अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 455, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें३० व्यासस्मृतिः ॥
योददातिब्राह्मणेभ्यो नोपसर्पतितंयमः ॥ ८ ॥
विप्रपादोदकक्लिन्ना यावत्तिष्ठतिमेदिनी ।
तावत्पुष्करपात्रेषु पिवन्तिपितरोऽमृतम् ॥ ९ ॥
यत्फलंकपिलादाने कार्तियांज्येष्ठपुष्करे ।
तत्फलंऋषयःश्रेष्ठा विप्राणांपादशौचने ॥ १० ॥
स्वागतेनाग्नयःप्रीता आसनेनशतक्रतुः ।
पितरःपादशौचेन अन्नाद्येनप्रजापतिः ॥ ११ ॥
माता पित्रोः परंतीर्थं गङ्गागावोविशेषतः ।
ब्राह्मणात्परमंतीर्थं नभूतन्नभविष्यति ॥ १२ ॥
इन्द्रियाणिवशीकृत्य यत्रयत्रवसेन्नरः ।
तत्रतत्रकुरुक्षेत्रं नैमिषंपुष्कराणिच ॥ १३
गङ्गाद्वारंचकेदारं संन्निहत्यांतथैवच ।
एतानिसर्वतीर्थानि कृत्वापापैःप्रमुच्यते ॥ १४ ॥
वर्णानामाश्रमाणांच चातुर्वर्ण्यस्यभोद्विजाः ।
यमराज नहीं आता ॥ ८ ॥ ब्राह्मणों के पगों के जल से गीली की हुई पृथ्वी जब तक रहती है तब तक पुष्कर तीर्थ के पत्तों में पितर लोग अमृत पीते हैं ॥ ९ ॥ जो फल कपिला गौ के दान का है और जो फल कार्तिक की पूर्णिमा को पुष्कर के स्नान का है । हे श्रेष्ठ ऋषि लोगो ! वही फल ब्राह्मणों के पग धोने में हैं ॥ १० ॥ विद्वान् ब्राह्मणों वा विरक्त संन्यासियों के स्वागत (आपने बड़ी कृपाकी आइये ! इत्यादि कहना) से अग्नि, आसन के देने से इन्द्र, पग धोने से पितर, और अन्न आदि के देने से ब्रह्मा, प्रसन्न होते हैं ॥ ११ ॥ माता पिता की सेवा करना परम तीर्थ है । विशेष कर गङ्गा गौ तीर्थ हैं और ब्राह्मणों से अधिक तीर्थ न हुआ न होगा ॥ १२ ॥ जो मनुष्य इन्द्रियों को वश में करके जिस २ आश्रम में बसता है उस के लिये वहां २ कुरुक्षेत्र-नैमिष- और पुष्कर ॥ १३ ॥ हरिद्वार, केदार, संनिहत्या-इत्यादि तीर्थ हैं वह इन सब तीर्थों को करके सब पापों से छूट जाता है ॥ १४ ॥
हे ऋषियो ब्राह्मणो ! चारों वर्णों और आश्रमों के दान धर्म को व्यास