अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषार्थसहिता ॥ ३६
मृतवत्सायथागौश्च कृष्णालोभेनदुह्यते । परस्परस्यदानानि लोकयात्रानधर्मतः ॥ २८ ॥ अदृष्टेचाशुभेदानं भोक्तारंचनदृश्यते । पुनरागमनंनास्ति तत्रदानमनन्तकम् ॥ २९ ॥ मातापितृषुयद्दद्याद् भ्रातृषुश्वशुरेषुच । जायापत्येषुयद्दद्यात् सोनन्तःस्वर्गसंक्रमः ॥ ३० ॥ पितुःशतगुणं दानं सहस्रंमातुरुच्यते । भगिन्यांशतसाहस्रं सोदरेदत्तमक्षयम् ॥ ३१ ॥ इन्दुक्षयःपिताज्ञेयो माताचैवदिनक्षयः । संक्रांतिर्भगिनीचैव व्यतिपातःसहोदरः ॥ ३२ ॥ अहन्यहनिदातव्यं ब्राह्मणेपुमुनीश्वराः ।
मर गया है बछड़ा जिस का ऐसी काली गौ को जैसे दूध के लोभ से दुहते हैं अर्थात् बच्चा मर जाने पर अथवा गभिन [ गर्भिणी ] हो जाने पर गौ को दुहना शास्त्र से निषिद्ध है। वह दूध भी अभक्ष्य है। इसी प्रकार परस्पर का जो दान (रीति वा व्योहार) है वह लोक रीति है धर्म नहीं ॥२८॥
जो मनुष्य पाप को न देखकर ( अर्थात् किसी पाप के नाश के लिये न दे ) वा दान के भोक्ता को न देखे (यह न चाहे कि इस दान का फल मुझे मिले) और यह भी न चाहे कि फिर मैं जगत् में आऊंगा ऐसे समय में दान का फल अनन्त है अर्थात् किसी कामना से जो न किया जाय वही दान सब से उत्तम है ॥२९॥
माता पिता भाई श्वशुर स्त्री पुत्र वा पुत्री इन को जो दिया जाय वह भी ऐसे स्वर्ग में पहुंचाता है जिस का अन्त नहीं है ॥ ३० ॥
पिता को देना सौगुना, माता को हजार गुना, भगिनी ( बहिन ) को देना लाख गुना होता है और भाई को जो दिया जाय उस का कभी भी नाश नहीं होता किन्तु उस का अक्षय फल है ॥ ३१ ॥
पिता को देने से अमावास्या के दान के तुल्य पुण्य होता, माता को देने से जिस तिथि की हानि हो उस के तुल्य, बहन को देने से संक्रान्ति के तुल्य और सगे भाई को देने से व्यतीपात योग में दिये दान के तुल्य पुण्य होता है ॥ ३२ ॥
हे मुनीश्वरो ! सुपात्र ब्राह्मण को नित्य २ दान देना चाहिये क्योंकि जो कभी कोई तपस्वी सुपात्र