भारतकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

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भाषार्थसहिता ॥ ३१

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणेगृहमागते । क्रीडन्त्योषधयःसर्वा यास्यामःपरमांगतिम् ॥ ५२ ॥

नष्टशौचेव्रतभ्रष्टे विप्रेवेदविवर्जिते । दीयमानंरुदत्यन्नं भयाद्वैर्दुष्कृतंकृतम् ॥ ५३ ॥

वेदपूर्णमुखंविप्रं सुभुक्तमपिभोजयेत् । नचमूर्खंनिराहारं षड्ररात्रमुपवासिनम् ॥ ५४ ॥

यानिह्यस्यपवित्राणि कुक्षांतिष्ठन्तिभोद्विजाः । तानितस्यप्रयोज्यानि नशरीराणिदेहिनाम् ॥ ५५ ॥

यस्यदेहेसदाश्नन्ति हव्यानिन्त्रिदिवौकसः । कव्यानिचैवपितरः किम्भूतमधिकंततः ॥ ५६ ॥

यदभुङ्क्तेवेदविद्विप्रः स्वकर्मनिरतःशुचिः । दातुःफलमसंख्यातं प्रतिजन्मतदक्षयम् ॥ ५७ ॥


विद्या और विनय से युक्त ब्राह्मण यदि अपने घर आवे तो उस समय सब ओषधी [ अन्न आदि ] क्रीड़ा करती [आनन्द मनाती] हैं कि हम परम गति को प्राप्त होंगी ॥ ५२ ॥ शास्त्रानुकूल शुद्धि न करके मलिन रहने सन्ध्यादि कर्म को नियम से न करने वाले तथा वेद से शून्य ब्राह्मण को दिया हुआ अन्न भय से रोता है कि इस दाता ने बुरा किया जो हम को ऐसे गुण कर्म हीन मूर्ख ब्राह्मण के उदर में पहुंचाया ॥ ५३ ॥ वेद के पठन पाठन से भरा है मुख जिस का ऐसे भोजन से तृप्त ब्राह्मण को भी जिमावे और छः दिन के उपासे भी निराहार मूर्ख ब्राह्मण को न जिमावे ॥ ५४ ॥ हे ऋषि लोगो ! जिस मनुष्य का जो पवित्र वस्तु (अन्न आदि) जिस विद्वान् के उदर में ठहरे वह वस्तु ही उसको देना चाहिये अन्यथा देह धारियों का देह किसी प्रयोजन का नहीं है ॥ ५५ ॥ जिस ब्राह्मण के देह में देवता लोग हव्य और पितर लोग कव्य सदैव खाते हैं उससे परे अन्य कौन प्राणी हो सकता है ? अर्थात् उस से उत्तम अन्य कोई नहीं है ॥ ५६ ॥ वेद का ज्ञाता और अपने धर्म कर्म में तत्पर ब्राह्मण जो खाता है दाता को उसका फल असंख्य होता और जन्म जन्म में वह अक्षय अविनाशी होता है ॥ ५७ ॥