अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 456, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाथंसहिता ॥ ३१
दानधर्मंप्रवक्ष्यामि यथाव्यासेनभाषितम् ॥ १५ ॥ यद्ददातिविशिष्टेभ्यो यच्चाश्नातिदिनेदिने । तद्भवित्तमहंमन्ये शेषंकस्यापिरक्षति ॥ १६ ॥ यद्ददातियदश्नाति तदेवधनिनोधनम् । अन्यैमृतस्यक्रीडन्ति दारैरपिधनैरपि ॥ १७ ॥ किंधनेनकरिष्यन्ति देहिनोऽपिगतायुषः । यद्दर्द्धयितुमिच्छन्तस्तच्छरीरमशाश्वतम् ॥ १८ ॥ अशाश्वतानिमित्राणि विभवोनैवशाश्वतः । नित्यंसन्निहितोमृत्युः कर्तव्योधर्मसंग्रहः ॥ १९ ॥ यदिनामनधर्माय नकामायनकीर्तये । यत्परित्यज्यगन्तव्यं तद्धनंकिनदीयते ॥ २० ॥ जीवन्तिजीविनोयस्य विप्रामित्राणिबान्धवाः । जीवितंसफलंतस्य आत्मार्थेकोनजीवति ॥ २१ ॥ कृमयःकिंनजीवन्ति भक्षयन्तिपरस्परम् ।
जी के कहने के अनुसार कहते हैं ॥ १५ ॥ जो उत्तम विद्वान् धर्मात्माओं को देता है वा नित्य २ जो खाता है उस को ही उस का धन मानते हैं और शेष किसी अन्य के ही धन की वह रक्षा करता है ॥१६॥ जितना दान देता है या जितना भोग कर लेता है वही धनी का धन है। क्योंकि उस के मर जाने पर उस के स्त्री तथा धन से अन्य लोग ही आनन्द भोगते हैं ॥१७॥ वृद्धहुए देहधारी मनुष्य धन से क्या करेंगे, जिस शरीर को धन से बढ़ाया वा हृष्ट पुष्ट किया चाहते हैं वह भी अनित्य है ठहरने वाला नहीं मित्र और धन सदैव नहीं रहते और मृत्यु नित्य ही समीप में खड़ा है इस से धर्म का सञ्चय करना चाहिये ॥ १८ ॥ जो धन धर्म के लिये काम (भोग) के लिये और कीर्ति के लिये नही और जिस धन को यहां छोड़कर परलोक जाना है उस धन को क्यों नहीं दिया जाता ? ॥ २० ॥ जिस मनुष्य के जीवित रहने से ब्राह्मण, मित्र, बांधव (कुटुम्बी) लोगों की जीविका (उपकार) हो उस का जीवन सफल है। अपने लिये कौन नहीं जीता है ? ॥ २१ ॥ कृमिकीट