अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 452, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ २१
पलाशपद्मपत्रेषु गृहस्थोभोक्तुमर्हति ।
ब्रह्मचारीयतिश्चैव श्रेयोयद्भोक्तुमर्हति ॥ ६४ ॥
अभ्युक्ष्यान्नंनमस्कारैर्भुविदयाद्वलित्रयम् ।
भूपतयेभुवनपतये भूतानांपतयेतथा ॥ ६५ ॥
अपःप्राश्यततःपश्चात् पञ्चप्राणाहुतीःक्रमात् ।
स्वाहाकारेणजुहुयाच्छेषमद्याद्यथासुखम् ॥ ६६ ॥
अनन्यचित्तोभुञ्जीत वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् ।
आतृप्तेरन्नमश्नीयादशून्यंपात्रमुत्सृजेत् ॥ ६७ ॥
उच्छिष्टमन्नमुद्धृत्य ग्रासमेकं भुवि क्षिपेत् ।
आचान्तःसाधुसङ्गेन सद्विद्यापठनेनच ॥ ६८ ॥
पुरावृत्तकथाभिश्च शेषाहमतिवाहयेत् ।
अथवा ढांक वा कमल के पत्तों की पत्तल पर भोजन करे, ब्रह्मचारी और यति ( संन्यासी ) भी उक्त पत्तों में खाय तो श्रेष्ठ है किन्तु धातु पात्र उन के योग्य नहीं हैं ॥ ६४ ॥ अन्न के सब ओर प्रदक्षिण क्रम से जल सेचन करके नमस्कार सहित पृथ्वी में तीन बलि नाम ग्रास प्राक्संस्थ धरे जैसे-भूप-तये नमः । भुवनपतये नमः । भूतानांपतये नमः ॥ ६५ ॥ फिर (ओ३ममृतोपस्तर-णमसि स्वाहा) इस मन्त्र से आचमन करके पांच (१) प्राणों के लिये पांच आ-हुति स्वाहा कहकर क्रम से मुख में देवे और फिर सुखपूर्वक शेष अन्न को खावे ॥ ६६ ॥ मौन होकर अन्न की निन्दा न करता हुआ मनुष्य एकाग्र मन करके तृप्ति पर्यन्त भोजन करे और पात्र को खाली न छोड़े किन्तु कम से कम एक दो ग्रास पात्र में अवश्य छोड़ देवे ॥ ६७ ॥ उच्छिष्ट अन्न में से एक ग्रास उठा कर भोजनपात्र से बांयी ओर ( मद्भुक्तोच्छिष्ट०) मन्त्र पढ़ के पितृ तीर्थ से धरे इस का नाम चित्राहुति है । फिर (अमृतापिधान०) मन्त्र से आचमन करके साधुओंकी संगति, उत्तम विद्याके पढ़ने ॥६८॥ और प्राचीन इतिहासोंकी उत्तम कथाओं से शेष दिनको बितावे और मृत्यों (स्त्री पुत्रादि) सहित गृहस्थ पुरुष
(१) - प्राणाय स्वाहा । (१) - ओं अपानाय स्वाहा । (२) - ओं व्यानाय स्वाहा । (३) - ओं उदानाय स्वाहा । (४) - ओं समानाय स्वाहा ॥ ५--