अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
पृष्ठ 466, कुल 805 में से
संदर्भ में पढ़ें॥श्रीगणेशायनमः॥
अथ शंखस्मृतिप्रारम्भः॥
स्वयंभुवेनमस्कृत्य सृष्टिसंहारकारिणे ।
चातुर्वर्ण्यहितार्थाय शङ्खःशास्त्रमकल्पयत् ॥ १ ॥
यजनंयाजनंदानं तथैवाध्यापनक्रिया ।
प्रतिग्रहंचाध्ययनं विप्रकर्माणिनिर्दिशेत् ॥ २ ॥
दानंचाध्ययनंचैव यजनंचयथाविधि ।
क्षत्रियस्यचवैश्यस्य कर्मेदंपरिकीर्तितम् ॥ ३ ॥
क्षत्रियस्यविशेषेण प्रजानांपरिपालनम् ।
कृषिगोरक्षवाणिज्यं विशश्चपरिकीर्तितम् ॥ ४ ॥
शूद्रस्यद्विजशुश्रूषा सर्वशिल्पानिचोपयः ।
क्षमासत्यंदमःशौचं सर्वेषामविशेषतः ॥ ५ ॥
सृष्टि और संहार करने वाले स्वयंभु ब्रह्मा जी को नमस्कार करके चारों वर्णों के कल्याण के अर्थ शंख ऋषि ने यह धर्म शास्त्र बनाया है ॥ १ ॥ यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना, छः अङ्गों सहित वेद का पढ़ाना, प्रतिग्रह (दान लेना) और स्वयं साङ्ग वेद को पढ़ना ये छः कर्म ब्राह्मण के कहे हैं ॥ २ ॥ दान देना, वेद पढ़ना, विधिपूर्वक यज्ञ करना, ये तीन कर्म क्षत्रिय और वैश्य के लिये कहे हैं ॥ ३ ॥ विशेष कर क्षत्रिय का कर्म प्रजा की रक्षा करना है और वैश्य का विशेष कर्म खेती, गौओं की रक्षा, और लेन देन करना कहा है ॥ ४ ॥ शूद्र का कर्म ब्राह्मणादि तीनों द्विजों की सेवा और संपूर्ण कारीगरी कही है । क्षमा, सत्य, दम, (मन को वश में करना) शौच, ये चारों वर्णों के समान ही धर्मानुकूल कर्त्तव्य कर्म हैं ॥ ५ ॥