भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषाऽर्थसहिता ॥ २५

नापितान्वयमित्रार्द्ध सीरिणोदासगोपकाः ॥ ५१ ॥ शूद्राणामप्यमीषान्तु भुक्त्वाऽन्नंनैवदुष्यति । धर्मेणान्योन्यभोज्यान्ना द्विजास्तुविदितान्वयाः ॥ ५२ ॥ स्ववृत्तोपार्जितंमेध्यमाकरस्थममाक्षिकम् । अश्वलीढमगोघ्रातमस्पृष्टंशूद्रवायसैः ॥ ५३ ॥ अनुच्छिष्टमसंदुष्टमपर्युषितमेवच । अम्लानञ्चाह्यमन्नाद्यमार्य्यंनित्यंसुसंस्कृतम् ॥ ५४ ॥ कृसरापूपसंयावपायसंशष्कुलींतिच । नाश्रीयाद्ब्राह्मणोमांसमनियुक्तःकथञ्चन ॥ ५५॥ क्रतौश्राद्धेनियुक्तोवा अनश्नन्पततिद्विजः । मृगयोपार्जितंमांसमभ्यर्च्य्यापितृदेवताः ॥ ५६ ॥ क्षत्रियाद्द्वादशानन्तत्क्रीत्वावैश्योऽपिधर्मतः ।


जिसके अन्न को खाता है वह उसी के समान हो जाता है। नाई, वंश पर-म्परा से मित्र, अर्द्धसीरी (जिसके आधे साझे में खेती होती हो) दास (कहार) और गोप ॥ ५१ ॥ इतने शूद्रों के भी अन्न को खाकर दोष भागी नहीं होता। प्रसिद्ध हैं वंश जिन का ऐसे ब्राह्मण परस्पर भोज्यान्न (वह उसके अन्न को और वह उस के को खावे) कहे हैं ॥ ५२ ॥ अपनी जीविका से जो संचय किया हो, शहद को छोड़कर आकर (खान) की वस्तु, घोड़े का तथा गौ का उच्छिष्ट किया न हो, जिस को शूद्र ने वा कौवे ने न छुवा हो वे सब अन्न पवित्र हैं ॥ ५३ ॥ जो उच्छिष्ट न हो जिसको दोष न लगाया हो, बासी न हो, म्लान (दुर्गन्ध) न हो, ऐसे भली प्रकार बनाये अन्न आदि को नित्य खावे ॥ ५४ ॥ खिचड़ी, मालपूवे, मोहनभोग, खीर, पूरी इनको भी खा लेवे। यज्ञ में किसी ऋत्विज् के काम पर नियुक्त हुए विना ब्राह्मण कभी मांस न खावे ॥ ५५ ॥ यज्ञ और श्राद्ध में नियुक्त किया हुआ ऋत्विगादि अधिकार स्वीकार करके यदि ब्राह्मण मांस न खावे तो भी पतित हो जाता है। शिकार करके लाये हुए मांस को पितर और देवताओं का पञ्चमहायज्ञों द्वारा पूजन करके ॥५६॥ ११ भागों को क्षत्रिय और उस में से बारहवें भाग को