्तर्पयेत्ततः ॥ १५ ॥
दक्षिणाभिमुखःसव्यं जान्वाच्यद्विगुणैःकुशैः ।
तिलैर्जलैश्चदेशिन्या मूलदर्भाद्विनिःसृतैः ॥ १६ ॥
दक्षिणांसोपवीतस्यान् क्रमेणाञ्जलिभिस्त्रिभिः ।
सन्तर्पयेत्तुदिव्यान्पितॄंस्तत्परांश्चपितॄन्स्वकान् ॥ १७ ॥


न बोलता हुआ वेद को पढ़े ॥ ११ ॥ और धर्मशास्त्र इतिहासादि का भी थोड़ा २ भाग अपनी शक्ति के अनुसार पढ़े इस प्रकार प्रथम स्वाध्याय करके देवताओं का आगे लिखे प्रकार से तर्पण करे ॥ १२ ॥ दहिने घोटू [ जानु ] को भूमि पर नवाय कर पूर्व को है अग्रभाग जिन का ऐसे कुश जौ, और तिल लेकर सव्य यज्ञोपवीत धारण किये पूर्वाभिमुख बैठा एक २ अंजलि देता हुआ तर्पण करे ॥ १३ ॥ दोनों जानु बराबर रख जनेऊ कंठ में कर उत्तर को मुख कर,-बांयी ओर अग्रभाग जिन का ऐसे तिरछे कुश और तिल मिले हुये जौ से ॥ १४ ॥ कनिष्ठा अंगुली के मूल से उत्तर में जो गिरें ऐसे जलों से दो २ अंजलियों से सनकादि मनुष्यों [ऋषियों] का तर्पण करे ॥१५॥ दक्षिण को मुख करके बायां जानु (घोंटू) भूमि पर टेक कर द्विगुण कुश तिल, और प्रदेशिनी (तर्जनी) के मूल पर रक्खे कुशों से गिरते हुए जलों से ॥ १६ ॥ दहिने कन्धे पर जनेऊ रक्खे हुये क्रम से तीन २ अंजली देता हुआ दिव्य पितरों का तर्पण करके अपने पिता, पितामह, प्रपितामह पितरों का तर्पण क्रम से करे ॥ १७ ॥

२० व्यासस्मृतिः ॥

मातृमातामहांस्तद्वत् त्रीनेवंस्त्रिभिस्त्रिभिः । मातामहस्ययेऽप्यन्ये गोत्रिणोदाहवर्जिताः ॥ १८ ॥ तानेकाञ्जलिदानेन तर्पयेच्चपृथक्पृथक् । असंस्कृतप्रमीताये प्रेतसंस्कारवर्जिताः ॥ १९ ॥ वस्त्रनिष्पीडिताम्भोभिस्तेषामाप्यायनंभवेत् । अतर्पितेषुपितृषु वस्त्रंनिष्पीडयेत्तुयः ॥ २० ॥ निराशाःपितरस्तस्य भवन्तिसुरमानुषैः । पयोदर्भस्वधाकार गोत्रनामतिलैर्भवेत् ॥ २१ ॥ सुदत्तंतत्पुनस्तेषामेकेनापिविनावृथा । अन्यचित्तेनयद्दत्तं यद्दत्तंविधिवर्जितम् ॥ २२ ॥ अनासनस्थितेनापि तज्जलंरुधिरायते । एवंसन्तर्पिताःकामैस्तर्पकांस्तर्पयन्तिच ॥ २३ ॥ ब्रह्मविष्णुशिवादित्यमित्रावरुणनामभिः ।


पितादि के तुल्य माता, पितामही, और प्रपितामही इन तीनों का तर्पण करके मातामह (नाना) प्रमातामह और वृद्धप्रमातामह इन तीनों का भी इसी प्रकार तीन २ अञ्जुलियों से तर्पण करे—और नाना के गोत्र के अन्य जो लोग मर गये हों जिन का दाह कर्म नहीं हुआ हो ॥ १८ ॥ उन का भी एक २ अञ्जलि देकर पृथक् २ तर्पण करे और जो उपनयनादि संस्कार हुए विना ही मरे हैं तथा जिन का दशगात्रादि प्रेत संस्कार भी नहीं हुआ ॥१९॥ उन को वस्त्र (अंगोछा) निचोड़ने के जल से तृप्ति होजाती है। जो पुरुष पितरों के तर्पण से पहिले वस्त्र को निचोड़ता है ॥२०॥ उस के पितर; देवता और मनुष्यों सहित निराश हो जाते हैं। जल, कुश, स्वधा, गोत्र नाम और तिल इन सब के सहित जो तर्पण किया जाता है ॥ २१ ॥ वह जलदान उत्तम है। उन जलादि में से एक भी कोई वस्तु न हो तो किया हुआ तर्पण वृथा हो जाता है। अन्य विचार मन में रख कर वा विधिपूर्वक जो तर्पण नहीं किया ॥ २२ ॥ अथवा आसन पर बैठे विना जो जल दिया वह सब रुधिर के समान है। इस प्रकार तृप्त किये पितर तर्पण करने वालों की कामनाओं की पूर्ति से तृप्त करते हैं ॥२३॥ ब्रह्मा, विष्णु, शिव, आदित्य, मित्रावरुण, इन देवताओं

भाषार्थसहिता ॥ २९

पूजयेल्लक्षितैर्मन्त्रैर्जलैर्मन्त्रोक्तदेवताः ॥ २४ ॥ उपस्थायरविंकाष्ठां पूजयित्वाचदेवताः । ब्रह्माग्नीन्द्रौषधीजीवविष्णुवाङ् महतांतथा ॥ २५ ॥ अपांपतेतिसत्कारं नमस्कारैःस्वनामभिः । कृत्वामुखंसमालभ्य स्नानमेवंसमाचरेत् ॥ २६ ॥ ततःप्रविश्य भवनमावसथ्येहुताशने । पाकयज्ञांश्चतुरो विदध्याद्विधिवद्द्विजः ॥ २७ ॥ अनाहितावसथ्याग्निरादायान्नंघृतप्लुतम् । शाकलेनविधानेन जुहुयाल्लौकिकेऽनले ॥ २८ ॥ व्यस्ताभिर्व्याहृतीभिश्च समस्ताभिस्ततःपरम् । षड्भिर्देवकृतस्येति मन्त्रवद्भिर्यथाक्रमम् ॥ २९ ॥ प्राजापत्यंस्विष्टकृतं हुत्वैवं द्वादशाहुतीः । ओंकारपूर्वःस्वाहान्तस्त्यागःस्विष्टविधानतः ॥ ३० ॥


को उन २ के मन्त्रों द्वारा जल से अर्घ देवे ॥२४॥ सूर्य नारायण का उपस्थान करके और पूर्व दिशाओं को उन २ के इन्द्रादि देवताओं सहित नमस्कार करके ब्रह्मा, अग्नि, इन्द्र, ओषधी, जीव, विष्णु, वाक्, महत्, ॥२५॥ अपांपति इन सब का ( अग्नयेनमः ) इत्यादि नाम मन्त्रों से पूजन करके (संवर्चसा०) मन्त्र से मुख का प्रक्षालन करके फिर मध्याह्न का स्नान करे ॥ २६ ॥ फिर घर में जाकर गृह्य अग्नि में ब्राह्मणादि द्विज विधिपूर्वक देव यज्ञादि चारो पाक यज्ञों को करें ॥ २७ ॥ विधिपूर्वक गृह्याग्नि का स्थापन जिस ने न किया हो वह पुरुष घी से सम्यक् प्लावित अन्न को लेकर शाकल्य संहिता में कहे विधान से लौकिक अग्नि में होम करे ॥ २८ ॥ १- ओं भूः स्वाहा । २- ओंभुवः स्वाहा । ३- ओंस्वः स्वाहा । इस प्रकार व्यस्त नाम पृथक् २ तीन व्याहृतियों से तथा- ओंभूर्भुवःस्वः स्वाहा । और ( देवकृतस्यैन० ) इत्यादि शाकल होम के छः मन्त्रों से छः आहुति करके ॥ २९ ॥ इसी प्रकार प्राजापत्य तथा एक स्विष्टकृत् ये सब बारह आहुति करे उक्त सब मन्त्रों के पूर्व ओंकार और अन्त में स्वाहा पद लगावे । त्याग वाक्य गृह्यसूत्रानुसार जानो ॥ ३० ॥

२२ व्यासस्मृतिः ॥

भुविदर्भान्समास्तीर्य बलिकर्मसमाचरेत् ।
विश्वेभ्योदेवेभ्यइति सर्वेभ्योभूतेभ्यएवच ॥ ३१ ॥
भूतानांपतयेचेति नमस्कारेणशास्त्रवित् ।
दद्याद्वलित्रयंचाग्रे पितृभ्यश्चस्वधानमः ॥ ३२ ॥
पात्रनिर्णेजनंवारि वायव्यांदिशि निःक्षिपेत् ।
उद्धृत्यषोडशग्रासमात्रमन्नंघृतोक्षितं ॥ ३३ ॥
इदमन्नंमनुष्येभ्योहन्तेत्युक्त्वासमुत्सृजेत् ।
गोत्रनामस्वधाकारैः पितृभ्यश्चापिशक्तितः ॥ ३४ ॥
षड्भ्योऽन्नमन्वहंदद्यात्पितृयज्ञविधानतः ।
वेदादीनांपठेत्किञ्चिदल्पंब्रह्ममवाप्तये ॥ ३५ ॥
ततोऽन्यदन्नमादाय निर्गत्यभवनाद्बहिः ।
काकेभ्यःश्वपचेभ्यश्च क्षिपेद्गोग्रासमेवच ॥ ३६ ॥
उपविश्यगृहद्वारि तिष्ठेद्यावन्मुहूर्तकम् ।
अप्रमुक्तोऽतिथिंलिप्सुर्भावशुद्धःप्रतीक्षकः ॥ ३७ ॥


पृथ्वी पर कुश बिछा कर बलि कर्म (भूतयज्ञ) करै (विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः) (सर्वेभ्योभूतेभ्योनमः) ॥ ३१ ॥ और (भूतानांपतयेनमः) इस प्रकार शास्त्र का जानने वाला पुरुष तीन बलि प्रथम दे कर (पितृभ्यःस्वधानमः) इस मन्त्र से पितरों के लिये एक बलि अपसव्य दक्षिणाभिमुख हो कर देवे ॥ ३२ ॥ वैश्वदेव सम्बन्धी अन्नपात्र के धोने का जल वायव्य दिशा में छोड़े फिर घृतसेचन किये सोलह ग्रास परिमित अन्न को निकाल कर ॥३३॥ इदमन्नं मनुष्येभ्योहन्त-यह कहकर मनुष्य यज्ञ कर देवे और अपने गोत्र का नाम तथा स्वधा कहकर यथा शक्ति पितरोंको भी देवे॥३४॥ पितृयज्ञ की विधि से छः (३ पितृपक्ष के ३ मातृपक्ष के) को नित्य अन्न देवे। फिर ब्रह्मयज्ञ की प्राप्ति के निमित्त कुछ वेद आदि का भाग पढ़ै ॥३५॥ फिर अन्य अन्न को ले घर से बाहर जाके काक कुत्ते चाण्डाल इन को भी देवे और गौओं को ग्रास भी देवे ॥३६॥ फिर घर के द्वार पर बैठ कर दो घड़ी ठहरे तथा स्वयं भोजन न करै और अतिथि की आकांक्षा करता हुआ मन से शुद्ध होकर अतिथि की बाट देखे ॥ ३७ ॥

पादधावनसम्मानाभ्यञ्जनादिभिरर्चितः ।

भाषार्थसहिता ॥ २३

आगतंदूरतःशान्तं भोक्तुकाममकिंचनम् ।
दृष्ट्वासम्मुखमभ्येत्य सत्कृत्यप्रश्रयार्चनैः ॥ ३८ ॥
पादधावनसम्मानाभ्यञ्जनादिभिरर्चितः ।
त्रिदिवंप्रापयेत्सद्यो यज्ञास्याभ्यधिकोऽतिथिः ॥ ३९ ॥
कालागतोऽतिथिर्हृष्ट्वेदपारोगृहागतः ।
द्वावेतौपूजितौस्वर्गं नयतोऽधस्त्वपूजितौ ॥ ४० ॥
विवाह्यस्नातकक्ष्माभृदाचार्यसुहृदृर्त्विजः ।
अर्ध्याभवन्तिधर्मेण प्रतिवर्षंगृहागताः ॥ ४१ ॥
गृहागतायसत्कृत्य श्रोत्रियाययथाविधि ।
भक्त्योपकल्पयेदेकं महाभागंविसर्जयेत् ॥ ४२ ॥
विसर्जयेदनुव्रज्य सुतृप्तञ्छ्रोत्रियातिथीन् ।
मित्रमातुलसंबन्धिभ्यान्यवान्सगुपागतान् ॥ ४३ ॥
भोजयेद्गृहिणोभिक्षां सत्कृतांभिक्षुकोऽर्हति ।


जो दूरसे आया हो, शान्तस्वभाव हो, निर्धन हो, ऐसे अभ्यागत ब्राह्मण या संन्यासी को देखकर सन्मुख जाके नम्रता और आदर पूर्वक स्तुति प्रार्थना से ॥ ३८ ॥ पग धोना, सम्मान, तैलमर्दनादि से पूजित हुआ अतिथि यज्ञ से भी अधिक स्वर्ग को प्राप्त कराता (पहुंचाना) है ॥ ३९ ॥ उचित समय पर आया अतिथि और वेद का तत्त्व जानने वाला अपने घर आये ये दोनों पूजे हों तो स्वर्ग में, और न पूजे हों तो नरक में ले जाते हैं ॥४०॥ जो अपने यहां विवाहा हो, ब्रह्मचर्य समाप्त करके हुआ स्नातक, राजा, आचार्य, मित्र, ऋत्विज्, ये छः अपने घर पर आवें तो प्रतिवर्ष अर्घ्य मधुपर्कादि विधि विहित धर्म से पूजने योग्य हैं ॥४१॥ अपने घर आये वेदपाठी का शास्त्रोक्त विधि से सत्कार करके श्रद्धा से अपने धनादि का एक बड़ा भाग (हिस्सा) देकर विदाकरे ॥४२॥ अच्छे आदर सत्कार से तृप्त किये वेदपाठी तथा अतिथियों के पीछे कुछ दूर चल कर विसर्जन करे। मित्र, मामा, सम्बन्धि, बांधव, ये लोग अपने घर पर आये हों तो ॥४३॥ उन को भी आदर से भोजन करावे और सत्कार से दी हुई गृहस्थी की भिक्षा को भिक्षुक भी अवश्य ग्रहण करे और जो गृहस्थी स्वादु अन्न को स्वयं खाता तथा अस्वादु अन्न अतिथि आदि को देता है वह

२४ व्यासस्मृतिः ॥

स्वाद्वन्नमश्नन्नस्वादु ददद्गच्छत्यधोगतिम् ॥ ४४ ॥ गर्भिण्यातुरभृत्येषु बालवृद्धातुरादिषु । बुभुक्षितेषुभुञ्जानो गृहस्थोऽप्राप्तिकिल्बिषम् ॥ ४५ ॥ नाद्याद्दूढ्रेनपाकाद्यं कदाचिदनिमन्त्रितः । निमन्त्रितोऽपिनिन्द्येन प्रत्याख्यानं द्विजोऽर्हति ॥ ४६ ॥ शूद्राभिशस्तवार्धुष्या वाग्दुष्टक्रूरतस्कराः । क्रुद्धापविद्धबद्धोग्रवधबन्धनजीविनः ॥ ४७ ॥ शैलूषशौण्डिकोन्नद्धोन्मत्तव्रात्यव्रतच्युताः । नग्ननास्तिकनिर्लज्जपिशुनव्यसनान्विताः ॥ ४८ ॥ कदर्यस्त्रीजितानाय्यैपरवादकृतानराः । अनीशाःकीर्तिमन्तोऽपि राजदेवस्वहारकाः ॥ ४९ ॥ शयनासनसंसर्गव्रतकर्मादिदूषिताः । अश्रद्दधानाःपतिता भ्रष्टाचारादयश्चये ॥ ५० ॥ अभोज्यान्नाःस्युरन्नादो यस्ययःस्यात्स तत्समः ।


अधोगति (नरक) को प्राप्त होता है ॥४४॥ गर्भवती स्त्री, रोगी भृत्य, बालक, और वृद्धता से दुःखित इनके भूखे बैठे रहते जो गृहस्थ भोजन करता है वह पाप का भागी होता है। इससे गर्भवती आदिको पहिले भोजन देवे। निमन्त्रण दिये विना अर्थात् बिन बुलाये किसी के पङ्क्ति भोजनादि में कदापि न खावे और न इच्छा करे। यदि कोई निन्दित पुरुष निमन्त्रण भी देवे तो भी ब्राह्मण उसे स्वीकार न करे ॥ ४६ ॥ शूद्र, जिसे शाप लगा हो, ब्याज लेने वाला, गूंगा, दुष्ट, कठोर, चोर, क्रोधी, पतित, केदी, बड़ी हिंसा और बंधन से जो जीविका करते हैं॥४७॥ नट, कलवार, उन्मदु (उत्कट) उन्मत्त, व्रात्य (जिसका जनेऊ न हुआ हो) जिसने व्रत को छोड़ दिया हो, गूंगा, नास्तिक, निर्लज्ज, चुगल, व्यसनी, (जो मदिरा आदि पीता हो) ॥ ४८ ॥ कन्जूस, और स्त्रियों ने जिसे जीता हो, असज्जन, सबका निन्दक, असमर्थ और कीर्तिवाले होकर भी जो राजा और देवता के द्रव्य को मार ले ॥ ४९ ॥ शय्या, आसन, संसर्ग, व्रत कर्म इन में जो किसी प्रकार दूषित हों और श्रद्धाहीन पतित भ्रष्टाचार आदि इन सब नट आदि के ॥ ५० ॥ अन्न को धर्मनिष्ठ पुरुष कदापि न खावे क्योंकि जो

भाषाऽर्थसहिता ॥ २५

नापितान्वयमित्रार्द्ध सीरिणोदासगोपकाः ॥ ५१ ॥ शूद्राणामप्यमीषान्तु भुक्त्वाऽन्नंनैवदुष्यति । धर्मेणान्योन्यभोज्यान्ना द्विजास्तुविदितान्वयाः ॥ ५२ ॥ स्ववृत्तोपार्जितंमेध्यमाकरस्थममाक्षिकम् । अश्वलीढमगोघ्रातमस्पृष्टंशूद्रवायसैः ॥ ५३ ॥ अनुच्छिष्टमसंदुष्टमपर्युषितमेवच । अम्लानञ्चाह्यमन्नाद्यमार्य्यंनित्यंसुसंस्कृतम् ॥ ५४ ॥ कृसरापूपसंयावपायसंशष्कुलींतिच । नाश्रीयाद्ब्राह्मणोमांसमनियुक्तःकथञ्चन ॥ ५५॥ क्रतौश्राद्धेनियुक्तोवा अनश्नन्पततिद्विजः । मृगयोपार्जितंमांसमभ्यर्च्य्यापितृदेवताः ॥ ५६ ॥ क्षत्रियाद्द्वादशानन्तत्क्रीत्वावैश्योऽपिधर्मतः ।


जिसके अन्न को खाता है वह उसी के समान हो जाता है। नाई, वंश पर-म्परा से मित्र, अर्द्धसीरी (जिसके आधे साझे में खेती होती हो) दास (कहार) और गोप ॥ ५१ ॥ इतने शूद्रों के भी अन्न को खाकर दोष भागी नहीं होता। प्रसिद्ध हैं वंश जिन का ऐसे ब्राह्मण परस्पर भोज्यान्न (वह उसके अन्न को और वह उस के को खावे) कहे हैं ॥ ५२ ॥ अपनी जीविका से जो संचय किया हो, शहद को छोड़कर आकर (खान) की वस्तु, घोड़े का तथा गौ का उच्छिष्ट किया न हो, जिस को शूद्र ने वा कौवे ने न छुवा हो वे सब अन्न पवित्र हैं ॥ ५३ ॥ जो उच्छिष्ट न हो जिसको दोष न लगाया हो, बासी न हो, म्लान (दुर्गन्ध) न हो, ऐसे भली प्रकार बनाये अन्न आदि को नित्य खावे ॥ ५४ ॥ खिचड़ी, मालपूवे, मोहनभोग, खीर, पूरी इनको भी खा लेवे। यज्ञ में किसी ऋत्विज् के काम पर नियुक्त हुए विना ब्राह्मण कभी मांस न खावे ॥ ५५ ॥ यज्ञ और श्राद्ध में नियुक्त किया हुआ ऋत्विगादि अधिकार स्वीकार करके यदि ब्राह्मण मांस न खावे तो भी पतित हो जाता है। शिकार करके लाये हुए मांस को पितर और देवताओं का पञ्चमहायज्ञों द्वारा पूजन करके ॥५६॥ ११ भागों को क्षत्रिय और उस में से बारहवें भाग को

२६ व्यासस्मृतिः ॥

द्विजोजग्ध्वावृथामांसं हत्वाप्यविधिनापशून् ॥ ५७ ॥ निरयेष्वक्षयंवासमाप्नोत्याचन्द्रतारकम् । सर्वान्कामान्समासाद्य फलमश्वमखस्यच ॥ ५८ ॥ मुनिसाम्यमवाप्नोति गृहस्थोऽपिद्विजोत्तमः । द्विजभोज्यानिगव्यानि माहिष्याणिपयांसिच ॥ ५९ ॥ निर्दशासन्धिसामन्धि वत्सवन्तीपयांसिच । पलाण्डुंश्रेतवृन्ताकं रक्तमूलकमेवच ॥ ६० ॥ गृञ्जनारण्यताम्बूलगुञ्जाफलानिच । अकालोत्थफलान्येतान् द्विजोजग्ध्वैन्दवञ्चरेत् ॥ ६१ ॥ वाक्पूतिमविज्ञातमन्यपीडनकार्यपि । भूतेभ्योऽप्रदत्त्वाच तदन्नंगृहिणोदहेत् ॥ ६२ ॥ हेमराजतकांस्येषु पात्रेष्वद्यात्सदागृही । अभावेसाधुगन्धेषु लोध्रद्रुमलतासुच ॥ ६३ ॥

मोल लेकर वैश्य भी खा सकता है । ब्राह्मण वृथा मांस (जो यज्ञ वा श्राद्ध का न हो) को खाकर और वेदोक्त विधि के बिना पशुओं को मार कर ॥ ५७ ॥ नरक में तब तक बसता है जब तक चन्द्रमा और तारे विद्यमान हैं । सब कामना और अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त होकर ॥ ५८ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण भी मुनियों के तुल्य तपस्वी होजाता है। ब्राह्मणों के भोजन योग्य गौ और भैंस के दूध होते हैं ॥ ५९ ॥ और वह दूध खाने योग्य है जो ब्याने से दश दिन के पीछे का हो, सन्धिनि नाम गर्मवती गौ का वा भैंस का न हो, बछड़े वा बछिया वाली का हो किन्तु जिस का बच्चा मर जाय उस का दूध अभक्ष्य है और पलाण्डु (प्याज) सफेद बैंगन और लाल मूली वा शलगम ॥६०॥ गाजर, वृक्ष का लाल गोंद गूलर के फल, बिना समय के फल, इन को ब्राह्मण खावे तो चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त करे ॥ ६१ ॥ वाणी से दूषित (गोभी आदि) और जिसे न जानता हो कि कैसा है, जिस से दूसरे को दुःख हो, इन को भी खाकर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित करे । भूतों को बिना दिये अर्थात् भूतयज्ञ किये बिना जो अन्न खाता है वह अन्न गृहस्थ को दग्ध करता है ॥ ६२ ॥ सुवर्ण चांदी कांसे के पात्रों में गृहस्थ पुरुष सदा भोजन करे पात्र न हो तो अच्छे गंध वाले लोध्र आदि वृक्षों के पत्तों में खाये ॥ ६३ ॥

भाषार्थसहिता ॥ २१

पलाशपद्मपत्रेषु गृहस्थोभोक्तुमर्हति ।
ब्रह्मचारीयतिश्चैव श्रेयोयद्भोक्तुमर्हति ॥ ६४ ॥
अभ्युक्ष्यान्नंनमस्कारैर्भुविदयाद्वलित्रयम् ।
भूपतयेभुवनपतये भूतानांपतयेतथा ॥ ६५ ॥
अपःप्राश्यततःपश्चात् पञ्चप्राणाहुतीःक्रमात् ।
स्वाहाकारेणजुहुयाच्छेषमद्याद्यथासुखम् ॥ ६६ ॥
अनन्यचित्तोभुञ्जीत वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् ।
आतृप्तेरन्नमश्नीयादशून्यंपात्रमुत्सृजेत् ॥ ६७ ॥
उच्छिष्टमन्नमुद्धृत्य ग्रासमेकं भुवि क्षिपेत् ।
आचान्तःसाधुसङ्गेन सद्विद्यापठनेनच ॥ ६८ ॥
पुरावृत्तकथाभिश्च शेषाहमतिवाहयेत् ।

अथवा ढांक वा कमल के पत्तों की पत्तल पर भोजन करे, ब्रह्मचारी और यति ( संन्यासी ) भी उक्त पत्तों में खाय तो श्रेष्ठ है किन्तु धातु पात्र उन के योग्य नहीं हैं ॥ ६४ ॥ अन्न के सब ओर प्रदक्षिण क्रम से जल सेचन करके नमस्कार सहित पृथ्वी में तीन बलि नाम ग्रास प्राक्संस्थ धरे जैसे-भूप-तये नमः । भुवनपतये नमः । भूतानांपतये नमः ॥ ६५ ॥ फिर (ओ३ममृतोपस्तर-णमसि स्वाहा) इस मन्त्र से आचमन करके पांच (१) प्राणों के लिये पांच आ-हुति स्वाहा कहकर क्रम से मुख में देवे और फिर सुखपूर्वक शेष अन्न को खावे ॥ ६६ ॥ मौन होकर अन्न की निन्दा न करता हुआ मनुष्य एकाग्र मन करके तृप्ति पर्यन्त भोजन करे और पात्र को खाली न छोड़े किन्तु कम से कम एक दो ग्रास पात्र में अवश्य छोड़ देवे ॥ ६७ ॥ उच्छिष्ट अन्न में से एक ग्रास उठा कर भोजनपात्र से बांयी ओर ( मद्भुक्तोच्छिष्ट०) मन्त्र पढ़ के पितृ तीर्थ से धरे इस का नाम चित्राहुति है । फिर (अमृतापिधान०) मन्त्र से आचमन करके साधुओंकी संगति, उत्तम विद्याके पढ़ने ॥६८॥ और प्राचीन इतिहासोंकी उत्तम कथाओं से शेष दिनको बितावे और मृत्यों (स्त्री पुत्रादि) सहित गृहस्थ पुरुष


(१) - प्राणाय स्वाहा । (१) - ओं अपानाय स्वाहा । (२) - ओं व्यानाय स्वाहा । (३) - ओं उदानाय स्वाहा । (४) - ओं समानाय स्वाहा ॥ ५--

२८ व्यासस्मृतिः ॥

सायंसन्ध्यामुपासीत हुत्वाग्निंभृत्यसंयुतः ॥ ६९ ॥
आपोशानक्रियापूर्वमश्नीयादन्वहंद्विजः ।
सायमप्यतिथिःपूज्यो होमकालागतोद्विजः ॥ ७० ॥
श्रद्धयाशक्तितोनित्यं श्रुतंहन्यादपूजितः ।
नातितृप्तउपस्पृश्य प्रक्षाल्यचरणौशुचिः ॥ ७१ ॥
अप्रत्यगुत्तरशिराः शयीतशयनेशुभे ।
शक्तिमानुचितेकाले स्नानंसन्ध्यांनहापयेत् ॥ ७२ ॥
ब्राह्मेमुहूर्तेचोत्थाय चिन्तयेद्धितमात्मनः ।
शक्तिमान्मतिमान्नित्यं व्रतमेतत्समात्रेत् ॥ ७३ ॥
इतिश्रीवेदव्यासीयेधर्मशास्त्रेगृहस्थान्हिकोनामतृतीयोध्यायः॥३॥
इतिव्यासकृतंशास्त्रं धर्मसारसमुच्चयम् ।
आश्रमेयानिपुण्यानि मोक्षधर्माश्रितानिच ॥ १ ॥
गृहाश्रमात्परोधर्मो नास्तिनास्तिपुनःपुनः ।


आग्निहोत्र करके सायकाल का सन्ध्या करे ॥६९॥ आपोशान क्रिया (भोजन से पहिले उपस्ताररूप आचमन) करके द्विज पुरुष नित्य भोजन करे। होम के समय आये ब्राह्मण अतिथि का सायंकाल में भी सदैव पूजन करे ॥७०॥ श्रद्धा और शक्ति के अनुसार यदि अतिथि का पूजन न किया जाय तो वह वेदपाठ को नष्ट ( निष्फल ) करता है । अत्यन्त तृप्त नहो किन्तु लघु भोजन कर आचमन करके चरणों को धोकर ॥ ७१ ॥ उत्तम शय्या पर सोवे परन्तु पश्चिम वा उत्तर दिशा में शिर न करै । समर्थ (नीरोग) हो तो सूर्योदय के समय स्नान. सन्ध्या को कभी न छोड़े ॥ ७२ ॥ ब्राह्म मुहूर्त [ ४ घड़ी रात से ] में उठकर अपने हित की चिन्ता करे। शक्ति और बुद्धि वाला मनुष्य इस व्रत (नियम) को नित्य २ सेवन करे ॥ ७३ ॥

यह वेदव्यासीय धर्मशास्त्र में गृहस्थ के नित्यकर्म विषय में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥३॥

धर्म के सार का है संग्रह जिस में ऐसा यह वेदव्यास जी का बनाया धर्मशास्त्र है । सब आश्रमों में जो पुण्य हैं और जो पुण्य मोक्ष के धर्मों में हैं वे सब गृहाश्रम में प्राप्त हो सकते हैं ॥१॥ सब आश्रमों में गृहस्थ आश्रम

भाषार्थसहिता ॥ २९

सर्वतीर्थफलंतस्य यथोक्तंयस्तुपालयेत् ॥ २ ॥ गुरुभक्तोभृत्यपोषी दयावाननसूयकः । नित्यजापीचहोमोच सत्यवादीजितेन्द्रियः ॥ ३ ॥ स्वदारेयस्यसन्तोषः परदारनिवर्त्तनम् । अपवादोऽपिनोयस्य तस्यतीर्थफलगृहे ॥ ४ ॥ परदारान्परद्रव्यं हरतेयोदिनेदिने । सर्वतीर्थाभिषेकेण पापंतस्यननश्यति ॥ ५ ॥ गृहेषुसेवनीयेषु सर्वतीर्थफलंततः । अन्नदस्यत्रयोभागाः कर्त्ताभागेनलिप्यते ॥ ६ ॥ प्रतिश्रयंपादशौचं ब्राह्मणानांचतर्पणम् । नपापंसंस्पृशेत्तस्य वलिंभिक्षांददांतियः ॥ ७ ॥ पादोदकंपाइघृतं दीपमन्नंप्रतिश्रयम् ।


से परे धर्म नहीं है। जो गृहस्थ पुरुष अपने धर्म का पूरा २ शास्त्रानुसार पालन करे उसको संपूर्ण तीर्थों का फल घर में ही मिल जाता है ॥२॥ गुरु का भक्त, स्त्री पुत्रादि भृत्योंका पालन करने वाला, दया करने वाला, जो किसीकी निन्दा नहीं करता जो नित्य २ जप और होम करता सत्य बोलता और जितेन्द्रिय रहता है ॥ ३ ॥ अपनी स्त्री में ही जिस को सन्तोष हो, अन्य की स्त्री से निवृत्ति हो, जिस की निन्दा बुराई कोई न करता हो उस मनुष्य को घर में भी तीर्थ का फल मिलता है ॥ ४ ॥ पराई स्त्री और पराये धन को जो दिन पर दिन भोगता है सब तीर्थों के स्नान से भी उस का पाप नष्ट नहीं होता ॥ ५ ॥ तिस से सेवन करने योग्य उत्तम धर्मों वाले घरों में सब तीर्थों का फल होता है । पुण्य के तीन भाग उस को मिला करते हैं कि जिस के अन्न से श्राद्ध आदि किया जाय और जो उक्त कर्मों को करता है उस को एक भाग फल मिलता है ॥ ६ ॥ नम्रता, वा पगों का धोना, ब्राह्मणों को तृप्त करना वलि-वैश्वदेव, और भिक्षा देना इन कामों को जो नित्य २ करता है उस मनुष्य को पाप नहीं लगता ॥ ७ ॥ पग धोने का जल, पादघृत ( जूता वा खड़ामू-पादुका, ) दीपक, अन्न, घर,ये वस्तु जो ब्राह्मणों को देता है उस के पास

३० व्यासस्मृतिः ॥

योददातिब्राह्मणेभ्यो नोपसर्पतितंयमः ॥ ८ ॥
विप्रपादोदकक्लिन्ना यावत्तिष्ठतिमेदिनी ।
तावत्पुष्करपात्रेषु पिवन्तिपितरोऽमृतम् ॥ ९ ॥
यत्फलंकपिलादाने कार्तियांज्येष्ठपुष्करे ।
तत्फलंऋषयःश्रेष्ठा विप्राणांपादशौचने ॥ १० ॥
स्वागतेनाग्नयःप्रीता आसनेनशतक्रतुः ।
पितरःपादशौचेन अन्नाद्येनप्रजापतिः ॥ ११ ॥
माता पित्रोः परंतीर्थं गङ्गागावोविशेषतः ।
ब्राह्मणात्परमंतीर्थं नभूतन्नभविष्यति ॥ १२ ॥
इन्द्रियाणिवशीकृत्य यत्रयत्रवसेन्नरः ।
तत्रतत्रकुरुक्षेत्रं नैमिषंपुष्कराणिच ॥ १३
गङ्गाद्वारंचकेदारं संन्निहत्यांतथैवच ।
एतानिसर्वतीर्थानि कृत्वापापैःप्रमुच्यते ॥ १४ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच चातुर्वर्ण्यस्यभोद्विजाः ।


यमराज नहीं आता ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों के पगों के जल से गीली की हुई पृथ्वी जब तक रहती है तब तक पुष्कर तीर्थ के पत्तों में पितर लोग अमृत पीते हैं ॥ ९ ॥ जो फल कपिला गौ के दान का है और जो फल कार्तिक की पूर्णिमा को पुष्कर के स्नान का है । हे श्रेष्ठ ऋषि लोगो ! वही फल ब्राह्मणों के पग धोने में हैं ॥ १० ॥ विद्वान् ब्राह्मणों वा विरक्त संन्यासियों के स्वागत (आपने बड़ी कृपाकी आइये ! इत्यादि कहना) से अग्नि, आसन के देने से इन्द्र, पग धोने से पितर, और अन्न आदि के देने से ब्रह्मा, प्रसन्न होते हैं ॥ ११ ॥ माता पिता की सेवा करना परम तीर्थ है । विशेष कर गङ्गा गौ तीर्थ हैं और ब्राह्मणों से अधिक तीर्थ न हुआ न होगा ॥ १२ ॥ जो मनुष्य इन्द्रियों को वश में करके जिस २ आश्रम में बसता है उस के लिये वहां २ कुरुक्षेत्र-नैमिष- और पुष्कर ॥ १३ ॥ हरिद्वार, केदार, संनिहत्या-इत्यादि तीर्थ हैं वह इन सब तीर्थों को करके सब पापों से छूट जाता है ॥ १४ ॥

हे ऋषियो ब्राह्मणो ! चारों वर्णों और आश्रमों के दान धर्म को व्यास

भाषाथंसहिता ॥ ३१

दानधर्मंप्रवक्ष्यामि यथाव्यासेनभाषितम् ॥ १५ ॥ यद्ददातिविशिष्टेभ्यो यच्चाश्नातिदिनेदिने । तद्भवित्तमहंमन्ये शेषंकस्यापिरक्षति ॥ १६ ॥ यद्ददातियदश्नाति तदेवधनिनोधनम् । अन्यैमृतस्यक्रीडन्ति दारैरपिधनैरपि ॥ १७ ॥ किंधनेनकरिष्यन्ति देहिनोऽपिगतायुषः । यद्दर्द्धयितुमिच्छन्तस्तच्छरीरमशाश्वतम् ॥ १८ ॥ अशाश्वतानिमित्राणि विभवोनैवशाश्वतः । नित्यंसन्निहितोमृत्युः कर्तव्योधर्मसंग्रहः ॥ १९ ॥ यदिनामनधर्माय नकामायनकीर्तये । यत्परित्यज्यगन्तव्यं तद्धनंकिनदीयते ॥ २० ॥ जीवन्तिजीविनोयस्य विप्रामित्राणिबान्धवाः । जीवितंसफलंतस्य आत्मार्थेकोनजीवति ॥ २१ ॥ कृमयःकिंनजीवन्ति भक्षयन्तिपरस्परम् ।


जी के कहने के अनुसार कहते हैं ॥ १५ ॥ जो उत्तम विद्वान् धर्मात्माओं को देता है वा नित्य २ जो खाता है उस को ही उस का धन मानते हैं और शेष किसी अन्य के ही धन की वह रक्षा करता है ॥१६॥ जितना दान देता है या जितना भोग कर लेता है वही धनी का धन है। क्योंकि उस के मर जाने पर उस के स्त्री तथा धन से अन्य लोग ही आनन्द भोगते हैं ॥१७॥ वृद्धहुए देहधारी मनुष्य धन से क्या करेंगे, जिस शरीर को धन से बढ़ाया वा हृष्ट पुष्ट किया चाहते हैं वह भी अनित्य है ठहरने वाला नहीं मित्र और धन सदैव नहीं रहते और मृत्यु नित्य ही समीप में खड़ा है इस से धर्म का सञ्चय करना चाहिये ॥ १८ ॥ जो धन धर्म के लिये काम (भोग) के लिये और कीर्ति के लिये नही और जिस धन को यहां छोड़कर परलोक जाना है उस धन को क्यों नहीं दिया जाता ? ॥ २० ॥ जिस मनुष्य के जीवित रहने से ब्राह्मण, मित्र, बांधव (कुटुम्बी) लोगों की जीविका (उपकार) हो उस का जीवन सफल है। अपने लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ २१ ॥ कृमिकीट

३२ व्यासस्मृतिः ॥

परलोकाविरोधेन योजीवतिसजीवति ॥ २२ ॥
पशवोऽपिहिजीवन्ति केवलात्मोदरम्भराः ।
किंकायेनसुगुप्तेन बलिनाचिरजीविना ॥ २३ ॥
ग्रासादद्धंमपिग्रासमर्थिभ्यःकिंनदीयते ।
इच्छानुरूपोविभवः कदाकस्यभविष्यति ॥ २४ ॥
अदातापुरुषस्त्यागी धनंसन्त्यज्यगच्छति ।
दातारंकृपणंमन्ये मृतोऽप्यर्थंनमुञ्चति ॥ २५ ॥
प्राणनाशस्तुकर्तव्यो यःकृतार्थोनसोमृतः ।
अकृतार्थस्तुयोमृत्युं प्राप्तःखरसमोहिसः ॥ २६ ॥
अनाहूतेषुयद्दत्तं यच्चदत्तमयाचितम् ।
भविष्यतियुगस्यान्तस्तस्यान्तोनभविष्यति ॥ २७ ॥


पतङ्गादि भी क्या जीवन का निर्वाह नहीं करते ? कि जो एक दूसरे को खा लेते हैं। परन्तु परलोक के लिये दान पुण्य करता हुआ जो पुरुष जीता है उसी का जीवन सार्थक है ॥ २२ ॥ केवल अपने पेट भरने वाले तो पशु भी जीते हैं। भली प्रकार रक्षा किये बलवान् बहुत जीने वाले शरीर से मनुष्यों को क्या फल है ? ॥ २३ ॥ ग्राम वा आधाग्राम अन्न मांगने वाले भिक्षुक को क्यों नहीं देता ? । इच्छा के अनुसार धन कब किस के हो जायगा ? अर्थात् इतना धन कभी किसी के न होगा जिस से तृष्णा पूरी हो जावे ॥ २४ ॥ हमारी राय में किसी को कुछ भी न देने वाला पुरुष ही त्यागी क्योंकि वह धन को छोड़ कर मर जाता है। परन्तु हम दाता को कृपण मानते हैं क्योंकि दाता मर कर भी धन को नहीं छोड़ता अर्थात् मरे पर भी उसे धन दान का पुण्य फल उत्तम ऐश्वर्य भोग मिलता है ॥ २५ ॥ प्राणीं का नाश तो होना ही है परन्तु अपना काम दान पुण्यादि धर्म करके जो मरा है वह जानी नहीं मरा और जो अकृतार्थ ( धर्म किये बिना ) मरता है वह गधे के समान है ॥ २६ ॥ बिन बुलाये ब्राह्मण के घर जाकर और बिन मांगे जो दान दिया जाता है युग नाम काल का तो अन्त होगा परन्तु उस दान के फल का अन्त नहीं होगा ॥ २७ ॥