अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ व्यासस्मृतिः ॥
आगमिष्यतियत्पात्रं तत्पात्रंतारयिष्यति ॥ ३३ ॥ किञ्चिद्वेदमयंपात्रं किञ्चित्पात्रंतपोमयम् । पात्राणामुत्तमंपात्रं शूद्रान्नंयस्यनोदरे ॥ ३४ ॥ यस्यचैवगृहेमूर्खो दूरेचापिगुणान्वितः । गुणान्वितायदातव्यं नास्तिमूर्खेव्यतिक्रमः ॥ ३५ ॥ देवद्रव्यविनाशेन ब्रह्मस्वहरणेनच । कुलान्यकुलतायान्ति ब्राह्मणातिक्रमेणच ॥ ३६ ॥ ब्राह्मणातिक्रमोनास्ति विप्रेवेदविवर्जिते । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहिभस्मनिहूयते ॥ ३७ ॥ सन्निकृष्टमधीयानं ब्राह्मणंयोव्यतिक्रमेत् । भोजनेचैवदानेच हन्यात्त्रिपुरुषंकुलम् ॥ ३८ ॥ यथाकाष्ठमयोहरती यथाचर्ममयोमृगः ।
सिद्ध योगी महात्मा आजायगा वह दाता को संसारसागर से पार कर देगा ॥ ३३ ॥ कोई सुपात्र तो वेदपाठी वा कोई तपस्वी होता है और सब सुपात्रों में उत्तम सुपात्र वह है जिस के पेट में शूद्र का अन्न न गया हो ॥ ३४ ॥ जिस के घर के समीप में तो मूर्ख ब्राह्मण हो और गुणी सुपात्र दूर हो वह मनुष्य गुणी ब्राह्मण को देवे मूर्ख के उल्लंघन करने में कुछ दोष नहीं है ॥३५॥ किसी देवता के मन्दिर सम्बन्धी द्रव्य का नाश करने से, ब्राह्मण के धन को किसी प्रकार मारलेने से और ब्राह्मण का उल्लंघन-अपमान (तिरस्कार) करने से अच्छे कुल भी पतित नीच हो जाते हैं ॥ ३६ ॥ वेद से हीन मूर्ख निन्दित कुपात्र ब्राह्मण का [दान देके आदर सत्कार न करना रूप] उल्लंघन, उल्लंघन नहीं है क्योंकि जलते हुए अग्नि को छोड़कर भस्म में होम नहीं किया जाता है। अर्थात् जैसे भस्म को छोड़ कर प्रज्वलित अग्नि में होम करना उचित है वैसे ही मूर्ख ब्राह्मण का उल्लंघन [छोड़] कर विद्वान् को देना चाहिये ॥३७॥ भोजन और दान में समीप के विद्वान् ब्राह्मण का जो उल्लंघन करता है वह तीन पीढ़ी तक अपने कुल को नष्ट करता है ॥३८॥ जैसा काठ का हाथी और जैसा चाम का मृग होता वैसा ही बिना पढ़ा मूर्ख ब्राह्मण ये तीनों नाम मात्र ही हाथी, मृग और ब्राह्मण कहाने वाले हैं अर्थात्