अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 449, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ व्यासस्मृतिः ॥
स्वाद्वन्नमश्नन्नस्वादु ददद्गच्छत्यधोगतिम् ॥ ४४ ॥ गर्भिण्यातुरभृत्येषु बालवृद्धातुरादिषु । बुभुक्षितेषुभुञ्जानो गृहस्थोऽप्राप्तिकिल्बिषम् ॥ ४५ ॥ नाद्याद्दूढ्रेनपाकाद्यं कदाचिदनिमन्त्रितः । निमन्त्रितोऽपिनिन्द्येन प्रत्याख्यानं द्विजोऽर्हति ॥ ४६ ॥ शूद्राभिशस्तवार्धुष्या वाग्दुष्टक्रूरतस्कराः । क्रुद्धापविद्धबद्धोग्रवधबन्धनजीविनः ॥ ४७ ॥ शैलूषशौण्डिकोन्नद्धोन्मत्तव्रात्यव्रतच्युताः । नग्ननास्तिकनिर्लज्जपिशुनव्यसनान्विताः ॥ ४८ ॥ कदर्यस्त्रीजितानाय्यैपरवादकृतानराः । अनीशाःकीर्तिमन्तोऽपि राजदेवस्वहारकाः ॥ ४९ ॥ शयनासनसंसर्गव्रतकर्मादिदूषिताः । अश्रद्दधानाःपतिता भ्रष्टाचारादयश्चये ॥ ५० ॥ अभोज्यान्नाःस्युरन्नादो यस्ययःस्यात्स तत्समः ।
अधोगति (नरक) को प्राप्त होता है ॥४४॥ गर्भवती स्त्री, रोगी भृत्य, बालक, और वृद्धता से दुःखित इनके भूखे बैठे रहते जो गृहस्थ भोजन करता है वह पाप का भागी होता है। इससे गर्भवती आदिको पहिले भोजन देवे। निमन्त्रण दिये विना अर्थात् बिन बुलाये किसी के पङ्क्ति भोजनादि में कदापि न खावे और न इच्छा करे। यदि कोई निन्दित पुरुष निमन्त्रण भी देवे तो भी ब्राह्मण उसे स्वीकार न करे ॥ ४६ ॥ शूद्र, जिसे शाप लगा हो, ब्याज लेने वाला, गूंगा, दुष्ट, कठोर, चोर, क्रोधी, पतित, केदी, बड़ी हिंसा और बंधन से जो जीविका करते हैं॥४७॥ नट, कलवार, उन्मदु (उत्कट) उन्मत्त, व्रात्य (जिसका जनेऊ न हुआ हो) जिसने व्रत को छोड़ दिया हो, गूंगा, नास्तिक, निर्लज्ज, चुगल, व्यसनी, (जो मदिरा आदि पीता हो) ॥ ४८ ॥ कन्जूस, और स्त्रियों ने जिसे जीता हो, असज्जन, सबका निन्दक, असमर्थ और कीर्तिवाले होकर भी जो राजा और देवता के द्रव्य को मार ले ॥ ४९ ॥ शय्या, आसन, संसर्ग, व्रत कर्म इन में जो किसी प्रकार दूषित हों और श्रद्धाहीन पतित भ्रष्टाचार आदि इन सब नट आदि के ॥ ५० ॥ अन्न को धर्मनिष्ठ पुरुष कदापि न खावे क्योंकि जो