अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें४० व्यासस्मृतिः॥
वर्जितःपितृदेवैस्तु रौरवंयातिसद्विजः ॥ ७० ॥
भाण्डसङ्करसङ्कीर्णा नानासंकरसंकराः ।
योनिसंकरसंकीर्णा निरयंयान्तिमानवाः ॥ ७१ ॥
पङ्क्तिभेदीवृथापाकी नित्यंब्राह्मणनिन्दकः ।
आदेशीवेदविक्रेता पञ्चैतेब्रह्मघातकाः ॥ ७२ ॥
इदंव्यासमंतन्नित्य मध्येतव्यंप्रयत्नतः ।
एतदुक्ताचारवतः पतनंनैवविद्यते ॥ ७३ ॥
इति श्रीवेदव्यासीयधर्मशास्त्रे चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ॥
समाप्तं चेदं धर्मशास्त्रम् ॥
(रसोई) को बनावे अथवा जिस की स्त्री शूद्रा हो वह ब्राह्मण पितर और देवताओं से वर्जित हुआ नरक में जाता है ॥ ७० ॥ पात्रों के संकर दोष से जो संकीर्ण हैं चाहे जिसके पात्रसे खालें वा जल पीलें अनेक नीच वर्ण संकरों से जिन का मेल है और योनिसंकर दोष से भी जो संकीर्ण हैं अर्थात् चाहे जिसे विवाहलें वा नीच औरतन को भी घरमें रखलें इतने मनुष्य नरकमें जाते हैं ॥ ७१ ॥ पंक्ति में जो भेद करे [न्यूनाधिक परोसे] वृथा पाकी जो पञ्चमहा यज्ञ न करे, अपना उदर भरने के लिये ही अन्न पकावे, ब्राह्मणों की सदैव निन्दा करे और जो आज्ञा को करे (सेवक नौकर हो) और वेद को जो बेंचे अर्थात् द्रव्य के लोभ से पढ़ावे या जपे ये पांच ब्रह्महत्या के दोषी हैं ॥७२॥ इस व्यास जी के मत को यत्न से नित्य पढ़े इस में कहे हुए आचरणों को जो करता है उस का पतन (नरक में जाना) नहीं हो सकता ॥ ७३ ॥
श्रीवेदव्यासीय धर्मशास्त्र का यह चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥
और यह धर्मशास्त्र भी पूरा हो गया ॥