भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

२४ व्यासस्मृतिः ॥

स्वाद्वन्नमश्नन्नस्वादु ददद्गच्छत्यधोगतिम् ॥ ४४ ॥ गर्भिण्यातुरभृत्येषु बालवृद्धातुरादिषु । बुभुक्षितेषुभुञ्जानो गृहस्थोऽप्राप्तिकिल्बिषम् ॥ ४५ ॥ नाद्याद्दूढ्रेनपाकाद्यं कदाचिदनिमन्त्रितः । निमन्त्रितोऽपिनिन्द्येन प्रत्याख्यानं द्विजोऽर्हति ॥ ४६ ॥ शूद्राभिशस्तवार्धुष्या वाग्दुष्टक्रूरतस्कराः । क्रुद्धापविद्धबद्धोग्रवधबन्धनजीविनः ॥ ४७ ॥ शैलूषशौण्डिकोन्नद्धोन्मत्तव्रात्यव्रतच्युताः । नग्ननास्तिकनिर्लज्जपिशुनव्यसनान्विताः ॥ ४८ ॥ कदर्यस्त्रीजितानाय्यैपरवादकृतानराः । अनीशाःकीर्तिमन्तोऽपि राजदेवस्वहारकाः ॥ ४९ ॥ शयनासनसंसर्गव्रतकर्मादिदूषिताः । अश्रद्दधानाःपतिता भ्रष्टाचारादयश्चये ॥ ५० ॥ अभोज्यान्नाःस्युरन्नादो यस्ययःस्यात्स तत्समः ।


अधोगति (नरक) को प्राप्त होता है ॥४४॥ गर्भवती स्त्री, रोगी भृत्य, बालक, और वृद्धता से दुःखित इनके भूखे बैठे रहते जो गृहस्थ भोजन करता है वह पाप का भागी होता है। इससे गर्भवती आदिको पहिले भोजन देवे। निमन्त्रण दिये विना अर्थात् बिन बुलाये किसी के पङ्क्ति भोजनादि में कदापि न खावे और न इच्छा करे। यदि कोई निन्दित पुरुष निमन्त्रण भी देवे तो भी ब्राह्मण उसे स्वीकार न करे ॥ ४६ ॥ शूद्र, जिसे शाप लगा हो, ब्याज लेने वाला, गूंगा, दुष्ट, कठोर, चोर, क्रोधी, पतित, केदी, बड़ी हिंसा और बंधन से जो जीविका करते हैं॥४७॥ नट, कलवार, उन्मदु (उत्कट) उन्मत्त, व्रात्य (जिसका जनेऊ न हुआ हो) जिसने व्रत को छोड़ दिया हो, गूंगा, नास्तिक, निर्लज्ज, चुगल, व्यसनी, (जो मदिरा आदि पीता हो) ॥ ४८ ॥ कन्जूस, और स्त्रियों ने जिसे जीता हो, असज्जन, सबका निन्दक, असमर्थ और कीर्तिवाले होकर भी जो राजा और देवता के द्रव्य को मार ले ॥ ४९ ॥ शय्या, आसन, संसर्ग, व्रत कर्म इन में जो किसी प्रकार दूषित हों और श्रद्धाहीन पतित भ्रष्टाचार आदि इन सब नट आदि के ॥ ५० ॥ अन्न को धर्मनिष्ठ पुरुष कदापि न खावे क्योंकि जो

भाषाऽर्थसहिता ॥ २५

नापितान्वयमित्रार्द्ध सीरिणोदासगोपकाः ॥ ५१ ॥ शूद्राणामप्यमीषान्तु भुक्त्वाऽन्नंनैवदुष्यति । धर्मेणान्योन्यभोज्यान्ना द्विजास्तुविदितान्वयाः ॥ ५२ ॥ स्ववृत्तोपार्जितंमेध्यमाकरस्थममाक्षिकम् । अश्वलीढमगोघ्रातमस्पृष्टंशूद्रवायसैः ॥ ५३ ॥ अनुच्छिष्टमसंदुष्टमपर्युषितमेवच । अम्लानञ्चाह्यमन्नाद्यमार्य्यंनित्यंसुसंस्कृतम् ॥ ५४ ॥ कृसरापूपसंयावपायसंशष्कुलींतिच । नाश्रीयाद्ब्राह्मणोमांसमनियुक्तःकथञ्चन ॥ ५५॥ क्रतौश्राद्धेनियुक्तोवा अनश्नन्पततिद्विजः । मृगयोपार्जितंमांसमभ्यर्च्य्यापितृदेवताः ॥ ५६ ॥ क्षत्रियाद्द्वादशानन्तत्क्रीत्वावैश्योऽपिधर्मतः ।


जिसके अन्न को खाता है वह उसी के समान हो जाता है। नाई, वंश पर-म्परा से मित्र, अर्द्धसीरी (जिसके आधे साझे में खेती होती हो) दास (कहार) और गोप ॥ ५१ ॥ इतने शूद्रों के भी अन्न को खाकर दोष भागी नहीं होता। प्रसिद्ध हैं वंश जिन का ऐसे ब्राह्मण परस्पर भोज्यान्न (वह उसके अन्न को और वह उस के को खावे) कहे हैं ॥ ५२ ॥ अपनी जीविका से जो संचय किया हो, शहद को छोड़कर आकर (खान) की वस्तु, घोड़े का तथा गौ का उच्छिष्ट किया न हो, जिस को शूद्र ने वा कौवे ने न छुवा हो वे सब अन्न पवित्र हैं ॥ ५३ ॥ जो उच्छिष्ट न हो जिसको दोष न लगाया हो, बासी न हो, म्लान (दुर्गन्ध) न हो, ऐसे भली प्रकार बनाये अन्न आदि को नित्य खावे ॥ ५४ ॥ खिचड़ी, मालपूवे, मोहनभोग, खीर, पूरी इनको भी खा लेवे। यज्ञ में किसी ऋत्विज् के काम पर नियुक्त हुए विना ब्राह्मण कभी मांस न खावे ॥ ५५ ॥ यज्ञ और श्राद्ध में नियुक्त किया हुआ ऋत्विगादि अधिकार स्वीकार करके यदि ब्राह्मण मांस न खावे तो भी पतित हो जाता है। शिकार करके लाये हुए मांस को पितर और देवताओं का पञ्चमहायज्ञों द्वारा पूजन करके ॥५६॥ ११ भागों को क्षत्रिय और उस में से बारहवें भाग को

२६ व्यासस्मृतिः ॥

द्विजोजग्ध्वावृथामांसं हत्वाप्यविधिनापशून् ॥ ५७ ॥ निरयेष्वक्षयंवासमाप्नोत्याचन्द्रतारकम् । सर्वान्कामान्समासाद्य फलमश्वमखस्यच ॥ ५८ ॥ मुनिसाम्यमवाप्नोति गृहस्थोऽपिद्विजोत्तमः । द्विजभोज्यानिगव्यानि माहिष्याणिपयांसिच ॥ ५९ ॥ निर्दशासन्धिसामन्धि वत्सवन्तीपयांसिच । पलाण्डुंश्रेतवृन्ताकं रक्तमूलकमेवच ॥ ६० ॥ गृञ्जनारण्यताम्बूलगुञ्जाफलानिच । अकालोत्थफलान्येतान् द्विजोजग्ध्वैन्दवञ्चरेत् ॥ ६१ ॥ वाक्पूतिमविज्ञातमन्यपीडनकार्यपि । भूतेभ्योऽप्रदत्त्वाच तदन्नंगृहिणोदहेत् ॥ ६२ ॥ हेमराजतकांस्येषु पात्रेष्वद्यात्सदागृही । अभावेसाधुगन्धेषु लोध्रद्रुमलतासुच ॥ ६३ ॥

मोल लेकर वैश्य भी खा सकता है । ब्राह्मण वृथा मांस (जो यज्ञ वा श्राद्ध का न हो) को खाकर और वेदोक्त विधि के बिना पशुओं को मार कर ॥ ५७ ॥ नरक में तब तक बसता है जब तक चन्द्रमा और तारे विद्यमान हैं । सब कामना और अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त होकर ॥ ५८ ॥ गृहस्थ ब्राह्मण भी मुनियों के तुल्य तपस्वी होजाता है। ब्राह्मणों के भोजन योग्य गौ और भैंस के दूध होते हैं ॥ ५९ ॥ और वह दूध खाने योग्य है जो ब्याने से दश दिन के पीछे का हो, सन्धिनि नाम गर्मवती गौ का वा भैंस का न हो, बछड़े वा बछिया वाली का हो किन्तु जिस का बच्चा मर जाय उस का दूध अभक्ष्य है और पलाण्डु (प्याज) सफेद बैंगन और लाल मूली वा शलगम ॥६०॥ गाजर, वृक्ष का लाल गोंद गूलर के फल, बिना समय के फल, इन को ब्राह्मण खावे तो चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित्त करे ॥ ६१ ॥ वाणी से दूषित (गोभी आदि) और जिसे न जानता हो कि कैसा है, जिस से दूसरे को दुःख हो, इन को भी खाकर चान्द्रायणव्रत प्रायश्चित करे । भूतों को बिना दिये अर्थात् भूतयज्ञ किये बिना जो अन्न खाता है वह अन्न गृहस्थ को दग्ध करता है ॥ ६२ ॥ सुवर्ण चांदी कांसे के पात्रों में गृहस्थ पुरुष सदा भोजन करे पात्र न हो तो अच्छे गंध वाले लोध्र आदि वृक्षों के पत्तों में खाये ॥ ६३ ॥

भाषार्थसहिता ॥ २१

पलाशपद्मपत्रेषु गृहस्थोभोक्तुमर्हति ।
ब्रह्मचारीयतिश्चैव श्रेयोयद्भोक्तुमर्हति ॥ ६४ ॥
अभ्युक्ष्यान्नंनमस्कारैर्भुविदयाद्वलित्रयम् ।
भूपतयेभुवनपतये भूतानांपतयेतथा ॥ ६५ ॥
अपःप्राश्यततःपश्चात् पञ्चप्राणाहुतीःक्रमात् ।
स्वाहाकारेणजुहुयाच्छेषमद्याद्यथासुखम् ॥ ६६ ॥
अनन्यचित्तोभुञ्जीत वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् ।
आतृप्तेरन्नमश्नीयादशून्यंपात्रमुत्सृजेत् ॥ ६७ ॥
उच्छिष्टमन्नमुद्धृत्य ग्रासमेकं भुवि क्षिपेत् ।
आचान्तःसाधुसङ्गेन सद्विद्यापठनेनच ॥ ६८ ॥
पुरावृत्तकथाभिश्च शेषाहमतिवाहयेत् ।

अथवा ढांक वा कमल के पत्तों की पत्तल पर भोजन करे, ब्रह्मचारी और यति ( संन्यासी ) भी उक्त पत्तों में खाय तो श्रेष्ठ है किन्तु धातु पात्र उन के योग्य नहीं हैं ॥ ६४ ॥ अन्न के सब ओर प्रदक्षिण क्रम से जल सेचन करके नमस्कार सहित पृथ्वी में तीन बलि नाम ग्रास प्राक्संस्थ धरे जैसे-भूप-तये नमः । भुवनपतये नमः । भूतानांपतये नमः ॥ ६५ ॥ फिर (ओ३ममृतोपस्तर-णमसि स्वाहा) इस मन्त्र से आचमन करके पांच (१) प्राणों के लिये पांच आ-हुति स्वाहा कहकर क्रम से मुख में देवे और फिर सुखपूर्वक शेष अन्न को खावे ॥ ६६ ॥ मौन होकर अन्न की निन्दा न करता हुआ मनुष्य एकाग्र मन करके तृप्ति पर्यन्त भोजन करे और पात्र को खाली न छोड़े किन्तु कम से कम एक दो ग्रास पात्र में अवश्य छोड़ देवे ॥ ६७ ॥ उच्छिष्ट अन्न में से एक ग्रास उठा कर भोजनपात्र से बांयी ओर ( मद्भुक्तोच्छिष्ट०) मन्त्र पढ़ के पितृ तीर्थ से धरे इस का नाम चित्राहुति है । फिर (अमृतापिधान०) मन्त्र से आचमन करके साधुओंकी संगति, उत्तम विद्याके पढ़ने ॥६८॥ और प्राचीन इतिहासोंकी उत्तम कथाओं से शेष दिनको बितावे और मृत्यों (स्त्री पुत्रादि) सहित गृहस्थ पुरुष


(१) - प्राणाय स्वाहा । (१) - ओं अपानाय स्वाहा । (२) - ओं व्यानाय स्वाहा । (३) - ओं उदानाय स्वाहा । (४) - ओं समानाय स्वाहा ॥ ५--

२८ व्यासस्मृतिः ॥

सायंसन्ध्यामुपासीत हुत्वाग्निंभृत्यसंयुतः ॥ ६९ ॥
आपोशानक्रियापूर्वमश्नीयादन्वहंद्विजः ।
सायमप्यतिथिःपूज्यो होमकालागतोद्विजः ॥ ७० ॥
श्रद्धयाशक्तितोनित्यं श्रुतंहन्यादपूजितः ।
नातितृप्तउपस्पृश्य प्रक्षाल्यचरणौशुचिः ॥ ७१ ॥
अप्रत्यगुत्तरशिराः शयीतशयनेशुभे ।
शक्तिमानुचितेकाले स्नानंसन्ध्यांनहापयेत् ॥ ७२ ॥
ब्राह्मेमुहूर्तेचोत्थाय चिन्तयेद्धितमात्मनः ।
शक्तिमान्मतिमान्नित्यं व्रतमेतत्समात्रेत् ॥ ७३ ॥
इतिश्रीवेदव्यासीयेधर्मशास्त्रेगृहस्थान्हिकोनामतृतीयोध्यायः॥३॥
इतिव्यासकृतंशास्त्रं धर्मसारसमुच्चयम् ।
आश्रमेयानिपुण्यानि मोक्षधर्माश्रितानिच ॥ १ ॥
गृहाश्रमात्परोधर्मो नास्तिनास्तिपुनःपुनः ।


आग्निहोत्र करके सायकाल का सन्ध्या करे ॥६९॥ आपोशान क्रिया (भोजन से पहिले उपस्ताररूप आचमन) करके द्विज पुरुष नित्य भोजन करे। होम के समय आये ब्राह्मण अतिथि का सायंकाल में भी सदैव पूजन करे ॥७०॥ श्रद्धा और शक्ति के अनुसार यदि अतिथि का पूजन न किया जाय तो वह वेदपाठ को नष्ट ( निष्फल ) करता है । अत्यन्त तृप्त नहो किन्तु लघु भोजन कर आचमन करके चरणों को धोकर ॥ ७१ ॥ उत्तम शय्या पर सोवे परन्तु पश्चिम वा उत्तर दिशा में शिर न करै । समर्थ (नीरोग) हो तो सूर्योदय के समय स्नान. सन्ध्या को कभी न छोड़े ॥ ७२ ॥ ब्राह्म मुहूर्त [ ४ घड़ी रात से ] में उठकर अपने हित की चिन्ता करे। शक्ति और बुद्धि वाला मनुष्य इस व्रत (नियम) को नित्य २ सेवन करे ॥ ७३ ॥

यह वेदव्यासीय धर्मशास्त्र में गृहस्थ के नित्यकर्म विषय में तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥३॥

धर्म के सार का है संग्रह जिस में ऐसा यह वेदव्यास जी का बनाया धर्मशास्त्र है । सब आश्रमों में जो पुण्य हैं और जो पुण्य मोक्ष के धर्मों में हैं वे सब गृहाश्रम में प्राप्त हो सकते हैं ॥१॥ सब आश्रमों में गृहस्थ आश्रम

भाषार्थसहिता ॥ २९

सर्वतीर्थफलंतस्य यथोक्तंयस्तुपालयेत् ॥ २ ॥ गुरुभक्तोभृत्यपोषी दयावाननसूयकः । नित्यजापीचहोमोच सत्यवादीजितेन्द्रियः ॥ ३ ॥ स्वदारेयस्यसन्तोषः परदारनिवर्त्तनम् । अपवादोऽपिनोयस्य तस्यतीर्थफलगृहे ॥ ४ ॥ परदारान्परद्रव्यं हरतेयोदिनेदिने । सर्वतीर्थाभिषेकेण पापंतस्यननश्यति ॥ ५ ॥ गृहेषुसेवनीयेषु सर्वतीर्थफलंततः । अन्नदस्यत्रयोभागाः कर्त्ताभागेनलिप्यते ॥ ६ ॥ प्रतिश्रयंपादशौचं ब्राह्मणानांचतर्पणम् । नपापंसंस्पृशेत्तस्य वलिंभिक्षांददांतियः ॥ ७ ॥ पादोदकंपाइघृतं दीपमन्नंप्रतिश्रयम् ।


से परे धर्म नहीं है। जो गृहस्थ पुरुष अपने धर्म का पूरा २ शास्त्रानुसार पालन करे उसको संपूर्ण तीर्थों का फल घर में ही मिल जाता है ॥२॥ गुरु का भक्त, स्त्री पुत्रादि भृत्योंका पालन करने वाला, दया करने वाला, जो किसीकी निन्दा नहीं करता जो नित्य २ जप और होम करता सत्य बोलता और जितेन्द्रिय रहता है ॥ ३ ॥ अपनी स्त्री में ही जिस को सन्तोष हो, अन्य की स्त्री से निवृत्ति हो, जिस की निन्दा बुराई कोई न करता हो उस मनुष्य को घर में भी तीर्थ का फल मिलता है ॥ ४ ॥ पराई स्त्री और पराये धन को जो दिन पर दिन भोगता है सब तीर्थों के स्नान से भी उस का पाप नष्ट नहीं होता ॥ ५ ॥ तिस से सेवन करने योग्य उत्तम धर्मों वाले घरों में सब तीर्थों का फल होता है । पुण्य के तीन भाग उस को मिला करते हैं कि जिस के अन्न से श्राद्ध आदि किया जाय और जो उक्त कर्मों को करता है उस को एक भाग फल मिलता है ॥ ६ ॥ नम्रता, वा पगों का धोना, ब्राह्मणों को तृप्त करना वलि-वैश्वदेव, और भिक्षा देना इन कामों को जो नित्य २ करता है उस मनुष्य को पाप नहीं लगता ॥ ७ ॥ पग धोने का जल, पादघृत ( जूता वा खड़ामू-पादुका, ) दीपक, अन्न, घर,ये वस्तु जो ब्राह्मणों को देता है उस के पास

३० व्यासस्मृतिः ॥

योददातिब्राह्मणेभ्यो नोपसर्पतितंयमः ॥ ८ ॥
विप्रपादोदकक्लिन्ना यावत्तिष्ठतिमेदिनी ।
तावत्पुष्करपात्रेषु पिवन्तिपितरोऽमृतम् ॥ ९ ॥
यत्फलंकपिलादाने कार्तियांज्येष्ठपुष्करे ।
तत्फलंऋषयःश्रेष्ठा विप्राणांपादशौचने ॥ १० ॥
स्वागतेनाग्नयःप्रीता आसनेनशतक्रतुः ।
पितरःपादशौचेन अन्नाद्येनप्रजापतिः ॥ ११ ॥
माता पित्रोः परंतीर्थं गङ्गागावोविशेषतः ।
ब्राह्मणात्परमंतीर्थं नभूतन्नभविष्यति ॥ १२ ॥
इन्द्रियाणिवशीकृत्य यत्रयत्रवसेन्नरः ।
तत्रतत्रकुरुक्षेत्रं नैमिषंपुष्कराणिच ॥ १३
गङ्गाद्वारंचकेदारं संन्निहत्यांतथैवच ।
एतानिसर्वतीर्थानि कृत्वापापैःप्रमुच्यते ॥ १४ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच चातुर्वर्ण्यस्यभोद्विजाः ।


यमराज नहीं आता ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों के पगों के जल से गीली की हुई पृथ्वी जब तक रहती है तब तक पुष्कर तीर्थ के पत्तों में पितर लोग अमृत पीते हैं ॥ ९ ॥ जो फल कपिला गौ के दान का है और जो फल कार्तिक की पूर्णिमा को पुष्कर के स्नान का है । हे श्रेष्ठ ऋषि लोगो ! वही फल ब्राह्मणों के पग धोने में हैं ॥ १० ॥ विद्वान् ब्राह्मणों वा विरक्त संन्यासियों के स्वागत (आपने बड़ी कृपाकी आइये ! इत्यादि कहना) से अग्नि, आसन के देने से इन्द्र, पग धोने से पितर, और अन्न आदि के देने से ब्रह्मा, प्रसन्न होते हैं ॥ ११ ॥ माता पिता की सेवा करना परम तीर्थ है । विशेष कर गङ्गा गौ तीर्थ हैं और ब्राह्मणों से अधिक तीर्थ न हुआ न होगा ॥ १२ ॥ जो मनुष्य इन्द्रियों को वश में करके जिस २ आश्रम में बसता है उस के लिये वहां २ कुरुक्षेत्र-नैमिष- और पुष्कर ॥ १३ ॥ हरिद्वार, केदार, संनिहत्या-इत्यादि तीर्थ हैं वह इन सब तीर्थों को करके सब पापों से छूट जाता है ॥ १४ ॥

हे ऋषियो ब्राह्मणो ! चारों वर्णों और आश्रमों के दान धर्म को व्यास

भाषाथंसहिता ॥ ३१

दानधर्मंप्रवक्ष्यामि यथाव्यासेनभाषितम् ॥ १५ ॥ यद्ददातिविशिष्टेभ्यो यच्चाश्नातिदिनेदिने । तद्भवित्तमहंमन्ये शेषंकस्यापिरक्षति ॥ १६ ॥ यद्ददातियदश्नाति तदेवधनिनोधनम् । अन्यैमृतस्यक्रीडन्ति दारैरपिधनैरपि ॥ १७ ॥ किंधनेनकरिष्यन्ति देहिनोऽपिगतायुषः । यद्दर्द्धयितुमिच्छन्तस्तच्छरीरमशाश्वतम् ॥ १८ ॥ अशाश्वतानिमित्राणि विभवोनैवशाश्वतः । नित्यंसन्निहितोमृत्युः कर्तव्योधर्मसंग्रहः ॥ १९ ॥ यदिनामनधर्माय नकामायनकीर्तये । यत्परित्यज्यगन्तव्यं तद्धनंकिनदीयते ॥ २० ॥ जीवन्तिजीविनोयस्य विप्रामित्राणिबान्धवाः । जीवितंसफलंतस्य आत्मार्थेकोनजीवति ॥ २१ ॥ कृमयःकिंनजीवन्ति भक्षयन्तिपरस्परम् ।


जी के कहने के अनुसार कहते हैं ॥ १५ ॥ जो उत्तम विद्वान् धर्मात्माओं को देता है वा नित्य २ जो खाता है उस को ही उस का धन मानते हैं और शेष किसी अन्य के ही धन की वह रक्षा करता है ॥१६॥ जितना दान देता है या जितना भोग कर लेता है वही धनी का धन है। क्योंकि उस के मर जाने पर उस के स्त्री तथा धन से अन्य लोग ही आनन्द भोगते हैं ॥१७॥ वृद्धहुए देहधारी मनुष्य धन से क्या करेंगे, जिस शरीर को धन से बढ़ाया वा हृष्ट पुष्ट किया चाहते हैं वह भी अनित्य है ठहरने वाला नहीं मित्र और धन सदैव नहीं रहते और मृत्यु नित्य ही समीप में खड़ा है इस से धर्म का सञ्चय करना चाहिये ॥ १८ ॥ जो धन धर्म के लिये काम (भोग) के लिये और कीर्ति के लिये नही और जिस धन को यहां छोड़कर परलोक जाना है उस धन को क्यों नहीं दिया जाता ? ॥ २० ॥ जिस मनुष्य के जीवित रहने से ब्राह्मण, मित्र, बांधव (कुटुम्बी) लोगों की जीविका (उपकार) हो उस का जीवन सफल है। अपने लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ २१ ॥ कृमिकीट

३२ व्यासस्मृतिः ॥

परलोकाविरोधेन योजीवतिसजीवति ॥ २२ ॥
पशवोऽपिहिजीवन्ति केवलात्मोदरम्भराः ।
किंकायेनसुगुप्तेन बलिनाचिरजीविना ॥ २३ ॥
ग्रासादद्धंमपिग्रासमर्थिभ्यःकिंनदीयते ।
इच्छानुरूपोविभवः कदाकस्यभविष्यति ॥ २४ ॥
अदातापुरुषस्त्यागी धनंसन्त्यज्यगच्छति ।
दातारंकृपणंमन्ये मृतोऽप्यर्थंनमुञ्चति ॥ २५ ॥
प्राणनाशस्तुकर्तव्यो यःकृतार्थोनसोमृतः ।
अकृतार्थस्तुयोमृत्युं प्राप्तःखरसमोहिसः ॥ २६ ॥
अनाहूतेषुयद्दत्तं यच्चदत्तमयाचितम् ।
भविष्यतियुगस्यान्तस्तस्यान्तोनभविष्यति ॥ २७ ॥


पतङ्गादि भी क्या जीवन का निर्वाह नहीं करते ? कि जो एक दूसरे को खा लेते हैं। परन्तु परलोक के लिये दान पुण्य करता हुआ जो पुरुष जीता है उसी का जीवन सार्थक है ॥ २२ ॥ केवल अपने पेट भरने वाले तो पशु भी जीते हैं। भली प्रकार रक्षा किये बलवान् बहुत जीने वाले शरीर से मनुष्यों को क्या फल है ? ॥ २३ ॥ ग्राम वा आधाग्राम अन्न मांगने वाले भिक्षुक को क्यों नहीं देता ? । इच्छा के अनुसार धन कब किस के हो जायगा ? अर्थात् इतना धन कभी किसी के न होगा जिस से तृष्णा पूरी हो जावे ॥ २४ ॥ हमारी राय में किसी को कुछ भी न देने वाला पुरुष ही त्यागी क्योंकि वह धन को छोड़ कर मर जाता है। परन्तु हम दाता को कृपण मानते हैं क्योंकि दाता मर कर भी धन को नहीं छोड़ता अर्थात् मरे पर भी उसे धन दान का पुण्य फल उत्तम ऐश्वर्य भोग मिलता है ॥ २५ ॥ प्राणीं का नाश तो होना ही है परन्तु अपना काम दान पुण्यादि धर्म करके जो मरा है वह जानी नहीं मरा और जो अकृतार्थ ( धर्म किये बिना ) मरता है वह गधे के समान है ॥ २६ ॥ बिन बुलाये ब्राह्मण के घर जाकर और बिन मांगे जो दान दिया जाता है युग नाम काल का तो अन्त होगा परन्तु उस दान के फल का अन्त नहीं होगा ॥ २७ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ३६

मृतवत्सायथागौश्च कृष्णालोभेनदुह्यते । परस्परस्यदानानि लोकयात्रानधर्मतः ॥ २८ ॥ अदृष्टेचाशुभेदानं भोक्तारंचनदृश्यते । पुनरागमनंनास्ति तत्रदानमनन्तकम् ॥ २९ ॥ मातापितृषुयद्दद्याद् भ्रातृषुश्वशुरेषुच । जायापत्येषुयद्दद्यात् सोनन्तःस्वर्गसंक्रमः ॥ ३० ॥ पितुःशतगुणं दानं सहस्रंमातुरुच्यते । भगिन्यांशतसाहस्रं सोदरेदत्तमक्षयम् ॥ ३१ ॥ इन्दुक्षयःपिताज्ञेयो माताचैवदिनक्षयः । संक्रांतिर्भगिनीचैव व्यतिपातःसहोदरः ॥ ३२ ॥ अहन्यहनिदातव्यं ब्राह्मणेपुमुनीश्वराः ।


मर गया है बछड़ा जिस का ऐसी काली गौ को जैसे दूध के लोभ से दुहते हैं अर्थात् बच्चा मर जाने पर अथवा गभिन [ गर्भिणी ] हो जाने पर गौ को दुहना शास्त्र से निषिद्ध है। वह दूध भी अभक्ष्य है। इसी प्रकार परस्पर का जो दान (रीति वा व्योहार) है वह लोक रीति है धर्म नहीं ॥२८॥
जो मनुष्य पाप को न देखकर ( अर्थात् किसी पाप के नाश के लिये न दे ) वा दान के भोक्ता को न देखे (यह न चाहे कि इस दान का फल मुझे मिले) और यह भी न चाहे कि फिर मैं जगत् में आऊंगा ऐसे समय में दान का फल अनन्त है अर्थात् किसी कामना से जो न किया जाय वही दान सब से उत्तम है ॥२९॥
माता पिता भाई श्वशुर स्त्री पुत्र वा पुत्री इन को जो दिया जाय वह भी ऐसे स्वर्ग में पहुंचाता है जिस का अन्त नहीं है ॥ ३० ॥
पिता को देना सौगुना, माता को हजार गुना, भगिनी ( बहिन ) को देना लाख गुना होता है और भाई को जो दिया जाय उस का कभी भी नाश नहीं होता किन्तु उस का अक्षय फल है ॥ ३१ ॥
पिता को देने से अमावास्या के दान के तुल्य पुण्य होता, माता को देने से जिस तिथि की हानि हो उस के तुल्य, बहन को देने से संक्रान्ति के तुल्य और सगे भाई को देने से व्यतीपात योग में दिये दान के तुल्य पुण्य होता है ॥ ३२ ॥
हे मुनीश्वरो ! सुपात्र ब्राह्मण को नित्य २ दान देना चाहिये क्योंकि जो कभी कोई तपस्वी सुपात्र

३४ व्यासस्मृतिः ॥

आगमिष्यतियत्पात्रं तत्पात्रंतारयिष्यति ॥ ३३ ॥ किञ्चिद्वेदमयंपात्रं किञ्चित्पात्रंतपोमयम् । पात्राणामुत्तमंपात्रं शूद्रान्नंयस्यनोदरे ॥ ३४ ॥ यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेचापिगुणान्वितः । गुणान्वितायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ ३५ ॥ देवद्रव्यविनाशेन ब्रह्मस्वहरणेनच । कुलान्यकुलतायान्ति ब्राह्मणातिक्रमेणच ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति विप्रेवेदविवर्जिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ३७ ॥ सन्निकृष्टमधीयानं ब्राह्मणंयोव्यतिक्रमेत् । भोजनेचैवदानेच हन्यात्त्रिपुरुषंकुलम् ॥ ३८ ॥ यथाकाष्ठमयोहरती यथाचर्ममयोमृगः ।


सिद्ध योगी महात्मा आजायगा वह दाता को संसारसागर से पार कर देगा ॥ ३३ ॥ कोई सुपात्र तो वेदपाठी वा कोई तपस्वी होता है और सब सुपात्रों में उत्तम सुपात्र वह है जिस के पेट में शूद्र का अन्न न गया हो ॥ ३४ ॥ जिस के घर के समीप में तो मूर्ख ब्राह्मण हो और गुणी सुपात्र दूर हो वह मनुष्य गुणी ब्राह्मण को देवे मूर्ख के उल्लंघन करने में कुछ दोष नहीं है ॥३५॥ किसी देवता के मन्दिर सम्बन्धी द्रव्य का नाश करने से, ब्राह्मण के धन को किसी प्रकार मारलेने से और ब्राह्मण का उल्लंघन-अपमान (तिरस्कार) करने से अच्छे कुल भी पतित नीच हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ वेद से हीन मूर्ख निन्दित कुपात्र ब्राह्मण का [दान देके आदर सत्कार न करना रूप] उल्लंघन, उल्लंघन नहीं है क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़कर भस्म में होम नहीं किया जाता है। अर्थात् जैसे भस्म को छोड़ कर प्रज्वलित अग्नि में होम करना उचित है वैसे ही मूर्ख ब्राह्मण का उल्लंघन [छोड़] कर विद्वान् को देना चाहिये ॥३७॥ भोजन और दान में समीप के विद्वान् ब्राह्मण का जो उल्लंघन करता है वह तीन पीढ़ी तक अपने कुल को नष्ट करता है ॥३८॥ जैसा काठ का हाथी और जैसा चाम का मृग होता वैसा ही बिना पढ़ा मूर्ख ब्राह्मण ये तीनों नाम मात्र ही हाथी, मृग और ब्राह्मण कहाने वाले हैं अर्थात्

भाषार्थसहिता ॥ ३५

यश्चविप्रोऽनधीयानस्त्रयस्तेनामधारकाः ॥ ३९ ॥
ग्रामस्थानंयथाशून्यं यथाकूपश्चनिर्जलः ।
यश्चविप्रोऽनधीयानस्त्रयस्तेनामधारकाः ॥ ४० ॥
ब्राह्मणेषुचयद्दत्तं यच्चवैश्वानरेहुतम् ।
तद्धनं धनमाख्यातं धनंशेषंनिरर्थकम् ॥ ४१ ॥
समोहिब्राह्मणेदानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे ।
सहस्रगुणमाचार्ये ह्यनन्तंवेदपारगे ॥ ४२ ॥
ब्रह्मबीजसमुत्पन्नो मन्त्रसंस्कारवर्जितः ।
जातिमात्रोपजीवीच सभवेद्ब्राह्मणःसमः ॥ ४३ ॥
गर्भाधानादिभिर्मन्त्रैर्वेदोपनयनेनच ।
नाध्यापयतिनाधीते सभवेद्ब्राह्मणब्रुवः ॥ ४४ ॥
अग्निहोत्रीतपस्वीच वेदमध्यापयेच्च यः ।


निरर्थक हैं ॥३९॥ जैसा ग्राम का स्थान शून्य और जैसा जल से हीन कूप होता वैसा ही बिन पढ़ा मूर्ख ब्राह्मण ये तीनों नाम के ही धारण करने वाले हैं अर्थात् वास्तव में वे सच्चे ग्राम, कूप और ब्राह्मण नहीं हैं ॥ ४० ॥

जो धन ब्राह्मणों को दान दिया वा जो अग्नि में होम किया है वही धन कहाता है और शेष धन इष्ट साधक न होने से व्यर्थ है ॥ ४१ ॥ सम ब्राह्मणको जितना दान दिया जाय वह सम नाम उतना ही फलदायक होता है और ब्राह्मणब्रुव को जो दान दिया जाय उस का दूना फल, आचार्य को हजार गुना और वेदपारग को दिया दान अनन्त फलवाला होता है ॥ ४२ ॥ जो ब्राह्मण के बीज से ब्राह्मण ब्राह्मणी माता पिता से पैदा हो और वेद मन्त्रों से जिस का उपनयन जातकर्मादि संस्कार न हुआ हो अर्थात् गायत्री से भी हीन हो और ब्राह्मण जाति होने से ही जीविका करे वह ब्राह्मण सम कहाता है ॥ ४३ ॥ जिस का गर्भाधान आदि के मन्त्रों से और वेदोक्त यज्ञोपवीत से संस्कार तो हुआ हो और गायत्री भी जानता हो परन्तु वेद को न पढ़े न पढ़ावे उस को ब्राह्मणब्रुव कहते हैं ॥ ४४ ॥ जो अग्निहोत्री हो, तपस्वी हो, कल्पवेदाङ्ग और रहस्य नाम उपनिषदों के सहित वेदों को जो बिना वेतन लिये

३६ व्यासस्मृतिः ॥

सकल्पंसरहस्यंच तमाचार्यंप्रचक्षते ॥ ४५ ॥ इष्टिभिःपशुबन्धैश्च चातुर्मास्यैस्तथैवच । अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्यनेकेष्टंसइष्टवान् ॥ ४६ ॥ मीमांसतेचयोवेदान् षड्भिरङ्गैःसविस्तरैः । इतिहासपुराणानि सम्भवेद्वेदपारगः ॥४७ ॥ ब्राह्मणाथेनजीवन्ति नान्येऽवर्णाःकथञ्चन । ईदृक्पथमवस्थाय कोऽन्यस्तंन्यक्तुमुत्सहेत् ॥ ४८ ॥ ब्राह्मणःसंभवेनैव देवानामतिदैवतम् । प्रत्यक्षंचैवलोकस्य ब्रह्मतेजोहिकारणम् ॥ ४६ ॥ ब्राह्मणस्यमुखंक्षेत्रं निरूपरमखण्डकम् । वापयेत्तत्रबीजानि साकृषिःसार्वकामिकी ॥ ५० ॥ सुक्षेत्रेवापयेद्वीजं सुपात्रेदापयेद्धनम् । सुक्षेत्रेचसुपात्रेच क्षिप्तंनैवविदूष्यति ॥ ५१ ॥


धर्मार्थ पढ़ावे उसे आचार्य कहते हैं ॥ ४५ ॥ दर्शपूर्णमासादि इष्टि, पशुबंध, चातुर्मास्य, और अग्निष्टोम आदि यज्ञों से जिसने देवताओं की पूजा की उसे इष्टवान् नाम यज्ञों का करने वाला कहते हैं ॥ ४६ ॥ अनेक ग्रन्थों में विस्तृत वेद के छः अङ्ग [ व्याकरण आदि ] सहित सारे वेद और इतिहास पुराणों की जो मीमांसा नाम आन्दोलन करे उसे वेदपारग कहते हैं ॥ ४७ ॥ ब्राह्मण लोग जिस वेदोक्त मार्ग से जीविका करते हैं उस से अन्य वर्ण कभी नहीं जीविका करते ऐसे वेदमार्ग में ठहर कर ऐसा अन्य कौन है जो ब्राह्मण का परित्याग करे ॥४८॥ ब्राह्मण उत्पत्तिमात्र से ही देवताओं का भी देवता है और लोगों को ब्राह्मण का प्रभाव प्रत्यक्ष भी है उस का कारण ब्रह्मतेज ही है ॥ ४९ ॥ ऊपर और कांटों से रहित उत्तम खेत ब्राह्मण का मुख है उसी में बीज बोवे क्योंकि वही खेती सब कामना देने वाली है ॥ ५० ॥ अच्छे खेत में बीज बोवे और सुपात्र को धन देवे क्यों कि अच्छे खेत और सुपात्र में जो अन्न धन छोड़ा जाता है वह कभी भी दूषित वा व्यर्थ नहीं जाता ॥ ५१ ॥

भाषार्थसहिता ॥ ३१

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणेगृहमागते । क्रीडन्त्योषधयःसर्वा यास्यामःपरमांगतिम् ॥ ५२ ॥

नष्टशौचेव्रतभ्रष्टे विप्रेवेदविवर्जिते । दीयमानंरुदत्यन्नं भयाद्वैर्दुष्कृतंकृतम् ॥ ५३ ॥

वेदपूर्णमुखंविप्रं सुभुक्तमपिभोजयेत् । नचमूर्खंनिराहारं षड्ररात्रमुपवासिनम् ॥ ५४ ॥

यानिह्यस्यपवित्राणि कुक्षांतिष्ठन्तिभोद्विजाः । तानितस्यप्रयोज्यानि नशरीराणिदेहिनाम् ॥ ५५ ॥

यस्यदेहेसदाश्नन्ति हव्यानिन्त्रिदिवौकसः । कव्यानिचैवपितरः किम्भूतमधिकंततः ॥ ५६ ॥

यदभुङ्क्तेवेदविद्विप्रः स्वकर्मनिरतःशुचिः । दातुःफलमसंख्यातं प्रतिजन्मतदक्षयम् ॥ ५७ ॥


विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण यदि अपने घर आवे तो उस समय सब ओषधी [ अन्न आदि ] क्रीड़ा करती [आनन्द मनाती] हैं कि हम परम गति को प्राप्त होंगी ॥ ५२ ॥ शास्त्रानुकूल शुद्धि न करके मलिन रहने सन्ध्यादि कर्म को नियम से न करने वाले तथा वेद से शून्य ब्राह्मण को दिया हुआ अन्न भय से रोता है कि इस दाता ने बुरा किया जो हम को ऐसे गुण कर्म हीन मूर्ख ब्राह्मण के उदर में पहुंचाया ॥ ५३ ॥ वेद के पठन पाठन से भरा है मुख जिस का ऐसे भोजन से तृप्त ब्राह्मण को भी जिमावे और छः दिन के उपासे भी निराहार मूर्ख ब्राह्मण को न जिमावे ॥ ५४ ॥ हे ऋषि लोगो ! जिस मनुष्य का जो पवित्र वस्तु (अन्न आदि) जिस विद्वान् के उदर में ठहरे वह वस्तु ही उसको देना चाहिये अन्यथा देह धारियों का देह किसी प्रयोजन का नहीं है ॥ ५५ ॥ जिस ब्राह्मण के देह में देवता लोग हव्य और पितर लोग कव्य सदैव खाते हैं उससे परे अन्य कौन प्राणी हो सकता है ? अर्थात् उस से उत्तम अन्य कोई नहीं है ॥ ५६ ॥ वेद का ज्ञाता और अपने धर्म कर्म में तत्पर ब्राह्मण जो खाता है दाता को उसका फल असंख्य होता और जन्म जन्म में वह अक्षय अविनाशी होता है ॥ ५७ ॥

३८ व्यासस्मृतिः ॥

हस्त्यश्वरथयानानिकेचिदिच्छन्तिपण्डिताः । अहंनेच्छामिमुनयः ! कस्यैताःसस्यसम्पदः ॥ ५८ ॥ वेदलाङ्गलकृष्टेषु द्विजश्रेष्ठेषुसत्सुच । यत्पुरापातितंबीजं तस्यैताःसस्यसम्पदः ॥ ५९ ॥ शतेषुजायतेशूरः सहस्रेषुचपण्डितः । वक्ताशतसहस्रेषु दाताभवतिवानवा ॥ ६० ॥ नरणेविजयाच्छूरोऽध्ययनान्नचपण्डितः । नवक्तावाक्पटुत्वेन नदाताचार्थदानतः ॥ ६१ ॥ इन्द्रियाणांजये शूरो धर्मंचरतिपण्डितः । हितप्रियोक्तिभिर्वक्ता दातासन्मानदानतः ॥ ६२ ॥ यद्येकपङ्क्त्यांत्रिषमन्ददाति स्नेहाद्भयाद्वायदिवार्यहेतोः ।


हाथी, घोड़ा, रथ यान पालकी आदि इन को कोई पण्डित अच्छा कहते हैं परन्तु हे मुनियो ! हम नहीं चाहते क्योंकि ये हाथी आदि किस कर्म की सम्पदा [फल] हैं ? ॥५८॥ वेद रूप हल से जुते जो सत्पात्र ब्राह्मणों के उत्तम शरीर उन में जो पूर्व जन्म में बीज बोया गया था उसी खेती की ये हाथी घोड़ा आदि संपदा [ फल ] हैं ॥५९॥ सौ १०० में एक शूरवीर, हज़ार में एक पण्डित-और लाख में एक वक्ता [जो वेदादि शास्त्र के गूढ़ विषय को ठीक २ वर्णन कर सके ] होता है और लाखों में भी दाता होना दुर्लभ है ॥ ६० ॥ रण में जीत जाने से शूर नहीं होता-वेदादि के पढ़ने मात्र से पण्डित नहीं होता-वाणी की चतुराई मात्र से लिफाफे दार बनावटी व्याख्यान देने वाला वक्ता नहीं होता और धन के देने मात्र से दाता नहीं होता ॥ ६१ ॥ किन्तु इन्द्रियों को जो जीते वह शूर, शास्त्रोक्त धर्म कर्म को जो ठीक २ करै वह पण्डित-वेदानुकूल हित का उपदेश जो प्रिय वाणी से कहे वह वक्ता-और श्रद्धा तथा सन्मान पूर्वक जो दान दे वह दाता होता है ॥ ६२ ॥ स्नेह प्रीति से, भय से, वा धन आदि के लोभ से जो एक पंक्ति में बेठे ब्राह्मणों को विषम न्यूनाधिक परोसता है वा किसी को उत्तम किसी को निकृष्ट भोज्य वस्तु देता है वह ब्रह्म हत्या का दोषी मुनियों ने कहा है यह बात

भाषार्थसहिता ॥ ३९

वेदेषुदृष्टंऋषिभिश्चगीतं तद्ब्रह्महत्यांमुनयोवदन्ति ॥६३॥
ऊषरेवापितंवीजं भिन्नभाण्डेषुगोदुहम् ।
हुतंभस्मनिहव्यंच मूर्खेदानमशाश्वतम् ॥ ६४ ॥
मृतसूतकपुष्टाङ्गो द्विजःशूद्रान्नभोजने ।
अहमेवंनजानामि कांयोनिंसगमिष्यति ॥ ६५ ॥
शूद्रान्नेनोदरस्थेन यदि कश्चिन्म्रियेतयः ।
सभवेत्सूकरोनूनं तस्यवाजायतेकुले ॥ ६६ ॥
गृध्रोद्वादशजन्मानि सप्तजन्मानिसूकरः ।
श्वाचैवसप्तजन्मानि इत्येवंमनुरब्रवीत् ॥ ६७ ॥
अमृतंब्राह्मणान्नेन दारिद्र्यंक्षत्रियस्यच ।
वैश्यान्नं नतुशूद्रत्वं शूद्रान्नान्नरकंव्रजेत् ॥ ६८ ॥
यश्चभुङ्क्तेऽथशूद्रान्नं मासमेकंनिरन्तरम् ।
इहजन्मनि शूद्रत्वं मृतःश्वाचैवजायते ॥ ६९ ॥
यस्यशूद्रापचेन्नित्यं शूद्रावागृहमेधिनी ।


वेदों में भी देखी और ऋषियों ने भी कही है ॥ ६३ ॥ ऊषर में बोया बीज, फूटे पात्र में दुहा दूध, भस्म में किया होम, और मूर्ख को दिया दान ये सब अशाश्वत नाम शीघ्र नष्ट होते हैं अर्थात् निष्फल हैं ॥६४॥ मरेके सूतक में खानेसे पुष्ट हुआ है शरीर जिस का ऐसा शूद्र का भोजन करने वाला ब्राह्मण किस नीच योनि में जायगा यह हम नहीं जानते ॥ ६५ ॥ शूद्र का अन्न पेट में रहते जो ब्राह्मण मरता है वह निश्चय से या तो शूकर योनि में जन्म लेता है अथवा जिसका अन्न खाया है उस शूद्र के ही कुल में जन्म लेता है ॥६६॥ बारह जन्म तक गीध पक्षी, सात जन्म तक शूअर और सात जन्म तक कुत्ता वह शूद्रान्न भोजी ब्राह्मण होता है ऐसा मनु जी ने कहा है ॥ ६७ ॥ ब्राह्मण के अन्न से अमृत देव योनि, क्षत्रिय के अन्न से दरिद्रता, वैश्य के अन्न से शूद्र होना और शूद्र के अन्न से नरक होता है ॥ ६८ ॥ जो ब्राह्मण मनुष्य एक महीने तक निरंतर शूद्र के अन्न को खाता है वह इसी जन्म में शूद्र हो जाता है और मर कर कुत्ता की योनि में हो जाता है ॥६९॥ जिस के यहां शूद्रा स्त्री अन्न

४० व्यासस्मृतिः॥

वर्जितःपितृदेवैस्तु रौरवंयातिसद्विजः ॥ ७० ॥
भाण्डसङ्करसङ्कीर्णा नानासंकरसंकराः ।
योनिसंकरसंकीर्णा निरयंयान्तिमानवाः ॥ ७१ ॥
पङ्क्तिभेदीवृथापाकी नित्यंब्राह्मणनिन्दकः ।
आदेशीवेदविक्रेता पञ्चैतेब्रह्मघातकाः ॥ ७२ ॥
इदंव्यासमंतन्नित्य मध्येतव्यंप्रयत्नतः ।
एतदुक्ताचारवतः पतनंनैवविद्यते ॥ ७३ ॥

इति श्रीवेदव्यासीयधर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥
समाप्तं चेदं धर्मशास्त्रम् ॥

(रसोई) को बनावे अथवा जिस की स्त्री शूद्रा हो वह ब्राह्मण पितर और देवताओं से वर्जित हुआ नरक में जाता है ॥ ७० ॥ पात्रों के संकर दोष से जो संकीर्ण हैं चाहे जिसके पात्रसे खालें वा जल पीलें अनेक नीच वर्ण संकरों से जिन का मेल है और योनिसंकर दोष से भी जो संकीर्ण हैं अर्थात् चाहे जिसे विवाहलें वा नीच औरतन को भी घरमें रखलें इतने मनुष्य नरकमें जाते हैं ॥ ७१ ॥ पंक्ति में जो भेद करे [न्यूनाधिक परोसे] वृथा पाकी जो पञ्चमहा यज्ञ न करे, अपना उदर भरने के लिये ही अन्न पकावे, ब्राह्मणों की सदैव निन्दा करे और जो आज्ञा को करे (सेवक नौकर हो) और वेद को जो बेंचे अर्थात् द्रव्य के लोभ से पढ़ावे या जपे ये पांच ब्रह्महत्या के दोषी हैं ॥७२॥ इस व्यास जी के मत को यत्न से नित्य पढ़े इस में कहे हुए आचरणों को जो करता है उस का पतन (नरक में जाना) नहीं हो सकता ॥ ७३ ॥

श्रीवेदव्यासीय धर्मशास्त्र का यह चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥
और यह धर्मशास्त्र भी पूरा हो गया ॥

॥श्रीगणेशायनमः॥

अथ शंखस्मृतिप्रारम्भः॥

स्वयंभुवेनमस्कृत्य सृष्टिसंहारकारिणे ।
चातुर्वर्ण्यहितार्थाय शङ्खःशास्त्रमकल्पयत् ॥ १ ॥
यजनंयाजनंदानं तथैवाध्यापनक्रिया ।
प्रतिग्रहंचाध्ययनं विप्रकर्माणिनिर्दिशेत् ॥ २ ॥
दानंचाध्ययनंचैव यजनंचयथाविधि ।
क्षत्रियस्यचवैश्यस्य कर्मेदंपरिकीर्तितम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियस्यविशेषेण प्रजानांपरिपालनम् ।
कृषिगोरक्षवाणिज्यं विशश्चपरिकीर्तितम् ॥ ४ ॥
शूद्रस्यद्विजशुश्रूषा सर्वशिल्पानिचोपयः ।
क्षमासत्यंदमःशौचं सर्वेषामविशेषतः ॥ ५ ॥

सृष्टि और संहार करने वाले स्वयंभु ब्रह्मा जी को नमस्कार करके चारों वर्णों के कल्याण के अर्थ शंख ऋषि ने यह धर्म शास्त्र बनाया है ॥ १ ॥ यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, छः अङ्गों सहित वेद का पढ़ाना, प्रतिग्रह (दान लेना) और स्वयं साङ्ग वेद को पढ़ना ये छः कर्म ब्राह्मण के कहे हैं ॥ २ ॥ दान देना, वेद पढ़ना, विधिपूर्वक यज्ञ करना, ये तीन कर्म क्षत्रिय और वैश्य के लिये कहे हैं ॥ ३ ॥ विशेष कर क्षत्रिय का कर्म प्रजा की रक्षा करना है और वैश्य का विशेष कर्म खेती, गौओं की रक्षा, और लेन देन करना कहा है ॥ ४ ॥ शूद्र का कर्म ब्राह्मणादि तीनों द्विजों की सेवा और संपूर्ण कारीगरी कही है । क्षमा, सत्य, दम, (मन को वश में करना) शौच, ये चारों वर्णों के समान ही धर्मानुकूल कर्त्तव्य कर्म हैं ॥ ५ ॥

२ | शंखस्मृतिः ॥

ब्राह्मणःक्षत्रियोवैश्यस्त्रयोवर्णाद्विजातयः ।
तेषांजन्मद्वितीयन्तु विज्ञेयंमौञ्जिबन्धनात् ॥ ६ ॥

आचार्यस्तुपिताप्रोक्तः सावित्री जननी तथा ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां मौञ्जीबन्धनजन्मनि ॥ ७ ॥

वृत्याशूद्रसमास्तावद्विज्ञेयास्तेविचक्षणैः ।
यावद्वेदेनिजायन्ते द्विजाज्ञेयास्ततःपरम् ॥ ८ ॥

इति श्रीशाङ्खे धर्मशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

गर्भस्यस्फुटताज्ञाते निषेकःपरिकीर्तितः ।
पुरातुस्पन्दनात्कार्यं पुंसवनंविचक्षणैः ॥ १ ॥

षष्ठेष्टमेवासीमन्तो जातेवैजातकर्मच ।
आशौचेव्यतिक्रान्ते नामकर्मविधीयते ॥ २ ॥

नामधेयंचकर्त्तव्यं वर्णानांचक्षमाक्षरम् ।


ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णों को द्विजाति कहते हैं। उनका दूसरा जन्म यज्ञोपवीत के समय से जानना चाहिये ॥ ६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के यज्ञोपवीत सम्बन्धी द्वितीय जन्म में आचार्य तो पिता और गायत्री माता कही है ॥ ७ ॥ जब तक वेदोक्त संस्कार से प्रकट न हों तावत विद्वान् लोग बर्ताव से ब्राह्मणादि के बालकों को शूद्र के तुल्य जानें अर्थात् ब्राह्मणादि के साथ कहा व्यवहार उनके साथ न करें । और तदनन्तर उपनयन संस्कार हो जाने पर उनको द्विज मानना चाहिये ॥ ८ ॥

श्री शंखस्मृति के भाषानुवाद में यह प्रथम अध्याय पूरा हुआ ॥

गर्भ की जब प्रकटता से स्थिति प्रतीत हो उसको निषेक संस्कार ( वा गर्भाधान ) कहते हैं और विद्वान् लोग गर्भ के हिलने चलने से पहिले पुंसवन संस्कार करें ॥ १ ॥ छठे वा आठवें महीने में सीमन्त, पैदा होने पर जात कर्म, और सूतक शुद्धि होजाने पर नाम कर्म संस्कार करें ॥ २ ॥ और चारों वर्णों का नाम ऐसा हो जिसके अक्षर दो वा चार आदि सम हों ( जैसा गङ्गाराम ) और ब्राह्मण का नाम ऐसा हो जिसके उच्चारण में मङ्गल हो जैसे ( शिवदत्त इत्यादि ) क्षत्रिय का नाम ऐसा हो जिससे बल प्रतीत

भाषाधर्मसंहिता ॥ ३

माङ्गल्यंब्राह्मणस्योक्तं क्षत्रियस्यबलान्वितम् ॥ ३ ॥ वैश्यस्यधनसंयुक्तं शूद्रस्यतुजुगुप्सितम् । शर्म्मान्तंब्राह्मणस्योक्तं वर्म्मान्तंक्षत्रियस्यतु ॥ ४ ॥ धनान्तंचैववैश्यस्य दासान्तंचान्त्यजन्मनः । चतुर्थेमासिकर्त्तव्यं बालस्यादित्यदर्शनम् ॥ ५ ॥ षष्ठेन्नप्राशनंमासि चूडाकार्याथाकुलम् । गर्भाष्टमेऽब्देकर्त्तव्यं ब्राह्मणस्योपनायनम् ॥ ६ ॥ गर्भादेकादशेराज्ञो गर्भात्तुद्वादशेविशः । षोडशाब्दानिविप्रस्य राजन्यस्यद्विविंशतिः ॥ ७ ॥ विंशतिःसचतुष्कातु वैश्यस्यपरिकीर्त्तिता । नातिवर्त्तेतसावित्रीमतऊर्ध्व्वनिवर्त्तते ॥ ८ ॥ विज्ञातव्यास्त्रयोप्येते यथाकालमसंस्कृताः ।


हो ( जैसा अमितौजाः । अरिन्दमः । इत्यादि ) ॥ ३ ॥ वैश्य का नाम ऐसा हो जिसका अर्थ धन से युक्त हो (जैसा धनसुखराम । लक्ष्मीचन्द्र । इत्यादि) शूद्र का नाम ऐसा हो जिसमें निन्दा प्रतीत हो ( जैसा देवदास कटकक, तुषक इत्यादि ) ब्राह्मण के नाम के पीछे शर्म क्षत्रिय के नाम के पीछे वर्म्म ॥ ४ ॥ वैश्य के नाम के अन्त में धन वा गुप्त शब्द रहे और शूद्र के नाम के अन्त में दास हो । चौथे महीने में बालक को सूर्य का दर्शन करावे इसी का नाम निष्क्रमण संस्कार है ॥ ५ ॥ छठे महीने में अन्न प्राशन संस्कार करावे और मुण्डन संस्कार कुल रीति के अनुसार जन्म से पहिले वा तीसरे वर्ष में [ चाहे जब ] करे । गर्भ से आठवें वर्ष ब्राह्मण का यज्ञोपवीत ॥ ६ ॥ गर्भ से ग्यारहवें वर्ष क्षत्रिय का, गर्भ से बारहवें वर्ष वैश्य का, उपनयन संस्कार करें । ब्राह्मण की सोलह वर्ष तक क्षत्रिय की बाईस वर्ष तक ॥ ७ ॥ और वैश्य की चौबीस वर्ष तक शास्त्र में कही हुई सावित्री गुरु मन्त्र के ग्रहण का नियत काल है । इस से आगे मन्त्राधिकार निवृत्त हो जाता है ॥ ८ ॥ अपने २ काल के अनुसार नहीं हुआ है संस्कार जिन का ऐसे ये ब्राह्मणादि तीनों वर्ण सावित्री से पतित और सम्पूर्ण धर्मों से