भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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३२ व्यासस्मृतिः ॥

परलोकाविरोधेन योजीवतिसजीवति ॥ २२ ॥
पशवोऽपिहिजीवन्ति केवलात्मोदरम्भराः ।
किंकायेनसुगुप्तेन बलिनाचिरजीविना ॥ २३ ॥
ग्रासादद्धंमपिग्रासमर्थिभ्यःकिंनदीयते ।
इच्छानुरूपोविभवः कदाकस्यभविष्यति ॥ २४ ॥
अदातापुरुषस्त्यागी धनंसन्त्यज्यगच्छति ।
दातारंकृपणंमन्ये मृतोऽप्यर्थंनमुञ्चति ॥ २५ ॥
प्राणनाशस्तुकर्तव्यो यःकृतार्थोनसोमृतः ।
अकृतार्थस्तुयोमृत्युं प्राप्तःखरसमोहिसः ॥ २६ ॥
अनाहूतेषुयद्दत्तं यच्चदत्तमयाचितम् ।
भविष्यतियुगस्यान्तस्तस्यान्तोनभविष्यति ॥ २७ ॥


पतङ्गादि भी क्या जीवन का निर्वाह नहीं करते ? कि जो एक दूसरे को खा लेते हैं। परन्तु परलोक के लिये दान पुण्य करता हुआ जो पुरुष जीता है उसी का जीवन सार्थक है ॥ २२ ॥ केवल अपने पेट भरने वाले तो पशु भी जीते हैं। भली प्रकार रक्षा किये बलवान् बहुत जीने वाले शरीर से मनुष्यों को क्या फल है ? ॥ २३ ॥ ग्राम वा आधाग्राम अन्न मांगने वाले भिक्षुक को क्यों नहीं देता ? । इच्छा के अनुसार धन कब किस के हो जायगा ? अर्थात् इतना धन कभी किसी के न होगा जिस से तृष्णा पूरी हो जावे ॥ २४ ॥ हमारी राय में किसी को कुछ भी न देने वाला पुरुष ही त्यागी क्योंकि वह धन को छोड़ कर मर जाता है। परन्तु हम दाता को कृपण मानते हैं क्योंकि दाता मर कर भी धन को नहीं छोड़ता अर्थात् मरे पर भी उसे धन दान का पुण्य फल उत्तम ऐश्वर्य भोग मिलता है ॥ २५ ॥ प्राणीं का नाश तो होना ही है परन्तु अपना काम दान पुण्यादि धर्म करके जो मरा है वह जानी नहीं मरा और जो अकृतार्थ ( धर्म किये बिना ) मरता है वह गधे के समान है ॥ २६ ॥ बिन बुलाये ब्राह्मण के घर जाकर और बिन मांगे जो दान दिया जाता है युग नाम काल का तो अन्त होगा परन्तु उस दान के फल का अन्त नहीं होगा ॥ २७ ॥