भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ २९

सर्वतीर्थफलंतस्य यथोक्तंयस्तुपालयेत् ॥ २ ॥ गुरुभक्तोभृत्यपोषी दयावाननसूयकः । नित्यजापीचहोमोच सत्यवादीजितेन्द्रियः ॥ ३ ॥ स्वदारेयस्यसन्तोषः परदारनिवर्त्तनम् । अपवादोऽपिनोयस्य तस्यतीर्थफलगृहे ॥ ४ ॥ परदारान्परद्रव्यं हरतेयोदिनेदिने । सर्वतीर्थाभिषेकेण पापंतस्यननश्यति ॥ ५ ॥ गृहेषुसेवनीयेषु सर्वतीर्थफलंततः । अन्नदस्यत्रयोभागाः कर्त्ताभागेनलिप्यते ॥ ६ ॥ प्रतिश्रयंपादशौचं ब्राह्मणानांचतर्पणम् । नपापंसंस्पृशेत्तस्य वलिंभिक्षांददांतियः ॥ ७ ॥ पादोदकंपाइघृतं दीपमन्नंप्रतिश्रयम् ।


से परे धर्म नहीं है। जो गृहस्थ पुरुष अपने धर्म का पूरा २ शास्त्रानुसार पालन करे उसको संपूर्ण तीर्थों का फल घर में ही मिल जाता है ॥२॥ गुरु का भक्त, स्त्री पुत्रादि भृत्योंका पालन करने वाला, दया करने वाला, जो किसीकी निन्दा नहीं करता जो नित्य २ जप और होम करता सत्य बोलता और जितेन्द्रिय रहता है ॥ ३ ॥ अपनी स्त्री में ही जिस को सन्तोष हो, अन्य की स्त्री से निवृत्ति हो, जिस की निन्दा बुराई कोई न करता हो उस मनुष्य को घर में भी तीर्थ का फल मिलता है ॥ ४ ॥ पराई स्त्री और पराये धन को जो दिन पर दिन भोगता है सब तीर्थों के स्नान से भी उस का पाप नष्ट नहीं होता ॥ ५ ॥ तिस से सेवन करने योग्य उत्तम धर्मों वाले घरों में सब तीर्थों का फल होता है । पुण्य के तीन भाग उस को मिला करते हैं कि जिस के अन्न से श्राद्ध आदि किया जाय और जो उक्त कर्मों को करता है उस को एक भाग फल मिलता है ॥ ६ ॥ नम्रता, वा पगों का धोना, ब्राह्मणों को तृप्त करना वलि-वैश्वदेव, और भिक्षा देना इन कामों को जो नित्य २ करता है उस मनुष्य को पाप नहीं लगता ॥ ७ ॥ पग धोने का जल, पादघृत ( जूता वा खड़ामू-पादुका, ) दीपक, अन्न, घर,ये वस्तु जो ब्राह्मणों को देता है उस के पास