भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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२६ व्यासस्मृतिः ॥

द्विजोजग्ध्वावृथामांसं हत्वाप्यविधिनापशून् ॥ ५७ ॥ निरयेष्वक्षयंवासमाप्नोत्याचन्द्रतारकम् । सर्वान्कामान्समासाद्य फलमश्वमखस्यच ॥ ५८ ॥ मुनिसाम्यमवाप्नोति गृहस्थोऽपिद्विजोत्तमः । द्विजभोज्यानिगव्यानि माहिष्याणिपयांसिच ॥ ५९ ॥ निर्दशासन्धिसामन्धि वत्सवन्तीपयांसिच । पलाण्डुंश्रेतवृन्ताकं रक्तमूलकमेवच ॥ ६० ॥ गृञ्जनारण्यताम्बूलगुञ्जाफलानिच । अकालोत्थफलान्येतान् द्विजोजग्ध्वैन्दवञ्चरेत् ॥ ६१ ॥ वाक्पूतिमविज्ञातमन्यपीडनकार्यपि । भूतेभ्योऽप्रदत्त्वाच तदन्नंगृहिणोदहेत् ॥ ६२ ॥ हेमराजतकांस्येषु पात्रेष्वद्यात्सदागृही । अभावेसाधुगन्धेषु लोध्रद्रुमलतासुच ॥ ६३ ॥

मोल लेकर वैश्य भी खा सकता है । ब्राह्मण वृथा मांस (जो यज्ञ वा श्राद्ध का न हो) को खाकर और वेदोक्त विधि के बिना पशुओं को मार कर ॥ ५७ ॥ नरक में तब तक बसता है जब तक चन्द्रमा और तारे विद्यमान हैं । सब कामना और अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त होकर ॥ ५८ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण भी मुनियों के तुल्य तपस्वी होजाता है। ब्राह्मणों के भोजन योग्य गौ और भैंस के दूध होते हैं ॥ ५९ ॥ और वह दूध खाने योग्य है जो ब्याने से दश दिन के पीछे का हो, सन्धिनि नाम गर्मवती गौ का वा भैंस का न हो, बछड़े वा बछिया वाली का हो किन्तु जिस का बच्चा मर जाय उस का दूध अभक्ष्य है और पलाण्डु (प्याज) सफेद बैंगन और लाल मूली वा शलगम ॥६०॥ गाजर, वृक्ष का लाल गोंद गूलर के फल, बिना समय के फल, इन को ब्राह्मण खावे तो चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त करे ॥ ६१ ॥ वाणी से दूषित (गोभी आदि) और जिसे न जानता हो कि कैसा है, जिस से दूसरे को दुःख हो, इन को भी खाकर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित करे । भूतों को बिना दिये अर्थात् भूतयज्ञ किये बिना जो अन्न खाता है वह अन्न गृहस्थ को दग्ध करता है ॥ ६२ ॥ सुवर्ण चांदी कांसे के पात्रों में गृहस्थ पुरुष सदा भोजन करे पात्र न हो तो अच्छे गंध वाले लोध्र आदि वृक्षों के पत्तों में खाये ॥ ६३ ॥